सावित्रीबाई फुले की कविता
स्त्री-शूद्रातिशूद्र की मुक्ति और सावित्रीबाई
फुले की कविता
डॉ. संजय रणखांबे
हिंदी विभाग
डॉ.अण्णासाहेब जी. डी. बेंडाळे
महिला महाविद्यालय, जलगाँव
सावित्रीबाई फुले की
कविताएँ उनके ‘काव्यफुले’(1854) और ‘बावन्नकशी सुबोध रत्नाकर’ (1891)इन दो संकलनों में संकलित हैं| उनकी सभी कविताएँ
स्त्री-शूद्रातिशूद्र को सदियों की गुलामी या दासता की बेड़ियों से मुक्ति दिलाने
के लिए किए गए संघर्षों की काव्यानुभूति है| सावित्रीबाई और जोतिबा फुले द्वारा 19 वीं शती में स्त्री एवं शूद्रातिशूद्र
की मुक्ति के लिए जो लड़ाई लड़ी गई उसे ही सावित्रीबाई ने अपनी कविताओं में
अभिव्यक्त किया | इसलिए उनकी कविताएँ कोरी कविताएँ न होकर जोतिराव फुले तथा सावित्रीबाई फुले जी के संघर्ष का
इतिहास प्रस्तुत करने वाली संघर्षवाणी है| अतः इस कविता में भले ही पारंपारिक
काव्य सौंदर्य या लक्षणों का अभाव हो या कुछ आलोचकों को इसमें साहित्यिक-काव्यमूल्य
का अभाव लगता हो परंतु साहित्य की उपादेयता और प्रतिबद्धता की दृष्टि से अगर देखे
तो सावित्रीबाई की कविता न केवल मराठी बल्कि संपूर्ण भारतीय साहित्य में सर्वश्रेष्ठ
सिद्ध होती है| साहित्य की सामाजिकता क्या होती है इसे अगर सोदाहरण समझना हो तो
सावित्रीबाई की कविता संपूर्ण भारतीय साहित्य का पथप्रदर्शन करने की ताकत रखती है|
सावित्रीबाई की
‘काव्यफुले’ तथा ‘बावन्नकशी सुबोध रत्नाकर’ काव्यसंग्रह की कविताएँ मुख्य रूप से
प्रकृति, सामाजिक समस्याएँ तथा वैयक्तिक जीवन पर आधारित हैं| यह काव्य अर्वाचीन
मराठी काव्य का आरंभ काल था | उनकी कविता से ही आधुनिक मराठी कविता का प्रारंभ
हुआ| परंतु यह उनकी उपेक्षा ही है कि आधुनिक मराठी कविता की जनक उन्हें न मानकर
मराठी साहित्य के आलोचक केशवसुत को जो उनके ३०-३५ वर्ष बाद मराठी काव्य क्षेत्र
में अवतरित हुए उन्हें मानते हैं| परंतु एक मत यह भी स्थापित हो रहा है कि
ऐतिहासिक तथा सामाजिक दृष्टि से सावित्रीबाई फुले ही आधुनिक कविता की जनक है| इस
संबंध में मराठी के साहित्यकार जी. ए. उगले भी अपनी ‘सावित्रीबाई फुले’ पुस्तक का
प्रारंभ ‘अर्वाचीन मराठी कविता की जनक’ 1 इस वाक्य से करते हैं| तो अॅड. राम कांडगे अपनी
‘क्रांतिज्योती सावित्रीबाई फुले’ इस ग्रंथ में इसी मत का समर्थन करते हैं|2
सावित्रीबाई की कविता उनके कार्य, संघर्ष और
लड़ाइयों का इतिवृत्त है| जोतिराव के
कंधे से कंधा मिलाकर जिस सामाजिक विषमता के खिलाफ सावित्रीबाई ने संघर्ष किया उस
संघर्ष को ही उन्होंने अपनी कविताओं में पूरी सच्चाई के साथ प्रस्तुत किया| सावित्रीबाई
फुले अपनी कविता में लिखती हैं कि परंपरागत ज्ञान तथा तर्क के बल पर सदियों से
सामान्य मनुष्य का शोषण किया गया| धर्म की आड़ में ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने
पोथी-पुराणों का सहारा लेकर सामान्य मनुष्य के मन को भ्रष्ट किया |3 इसीकारण सावित्रीबाई फुले अपनी कविता के माध्यम
से अपने समय की सामाजिक समस्याओं, कुप्रथाओं का यथार्थ चित्रण करते हुए उसे
सुलझाने का प्रयास करती है| इस संबंध में अॅड. राम कांडगे लिखते है – “सामजिक
समस्याएँ, सामजिक परिवर्तन की दिशा और उससे संबंधित उपायों का सुंदर विवेचन बड़ी
चतुराई से उन्होंने अपने काव्य में किया है|”4
स्त्री-शूद्र तथा अतिशूद्र मनुष्य को जिन
धार्मिक, सामाजिक नियमों, कर्मकांडों के आधार पर दास बनाया था उन नियमों, कर्मकांडों,
आडंबरों और मिथ्या मान्यताओं की पोल खोलकर सावित्रीबाई फुले ने ज्ञान तथा शिक्षा
के बल पर इससे मुक्ति पाने का संदेश अपने कार्य तथा कविताओं द्वारा दिया है| इसलिए
सावित्रीबाई फुले अपने आराध्य से कोई झूठी मोक्ष की गुहार नहीं लगाती बल्कि कहती
है – “अज्ञान नष्ट कारी, वर सर्वा लाभो || प्रार्थना ही सावित्रीची” 5 अर्थात्
सावित्रीबाई यह प्रार्थना करती है कि अज्ञान दूर करने का वर सभी को प्राप्त हो|
इसीकारण सावित्रीबाई
फुले जी को वीर छत्रपति शिवाजी महाराज का शूद्र-अतिशूद्रों के उद्धारक का रूप ही
अधिक भाता है –
“शूद्राति -अतिशूद्रांचा| प्रभू वंदू
मनोभावे इतिहासी शिवानन” 6
सभी तरह की
शोषण-अन्याय, अत्याचार और दासता की श्रृंखलाओं को तोड़ने वाली ज्ञान या विद्या की
प्राप्ति के लिए ही सावित्रीबाई फुले प्रार्थना करती है और कहती है कि सभी शोषित-पीड़ित
पुत्रों को ज्ञान-विद्या प्राप्त हो -
“आम्ही लेकरे तुला प्रार्थितो
विद्या देई ज्ञान इच्छितो” 7
छ.शिवाजी महाराज के
स्वराज्य में सभी शूद्रातिशूद्रों को सुरक्षा, सुख और शांति की प्राप्ति हुई थी, इन्हीं के बल पर शिवाजी महाराज ने अपना स्वराज्य
स्थापित किया था| इस गौरवमय इतिहास को याद करते हुए तथा शूद्रातिशूद्रों के
उद्धारक छत्रपति शिवाजी महाराज का बखान करते हुए सावित्रीबाई फुले अपने काव्य में
लिखती है-
“म्हणोनी शिवाजी स्वराज्य उभारी
समाजी अतिशूद्र लोकास तारी
मनुष्यात आणि सुखी ठेवी त्यांना
तरी शिवसत्ता पुढे लाभली ना ||१६||”8
सावित्रीबाई के कार्य, संघर्ष तथा कविता की प्रेरणा जोतिराव फुले ही थे| इसी कारण वे अपनी “जोतिबांना नमस्कार” अर्थात् “ज्योतिबा को
नमस्कार” इस कविता में जोतिराव फुले के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते
हुए लिखती है कि जिन्होंने हमें ज्ञानामृत
दिया, जिन्होंने दीन, दलित, शूद्र, अतिशूद्र को गले लगाया और ज्ञान की लालसा जागृत की जो हम
सबका उद्धार करता है, उस जोतिबा को
नमस्कार| इस संबंध में काव्य पंक्तियां दृष्टव्य हैं
–
“ज्ञानामृत आम्हां देई | अशा जीवन देतेस
थोर ज्योति दीन शूद्रा | अतिशूद्रा हाक मारी
ज्ञान ही ईर्षा देई | तो आम्हाला उद्धारी” 9
सदियों के अज्ञान के
कारण शूद्रातिशूद्रों का जीवन गुलामी-दासता के चक्रव्यूह में फँस गया था| भूदेव अर्थात्
ब्राम्हण-व्यवस्था द्वारा उन्हें दास बनाया था| उनकी वह अवस्था देखकर सावित्रीबाई
का मन बेचैन होता है और सोच-विचार के पश्चात् उनकी उन्नति का एकमात्र मार्ग पाती
है और वह है शिक्षा का| इसी कारण वह अपने शूद्रातिशूद्रों भाई-बंधुओं को यह संदेश
देती है कि शिक्षा का मार्ग अपनाकर वह दो हजार साल का पशुत्व का जीवन त्यागकर
मनुष्यत्व प्राप्त करें| सावित्रीबाई फुले के शब्दों में-
“दोन हजार वर्षांचे | शूद्रा दुखणे लागले
ब्रह्मविहित सेवेचे | भू-देवांनी पछाडले
शूद्रांना सांगण्या जोगा | आहे शिक्षण मार्ग हा
शिक्षणाने मनुष्यत्व | पशुत्व हाटते पहा|”10
इस प्रकार अज्ञान के
कारण भारतीय समाज का शूद्रातिशूद्र सदियों
से गुलामी के जीवन व्यतीत कर रहा था| उन्हें शिक्षा प्राप्त कर अपनी पशुत्व की जिंदगी से
मुक्ति पाने का मार्ग सावित्रीबाई फुले ने दिखाया है| मनुस्मृति तथा मनुवादी
व्यवस्था ने भारतीय समाज में विषमता तथा ऊँच-नीचता के बीज बो दिए हैं| आज भी
भारतीय समाज इस विषमता के शिकंजे में फंसा हुआ है| इस मनुवादी या ब्राह्मणवादी
व्यवस्था ने समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इन चार वर्णों तथा जाति-उपजाति
द्वारा विभाजन किया| इस विभाजन को धर्म, प्रारब्ध, पूर्वजन्म का आधार देकर शूद्रातिशूद्र
के अज्ञान, अशिक्षा का लाभ उठाते हुए अपनी विषमतावादी तथा अमानवीय प्रथा, परंपरा
तथा रीतियों की स्थापना की| मनु ने मनुस्मृति में लिखा है कि जो निर्बुद्ध है वह हल चलाते हैं, खेती करते हैं इसलिए कोई
ब्राह्मण खेती नहीं करता और न हल चलाता है| उसने केवल धर्माज्ञा करनी चाहिए| पूर्व
जन्म के पाप के कारण शूद्र का जन्म प्राप्त होता है और इस जन्म वे उन पापों का
हिसाब चुकता करते हैं| इन धूर्त मनुवादी लोगों ने विषम और अमानवीय नीति की समाज
में रीति चलाई है| क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले अपनी मनु म्हणे” कविता में लिखती है-
“नांगर धरती | शेती जे करती |
मठ्ठ ते असती | मनु म्हणे ||१||
करू नका शेती| सांगे मनुस्मृती |
धर्माज्ञा करती | ब्राह्मणास ||२||
शूद्र जन्म घेती | पूर्वीची पापे ती
जन्मी या फेडती | शूद्र सारे ||३||
विषम रचती | समाजाची रीती
धुर्तांची ही नीती | अमानव ||४||”11
लेकिन इसी शूद्र द्वारा
उपजाई गई फसल और अनाज को ऊंची जाति तथा धर्म के ठेकेदार बन बैठे लोग परमब्रह्म मानते
हैं| शूद्र लोग
खेती करते हैं और ऊंची जाति के लोग पक्वान भोज
खाते हैं| इसी धर्म तथा जाति की आड में शूद्रातिशूद्र
के अज्ञान का लाभ उठाते हुए नहीं बल्कि उसे सदियों तक अज्ञान और अशिक्षा
में रखने की षड्यंत्रकारी तथा विषमतावादी व्यवस्था बनाकर ब्राह्मणों द्वारा उसका
सदियों से शोषण हो रहा है| अपने समय की इसी यथार्थ को अभिव्यक्त करते हुए
सावित्रीबाई फुले लिखती हैं-
“ब्रह्म असे शेती | अन्नधान्य देती |
अन्नास म्हणती | परमब्रह्म ||१||
शूद्राकरी शेती | म्हणूनिया
खाती |
पक्वान झोडती | अंह लोक ||२||”12
इस वर्णवादी-जातिवादी विषमताधारित व्यवस्था ने सामान्य शोषित-पीड़ित शूद्रातिशूद्र मनुष्य का मनुष्यत्व छीन लिया था| उनके इस शोषण के प्रमाण उनके वेद है| इसी शोषण तथा अहंकार के बल पर भूदेव दांभिक बन
बैठे थे| उनकी इस शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ पहली आवाज बुद्ध ने उठाई और
समाज में परिवर्तन किया था| उस इतिहास से सावित्रीबाई
भली-भाँति परिचित थी| तत्कालीन समाज में मुक्ति तथा परिवर्तन की चेतना को जगाते
हुए कवयित्री इसी इतिहास को लोगों के सम्मुख रखती हैं-
“मनुष्यत्व सारे हिरावून भक्षी
तयाला असे वेद ही सर्व साक्षी
अंहकारी भूदेव मग्रूर झाले
तयी वेळेला बुद्ध जन्मास आले ||७||”13
बुद्ध ने अपने क्रांति से तत्कालीन समाज में
समता स्थापित करने का प्रयास किया था| परंतु उसके बाद के
समय में पुष्पमित्र शुंग के काल में प्रतिक्रांति हुई और फिर से वर्ण तथा जाति-व्यवस्था के कारण समाज ऊंच-नीचता तथा वर्णगत, जातिगत भेद-भाव में बँट गया| ऐसे समाज में सुख-शांति तथा स्थिरता नहीं रहती| एकता की भावना नहीं पनपती| भारत में भी यही हुआ| इसी सामाजिक सच्चाई को सावित्रीबाई फुले ने
व्यक्त किया है-
“स्वधर्मी अती भिन्नता वर्ण जाती
तिथे स्थिरता ना वसे ऐक्य नीती” 14
इसी वर्ण जाति व्यवस्था ने समाज का माहौल विषैला बना दिया| मनुवादी समाज में विभिन्न कुप्रथाओं तथा
रूढ़ियों का प्रचलन बढ़ गया और इसकी परिणति स्त्री तथा शूद्रातिशूद्रों की गुलामी में हुई| उन्हें पशु-समान जीवन जीने के लिए विवश किया गया| इसी विषैले माहौल का यथार्थ चित्र सावित्रीबाई अपनी
कविता में व्यक्त करती है-
“मनु वर्ण कल्पी विषारी विकारी
अनाचारी रूढी सदा बोचणारी
स्त्रिया शूद्र सारे गुलामी गुहेत
पशुसारखे राहती ते कुपात ||१३||”15
पेशवाई के काल में
तो शूद्रों का जीवन अत्यंत दयनीय बन गया था| पेशवाई
व्यवस्था के अन्याय, अत्याचार तथा उनके हीनता भरे व्यवहार और
कुप्रथाओं के कारण शूद्रातिशूद्रों की स्थिति अत्यंत शोचनीय बन गई थी | सावित्रीबाई फुले के समय तक कामोबेश रूप में वह कुप्रथाएं मौजूद थी| पेशवाई काल में शूद्रों का स्पर्श तो दूर उन्हें
गांव से गुजरते हुए गले में थूंकने के लिए मिट्टी का घड़ा लटकाना पड़ता था और अपने
पद चिह्नों को मिटाने के लिए कमर में झाड़ू बांधना पड़ता था समाज के इसी घिनौने
रूप को व्यक्त करते हुए सावित्रीबाई लिखती हैं-
“पुढे पेशवाई तिचे राज्य आले
अनाचार देखी अती शूद्र भ्याले
स्वथुंकी थुंकाया गळा गाडगे ते
खुणा नाश या ढुंगणी झाप होते ||१७||”16
इस तरह युग-युग से स्त्री-शूद्रातिशूद्र दुःख-दर्द भरा पशु-समान जीवन बिताते रहे परंतु उन्हें
इस तरह की हालत में देखकर किसी को भी लज्जा नहीं आती थी | समाज की इस विसंगति को
भी सावित्रीबाई फुले अपनी कविता में व्यक्त करती है-
“असे शूद्र ‘युगानुयुगे अभागी
नसे सुख काही सदा दुःख भोगी
पशुसारखे मौन होऊनी राही
अशा या दशेची कुणा लाज नाही ||२८||”17
म.जोतिराव फुले ने पूना
में ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’ की स्थापना की | इस गृह का उद्देश्य था कि जो विधवा
स्त्री अपनी किसी गलती से अथवा घर के किसी अन्य पुरुष द्वारा उत्पीड़ित होकर माँ
बन गई है ऐसी स्त्रियाँ इस गृह में आकर बच्चा जन सकती हैं और फिर से अपने घर लौट
सकती हैं| उस समय ऐसी पुरुषसत्ताक व्यवस्था द्वारा उत्पीड़ित स्त्री के पास
आत्महत्या के सिवाय कोई विकल्प शेष नहीं रहता था| जोतिराव फुले तथा सावित्रीबाई फुले ने ऐसी स्त्रियों को बालहत्या प्रतिबंधक गृह द्वारा
सुरक्षा प्रदान की| इन स्त्रियों की पूरी देखभाल जैसे-प्रसूति, दवा-दारू,
खाना-पीना सब कुछ सावित्रीबाई फुले स्वयं करती थी| इस संबंध में सावित्रीबाई लिखती
हैं-
“पथा चुकल्या कामिनी पोटुशीना
प्रसुतिगृही सोय मोलाचि नावा
सुईणी, दवा, पाणी खाणे, पिणे ही
व्यवस्था अशी सर्व सावित्री पाही ||४२||”18
इस शोषण और गुलामी से केवल विद्या या ज्ञान ही
मुक्ति दिला सकता है| इसी कारण सावित्रीबाई फुले विद्या या
ज्ञान को ‘श्रेष्ठधन’ कहती है| इसी शीर्षक की कविता में वह लिखती है कि विद्यारूपी
धन का संचय जिसके पास होता है उसे ही सभी जन ज्ञानी मानते हैं-
“विद्या हेच धन आहे रे | श्रेष्ठ साऱ्या धनाहून
|
तिचा साठा जयापाशी | ज्ञानी तो मानती जन” 19
इसी कारण
वे शूद्रातिशूद्र समाज को ज्ञान रूपी धन का एकाग्र होकर लाभ लेने
का संदेश देती है| वह अपने शूद्रातिशूद्र बंधुओं को जागृत करते हुए कहती हैं कि अगर सदियों की गुलामगिरी की बेड़ियों को तोड़ना है तो सबको शिक्षा का
मार्ग अपनाते हुए आगे बढ़ना होगा| इसी कारण वह सभी
शोषित, पीड़ित शूद्रातिशूद्र जनों को जगाते हुए कहती है कि हे बंधुओं, पढ़ने
के लिए, शिक्षा ग्रहण करने के लिए जागो| उनके शब्दों में-
“उठा बंधुनों अतिशूद्रानों जागे होऊनि उठा
परंपरेची गुलामगिरी ही तोडणे साठी उठा |
बंधुनों शिकण्यासाठी उठा ||१||”20
वे कहती है कि अगर शूद्रत्व के दाग से मुक्ति
पानी है तो ज्ञान एकमात्र सहारा है| 19वीं शती में अंग्रेजों द्वारा देश में
अंग्रेजी शिक्षा का प्रारंभ करने से कई सारे भारतीय नव-जवान पढ़-लिखकर अंग्रेजी
ज्ञान हासिल कर अपने समाज के साथ देश की ओर नई वैज्ञानिक दृष्टि से देख रहे थे, उस
पर सोच रहे थे| उनकी दृष्टि से अंग्रेजी शिक्षा तथा व्यवस्था शूद्रों को उनकी
पशुत्व-सी जिंदगी से मुक्ति दिलाने वाली और मनुष्यत्व प्रदान करने वाली नई आशा की
किरण थी | इसी कारण महात्मा ज्योतिराव फुले के साथ-साथ सावित्रीबाई भी अंग्रेजी
व्यवस्था की प्रशंसा करती है और शूद्रातिशूद्र जनों को अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त
करने का संदेश देती है-
“इंग्रजी माऊली | देई सत्य ज्ञान |
शूद्राला जीवन | देई
प्रेम ||
इंग्रजी माऊली | शूद्रांना
पान्हा पाजी
संगोपन आजी | करतेस
||
इंग्रजी माऊली |
तोड़ते पशुत्व
देई मनुष्यत्व |
शुद्र्लोका ||”21
तत्कालीन मोगलाई तथा
पेशवाई व्यवस्था ने शूद्रातिशूद्रों की अवस्था दयनीय बनाई थी| अंग्रेजों ने शिक्षा
की व्यवस्था सबके लिए खुली कर शूद्रों के जीवन में नई आशा की किरण भर दी थी| इसी
कारण सावित्रीबाई सबको अंग्रेजी शिक्षा को अपनाते हुए आत्मनिर्भर बनने के लिए तथा
उद्योग, धन, ज्ञान का संचय करने का संदेश देती है| वह कहती है कि विद्याहीन तथा
ज्ञानहीन व्यक्ति को मनुष्य कैसे कहें? जो उसे प्राप्त करने के लिए प्रयास भी नहीं
करता उसे मनुष्य कैसे कहें? बुद्धि होकर भी जो उसका प्रयोग न करता हो वह मनुष्य
होकर भी पशु समान हैं-
“तयास मानव म्हणावे का ?
ज्ञान नाही विद्या नाही
ते घेणेची गोडी नाही
बुद्धी असुनि चालत नाही
तयास मानव म्हणावे का ?||१||”22
सावित्रीबाई फुले जी कहती है कि इसी अज्ञान, अविद्या और अशिक्षा के कारण शुद्रातिशूद्र समाज विभिन्न कर्मकांडों, बाह्याडंबरों
और धर्म के नाम पर ब्राह्मणी व्यवस्था द्वारा बिछाए गए जाल में फंस गया है| विद्या
तथा ज्ञान के अभाव में यह समाज किसी भी पत्थर को सिंदूर फांसकर उसे ईश्वर मानता है|
उसकी पूजा-अर्चा करता है, विविध भोग चढ़ाता है, मन्नते मांगता है, प्राणियों-बकरियों
की बलि चढाता है| पुत्र प्राप्ति के लिए बकरे की बलि चढाता है| ऐसे अज्ञानता की
खाई में फंसे लोगों को जागृत करते हुए सावित्रीबाई फुले सवाल करती है कि अगर पत्थर
के ईश्वर के सामने बकरे की बलि चढ़ाने से पुत्र या संतान प्राप्ति होती तो नारी-नर
विवाह क्यों करते? इसी कारण वह सबको चेताती है कि सोच-विचार कर अज्ञान को दूर करें-
“गोट्याला शेंदूर | फासुनी तेलात
वसती देवात | दगड तो ||
नवस करिती | बकरू मारीन
नवस फेडीन | बालजन्मी ||
धोंडे मुले देती | नवसा पावती
लग्न का करती | नारी-नर
सावित्री वदते | करूनि विचार
जीवन साकार | करूनि घ्या ||”23
इस तरह के कर्मकांडों, बाह्याडंबरों में फँसने
के कारण शूद्रातिशूद्र समाज परनिर्भर, दयनीय तथा दुख-दर्द में जिंदगी जीने के लिए
विवश बन गया| शूद्रों तथा अतिशूद्रों की इस दयनीय दशा का यथार्थ अंकित करते हुए
क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले ‘शूद्रांचे परावलंबन’ (शूद्रों की परनिर्भरता)
कविता में लिखती है-
शूद्र आणि अतिशूद्र | अज्ञानाने पछाडले
देव धर्म रूढी अर्ची | दारिद्र्याने गळाले
ज्ञानाची नसती डोळे | म्हणोनी न दिसे दुःख
स्वावलंबी नसे शूद्र | स्विकारती पशु सुख” 24
अर्थात् कवयित्री लिखती है कि अज्ञान के कारण शूद्र
एवं अतिशूद्र समाज ग्रसित है| दरिद्रता तथा देवधर्म, रुढी-परंपराओं तथा पूजा-अर्चा
के कारण दयनीय बन गया है| ज्ञानचक्षु के अभाव में दुःख सहन करना उसकी विवशता बन गई
है और इसी कारण वह परनिर्भर बनकर पशु-समान जिंदगी बिता रहा है| सावित्रीबाई फुले
ने तत्कालीन शूद्रातिशूद्र समाज का यथार्थ इस कविता में प्रस्तुत किया है| सावित्रीबाई
फुले हिंदु धर्म की पोल खोलते हुए कहती हैं कि जहाँ अविचार, अज्ञान तथा मूर्खता
बसती है वहाँ धर्मत्व का अभाव होता है| जहाँ निरर्थक धर्मांध का आक्रोश होता है और
स्वधर्मी को ही गुलाम बनाया जाता है, वहाँ धर्म नहीं होता|25 बिलकुल
यही अवस्था भारतीय समाज की थी| इसीकारण सावित्रीबाई फुले ने अपनी कविता तथा कार्य
के माध्यम से विषमतावादी ब्राह्मणी व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह करते हुए स्त्री-शूद्रातिशूद्र
की गुलामी की श्रृंखलाओं को तोड़ने का प्रयास किया है| वे पेशवाई व्यवस्था के विनाश
के लिए अंग्रेजी शासन की पक्षधर बनती है| स्त्री-शूद्रातिशूद्र की गुलामी से
मुक्ति के लिए शिक्षा तथा ज्ञान को मुक्तिपथ मानती हैं|
इसीकारण सावित्रीबाई फुले ज्ञान तथा शिक्षा को
मनुष्यत्व का सच्चा गहना मानती है और उनके स्वाभिमान को जगाने के लिए उन्हें शिक्षा
हासिल करने का संदेश देती है| उनकी ‘काव्यफुले’ संग्रह की ‘सामुदायिक संवाद पद्य’26 कविता इसी संदेश को अभिव्यक्त करती हैं|
उन्होंने तत्कालीन सभी शोषित-पीड़ित शूद्र -अतिशूद्र
समाज को अंग्रेजी व्यवस्था तथा शिक्षा का लाभ उठाने का संदेश दिया है| अज्ञान और
अशिक्षा के कारण भट-ब्राह्मणों ने बहुजनों का सदियों से शोषण किया | अब वह
शोषणकारी पेशवाई व्यवस्था खत्म हुई और अंग्रेजी शासन आया है| अतः सभी शोषितों को सावित्रीबाई फुले आह्वान करती है
कि-
“भट धर्माच्या क्लृप्त्या
नाना
अज्ञानामुळे शूद्रजनांना
पिळती छळती बहुतयांना
पेशवाई मेली ...इंग्रजी माऊली आली ||
शूद्र जनांना हित हे ठरले
मनुस्मृति मेली ...इंग्रजी माऊली आली ||”27
अर्थात्
अंग्रेजी शासन के कारण सदियों से यहां की शोषणकारी व्यवस्था का धार्मिक अधिष्ठान
मनुस्मृति खत्म हो गई और शूद्र समाज की दृष्टि से एक नई ज्ञान की सुबह हुई| अतः
सभी शुद्रों ने इसका लाभ उठा कर अपना पशुत्व खत्म करना चाहिए ऐसा संदेश कवयित्री
देती है|
महात्मा फुले के संघर्ष और आंदोलन के कारण
सदियों से शोषित-पीड़ित शूद्रातिशूद्रों की गुलामी की बेड़ियाँ टूट गई | उन्हें
ज्ञान के सूर्य की रोशनी प्राप्त हुई| उनका संपूर्ण जीवन शूद्रों-अतिशूद्रों की
मुक्ति के लिए समर्पित रहा| सावित्रीबाई फुले, जोतिराव फुले के इस संघर्ष, त्याग
और आंदोलन को अपने कार्य तथा आंदोलन और कविता की प्रेरणा मानती है| वह कहती है कि जोतिराव
फुले रुपी तेजस्वी, अपूर्व सूर्य ने सभी शूद्रातिशूद्रों के अज्ञान को दूर किया|
अंधेरा मिटा दिया और सबको जाग्रत किया| उनके शब्दों में-
“काळ रात्र गेली | अज्ञान पळाले ||
सर्वा जागे केले | सूर्याने या ||१३||
शूद्र या क्षितिजी | जोतिबा हा सूर्य ||
तेजस्वी अपूर्व | उगवला ||१४||”28
इसी कारण
‘बावन्नकशी सुबोध रत्नाकर’ काव्य संग्रह को उन्होंने जोतिराव फुले को
समर्पित करते हुए लिखा है कि –
“करी शूद्रसेवा दिले धैर्य त्यांना
क्रियाशील नेता असा जोतिबाचा
नसे जात त्याला तसे पंथ काही
तया बंदुनी सावित्री काव्य वाही ||३||”29
अर्थात् शूद्रों के
उद्धारक, क्रियाशील नेता जिनकी न कोई जाति है न
पंथ ऐसे शूद्रों को धैर्य प्रदान करने वाले जोतिबा को नमन कर वह अपने काव्य का प्रारंभ करती है|
संक्षेप में कह सकते है कि सावित्रीबाई फुले
की कविताओं में उनका वैयक्तिक जीवन संघर्ष
तथा जीवनानुभव भी अभिव्यक्त हुआ है जो उनकी संघर्षशीलता, काव्य की सहजता को
रेखांकित करता है| उनकी कविताएँ महात्मा ज्योतिराव फुले तथा उनके द्वारा चलाए गए
आंदोलनों का भी वर्णन करती है| अतः यह केवल कविताएँ न रहकर तत्कालीन परिस्थितियों
का ऐतिहासिक दस्तावेज लगाती हैं| सावित्रीबाई फुले ने म.फुले तथा उनके बाद का अपना संपूर्ण
जीवन स्त्री-शूद्रातिशूद्र को मुक्ति के
लिए समर्पित किया| उनका काव्य इस कार्य में उन्होंने साधन की तरह प्रयुक्त किया|
जिसके जरिए उन्होंने समाज में चेतना जाग्रत करने का प्रयास किया है| सावित्रीबाई
की कविता स्त्री, शूद्र तथा अतिशूद्र समाज में ज्ञान का दीपक जलाती है| उन्हें
अपनी गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ने के लिए जाग्रत करती है| इस संदर्भ में अॅड. राम कांडगे का कथन उल्लेखनीय है
“सावित्रीबाई का काव्य शूद्रातिशूद्रों को जाग्रत करने का साधन था| उपेक्षित समाज
के कल्याण हेतु फूटा हुआ वह उच्छ्वास था”|30
समाज में
सुख-शांति तथा समता स्थापित करने के लिए प्रेरित करती है| और इस समता के मार्ग में
बाधा बनी विषमता वर्णगत, जातिगत ऊँच-नीचता, अस्पृश्यता, धर्माडंबर, विभिन्न
कुप्रथाएँ, स्त्री-पुरुष असमानता, शिक्षा एवं ज्ञान का अभाव आदि समस्याओं से जूझने
के लिए पथ-प्रदर्शक बनती हैं| अतः आज भी सावित्रीबाई की कविताएँ प्रासंगिक है|
संदर्भ-
1)
सावित्रीबाई
फुले, जी. ए. उगले, पृ.7
2)
क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले, अॅड. राम कांडगे, पृ.147
3)
सावित्रीबाई फुले, समग्र वाड्मय, संपादक,
डॉ. मा.गो. माळी, बावन्नकशी सुबोध रत्नाकर’, पृ.83
4)
क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले, अॅड. राम कांडगे, पृ.147
5)
सावित्रीबाई फुले, समग्र वाड्मय, संपादक,
डॉ. मा.गो. माळी, काव्यफुले, पृ.4
6)
वही, पृ.5
7)
वही, पृ.6
8)
सावित्रीबाई फुले, समग्र वाड्मय, संपादक,
डॉ. मा.गो. माळी, बावन्नकशी सुबोध रत्नाकर’, पृ.83
9)
सावित्रीबाई फुले, समग्र वाड्मय, संपादक,
डॉ. मा.गो. माळी, काव्यफुले, पृ.6
10)
वही, पृ.17
11)
वही, पृ.19
12)
वही, पृ.20
13)
सावित्रीबाई फुले, समग्र वाड्मय, संपादक,
डॉ. मा.गो. माळी, बावन्नकशी सुबोध रत्नाकर’, पृ.82
14)
वही, पृ.82
15)
वही, पृ.83
16)
वही, पृ.84
17)
वही, पृ.85
18)
वही, पृ.88
19)
सावित्रीबाई फुले, समग्र वाड्मय, संपादक,
डॉ. मा.गो. माळी, काव्यफुले, पृ.21
20)
वही, पृ.24
21)
वही, पृ.21
22)
वही, पृ.27
23)
वही, पृ.22
24)
वही, पृ.25
25)
वही, पृ.83
26)
वही, पृ.31
27)
वही, पृ.21
28)
वही, पृ.34
29)
वही, पृ.81
30)
क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले, अॅड. राम कांडगे, पृ.148
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