संत रैदास की साखियाँ

संत रैदास की साखियों की प्रासंगिकता
(जाति एवं वर्णव्यवस्था के अंत का संदर्भ )

                                       डॉ. संजय रणखांबे
                                       विभागाध्यक्ष , हिंदी विभाग
                                        डॉ. अण्णासाहेब जी. डी. बेंडाळे
                                        महिला महाविद्यालय , जलगाँव


                 मध्ययुगीन भारतीय इतिहास राजनीति की दृष्टि से पराजय , अशांति और अव्यवस्था से भरा पड़ा है | ऐसे अनिश्चिता से भरे समय में सामान्य जनता का कोई आश्रयदाता नहीं था | विसंगति से भरे इस समय में भक्ति आन्दोलन ने विशेष रूप से निर्गुण संत कवियों ने अपनी नैतिक शिक्षा , सदाचार और उपदेशों द्वारा भारतीय समाज को दिशा प्रदान करने का प्रयास किया | तत्कालिन भारतीय समाज वर्णगत तथा जातिगत विषमता ,ऊँच-नीचता , कर्मकांड , आडम्बर ,अछूतप्रथा तथा विभिन्न समस्याओं से ग्रस्त था | ऐसे समाज को सत्य , धर्म ,अहिंसा , सदाचार , मानवता और आदर्श की शिक्षा एवं उपदेश देने का महत्वपूर्ण कार्य भक्ति आन्दोलन ने किया |
                  निर्गुण संत कवियों में नामदेव , कबीर , रैदास आदि ने समाज की विभिन्न कुरीतियों , कुप्रथाओं , आडम्बरों तथा  कर्मकांडों पर प्रहार कर सामान्य के सदियों से जाति , वर्ण और धर्म के नाम पर हो रहे शोषण , अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई | भक्ति के जरिये आन्दोलन चलाया | ब्राहमणवादी , वर्णवादी , जातिवादी तथा सामंतवादी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष प्रारंभ किया | इसीकारण डॉ. शिवप्रसाद शुक्ल लिखते हैं –“ भक्ति  आन्दोलन का स्वरूप मूलतः ब्राहमणवाद , वर्णवाद , और सामंतवाद विरोधी है |..... भक्ति आन्दोलन उस व्यवस्था का विरोध करता है जो मनुष्य-मनुष्य में जाति , वर्ण , धर्म , संप्रदाय , आचार-विचार के आधार पर भेदभाव करता है | कुल मिलाकर भक्ति आन्दोलन का स्वरुप मानववादी है | इसलिए वह मनुष्य मात्र के समानता की घोषणा करता है |1 इस आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य समाज के सामान्य मनुष्य को सभी प्रकार के सामाजिक एवं धार्मिक बंधनों से मुक्ति दिलाना था | इस समता की स्थापना के आन्दोलन में कबीर के साथ साथ संत रैदास का कार्य भी महत्वपूर्ण है बल्कि संत रैदास इस दिशा में उनसे पहले चल पड़े है | वर्ण एवं जाति के आधार पर सदियों से शूद्र तथा अतिशूद्र समाज के शोषण , ऊँच-नीचता , अछूत प्रथा ब्राहमण-शूद्र भेद आदि का संत रैदास जी ने अपनी साखियों में विरोध किया और अपना सम्पूर्ण जीवन जाति एवं वर्ण के अंत और समाज में समता स्थापित करने के लिए समर्पित किया |
                      वर्तमान समय में भी संत रैदास जी की साखियों का उतना ही महत्व है जितना उस युग में था | इसका कारन यह है कि आज भी भारतीय समाज में सभी विभेदों की  जड़ जातिव्यवस्था बरक़रार है | संविधान के कारण देश में सामाजिक समता स्थापित करने प्रयास किया गया है परन्तु सदियों के जातिय संस्कारों से सराबोर जन मन अभी भी उस मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाया  है | स्वाधीन भारत गाँव –गाँव में फैले जाति- उपजातियों के संगठन – पंजीकृत संगठन हमारी जतिग्रस्त मानसिकता को ही दर्शाते है | यहाँ तक कि हमारे नाम उपनाम तक हमारी जातिय मानसिकता के ही सूचक है | इस जातिय अहंकार की प्रतियोगिता में कोई जाति अपवाद नहीं  है | जातिव्यवस्था द्वारा निम्न घोषित जाति समूह के अलावा कोई जाति समूह जाति अंत की बात नहीं करता, यह सच्चाई है | इस देश की हर व्यवस्था में यह जातिय अहंता की भावना बद्धमूल है | इसीकारण संविधान को अपेक्षित शांति , सहचर्य , तथा समता की भावना समाज में निर्माण नहीं हो पा रही है | हर जाति अपनी संकीर्ण अस्मिताओं को संजोये जा रही है | इससे समाज में परस्पर संघर्ष , अशांत , असहचर्य और ऊँच-नीचता की बढती जा रही है | स्वतंत्र भारत की सांप्रदायिक तथा जातिगत हिंसा की अनगिनत घटनाएँ इसी भावना की द्योतक हैं |  अतः जब तक हमारी मानसिकता में बदलाव नहीं होता तब तक कोई भी संविधान इसे ख़त्म नहीं कर सकता | और यह मानसिकता बदलने की सामर्थ्य कबीर ,रैदास आदि संतों की वाणी में है | इसलिए इन संतों की वाणी और विचारों की प्रासंगिकता जाति अंत तक है  और रहेगी |
                   संत रैदास जी का समय मध्ययुग का 15-16वीं शती का समय था | संत रैदास जी ने अपने समसामिक समाज की विसंगतियों , कर्मकांड , आडम्बर , हिंसा तथा विभिन्न कुप्रथाओं पर प्रहार किया | विषमताधारित ब्राह्मणवादी - वर्णवादी और जातिवादी व्यवस्था के कारण समाज का शूद्र – अतिशूद्र समुदाय , सामान्य शोषित जन अत्यंत पीड़ित था | संत रैदास जी ने भक्ति के माध्यम से अपनी वाणी तथा कार्य-आन्दोलन से समाज में चेतना जगाकर जाति एवं वर्णगत असमानताओं , ऊँच-नीचता और शोषण को मिटाने का प्रयास किया | वे जाति तथा वर्ण से मुक्त समतामूलक समाज का निर्माण करना चाहते थे | इस संबंध में उनकी निम्न साखी द्रष्टव्य है –
 “ ऐसा    चाहों  राज मैं , जहाँ  मिले  सबन  को अन्न |
   छोट बड़ो सभ सम बसैं , ‘ रैदास ’ रहे  प्रसन्न   ||277||2  
जाहीर है संत रैदास जी समाज को उस रूप में देखना चाहते थे जहाँ सामाजिक और आर्थिक समता हो | जहाँ कोई छोटा अर्थात् गरीब न हो और न बड़ा अर्थात् अमीर |  संत रैदास जी यह भी जानते थे कि यह तब ही संभव है जब समाज से जाति-उपजातियां और वर्णव्यवस्था ध्वस्त हो | इसीकारण संत रैदास जी ने  कहा है कि समाज में भक्ति के मार्ग में जो ऊँच-नीचता की भावना फैली थी उसे मिटाने का और उस अज्ञात निर्गुण-निराकार ईश्वर की भक्ति करने का सबको समान अधिकार है | भक्ति एवं धर्म के क्षेत्र में हजारों वर्षों से ठेकेदार बनकर बैठे थे उनकी सत्ता को तहस-नहस करते हुए संत रैदास जी कहते है कि सभी मनुष्य उस एक ईश्वर की संतान है , निर्मिति है , वही ईश्वर घट-घट में व्याप्त है | उनके शब्दों में –
       “एक  माटी  के सभे  भांडे , सभ का  एकौ सिरजन हारा |
         रैदास व्यापै एकौ घट भीतर , सभ को एक घडै कुम्हार||84||3   
                  अर्थात् भक्ति के क्षेत्र में जो जाति-पांति  का विभाजन , ऊँच-नीचता , अहंकार की भावना थी उसे मिटाते हुए सभी मनुष्यों की समानता की बात करते है | सबको समता की दृष्टि से देखना मतलब ही यह है कि संत रैदास जी वर्ण एवं जाति विरहित समाज के पक्षधर थे और उस दिशा में कार्य करते रहे | संत रैदास जी के राम भी कबीर की तरह दशरथ सुत राम न होकर निर्गुण-निराकार राम –तत्व थे | वर्णव्यवस्था की निरर्थकता तथा विषमता का यथार्थ अंकित करते हुए वे कहते हैं कि सभी मनुष्यों की देह सामान तत्वों से बनी है परन्तु स्वार्थ और अज्ञान के कारण मनुष्य इस सच्चाई को समझ नहीं पाता और समझना नहीं चाहता | संत रैदास जी कहते है-
         “‘रैदास’ उपिजइ सभ एक बुंद ते का ब्राह्मण का सूद |
            मुरखी जन न जानइ , सभ    मंह राम  मजूद ||85||4   
या   
      “‘रैदास’  इकही  बूँद  सो , सब ही भयो वित्थार |
         मुरखी हैं जो करत हैं , बरन अबरन विचार ||86||   
या    
         “‘रैदास’  इक  ही   नूर ते , जिमि  उपज्यों संसार |
            ऊँच नीच किह बिध भये , ब्राहमण अरु चमार ||89||6    
               अर्थात् संत रैदास जी तत्कालीन समाज में वर्णव्यवस्था के कारण फैली विषमता तथा ऊँच-नीचता की भावना को मिटाने के लिए सबसे पहले तो सभी मनुष्यों की प्राकृतिक समानता का सभी जनों को ज्ञान कराते है और वर्णगत-जातिगत असमानता को अज्ञान, अशिक्षा , स्वार्थ , तथा अहंकार की दें मानते हैं | वे ब्राह्मण और शूद्र के भेद को नकारते हैं | तत्कालीन समाज में समानता के पक्षधर बनकर वे वर्णव्यवस्था के अंत की घोषणा करते हैं | वे कहते है-
“ब्राह्मण अरु चंडाल मंहि , ‘रैदास’ नंह अंतर जन |7
               मध्ययुगीन संतों , आधुनिक समाजसुधारकों तथा महापुरुषों के कार्य और आन्दोलनों के परिणामस्वरूप आज वर्णव्यवस्था दिखायी नहीं देती | परन्तु जातिव्यवस्था ने हजारों सालों से इसतरह भारतीय समाज को जकड लिया है कि भारतीय जनमानस की सोच , विचार एवं चिंतन बुरी तरह से प्रभावित रहा है | ऐसा कोई मनुष्य न मिलेगा जिसकी सोच पर जाति-उपजाति का असर न हुआ हो | इससे मनुष्य की सोच , विचार संकीर्ण बन गये हैं जिससे देश के विकास और उन्नति की बात करना ढोंग लगता है | आज मध्ययुगीन काल की तरह घिनौनी तथा अति ऊँच-नीचता , अछूतप्रथा और जातिभेद की भावना संविधान के कारण बाहरी आपसी व्यवहार में दिखाई न देती हो परन्तु हमारे मन और मस्तिष्क में जातीय संस्कारों के कारण जस-की-तस बसी हुई है और उन्हीं दकियानूसी संस्कारों के कारण पीढ़ी दर पीढ़ी विरासत के रूप में हस्तांतरित होती जा रही है | गांवों , शहरों , नगरों और महानगरों में बसे सजातीय मुहल्ले , नगर हमारी वर्तमान अत्याधुनिक युग में भी मन में बसी जातिय अस्मिता- संकीर्ण मानसिकता को ही दर्शाते हैं | इसी संकीर्ण सोच के परिणामस्वरूप देश में धर्म , जाति और उपजातिगत संगठन उभरे हैं और विषमताधारित जातिवादी , वर्णवादी व्यवस्था और सोच उसकी वृद्धि के लिए अप्रत्यक्षरूप से प्रोत्साहित कराती आ रही है | अगर हम सही मायने में देशभक्त हैं तो हमारी पहली प्राथमिकता जातिअंत की होनी चाहिए | इस जाति अंत के कार्य और आन्दोलन में भी संत रैदास की साखियाँ हमारा पथप्रदर्शन करती है |
                       तत्कालीन समय भक्ति और अध्यात्मवादी विचारों का था | उसी को आधार के रूप में स्वीकार कर संत रैदास जी ने अपने जाति अंत के आन्दोलन को प्रचारित-प्रसारित किया है | वे जातिव्यवस्था की निरर्थकता को बयान करते हुए कहते हैं कि सभी मनुष्य उस अज्ञात ईश्वर की संतान हैं | अतः  किसी को भी उसकी जन्मना जाति पूछनी नहीं चाहिए | कोई भी जाति कुजाति नहीं होती | सभी मनुष्य एक सामान हैं –
“जनम  जाति  मत  पूछिए , का  जात  अरु  पांत |
   रैदास पूत सब प्रभ के , कोउ नहिं जात कुजात ||54||8
                                         इस जातिव्यवस्था ने सामान्य मनुष्य को निगल लिया है | हम सभी भारतीय लोग इस व्यवस्था के शिकार हैं | सदियों से जाति रूपी रोग ने यहाँ की मनुष्यता को अपना शिकार बनाया है | यह भी मनुष्य जाति का इतिहास ही है कि जाति के उदय सर लेकर आज तक मनुष्य इस रोगमुक्ति के लिए प्रयास करता आ रहा है | संत रैदास भी मनुष्य के सभी प्रकार के शोषण , अन्याय और अत्याचार की कारण बनी जाति रूपी रोग से मुक्ति अर्थात् जाति अंत की बात करते हैं | संत रैदास के शब्दों में –
                 “जात पांत के फेर मंहि , उरझि  रहइ सब लोग |
                  मनुषता कूं खात हइ , रैदास जात के रोग ||55||9
                         इसीकारण उनके संबंध डॉ. एन. सिंह कहते हैं – “ उन्होंने (संत रैदास) हिन्दू-मुसलमानों में भावात्मक एकता स्थापित करने के प्रयास किये | छुआछुत तथा ‘वर्णव्यवस्था’ का विरोध कर सामाजिक स्वास्थ्य के लिए अचूक औषधि तैयार की |10   
                                      विषमताधारित वर्णवादी तथा जातिवादी व्यवस्था ने जन्म के आधार पर ऊँच-नीचता की भावना फैलाकर समाज में अपने शोषणचक्र को बनाये रखा | जो कोई इस व्यवस्था के खिलाफ बोलता है उसे दण्डित किया जाता रहा है | शूद्र तथा सभी निम्न जातियों पर नीच कहकर , अपनी जातिय अहंकार को पोषित करने के लिए अन्याय-अत्याचार किये गये , उन्हें अपमानित किया गया | इस अन्याय , अत्याचार और अपमान भरे जीवन को व्यक्त करते हुए संत रैदास जी लिखते है –
                                               “नीच  नीच  कह  मारहिं , जानत  नाहिं   नादान |
                                        सभ का सिरजन हार है , रैदास एकै भगवान ||159||11
                                इसीकारण संत रैदास जी मनुष्य की ऊँच-नीचता का मानदंड जन्म जाति के आधार पर न मानकर कर्म के आधार पर मानते है | वे कहते है कि निम्न जाति में जन्म लेने के कारण कोई नीच नहीं होता | मनुष्य को उसके कर्म हि ऊँच या फिर नीच बनाते हैं | इस संबंध में उनकी निम्न साखी उल्लेखनीय है-
                                                         “‘रैदास’ जन्म के कारनै , होत न कोउ नीच |12  
                              इसीकारण संत रैदास जी जन्म के आधार पर स्थापित वर्णव्यवस्था और जातिव्यवस्था को नकारते हैं | वे कहते हैं कि कोई ब्राह्मण वर्ण ता जाति में जन्म लेने के कारण कोई गुणवान या पूजनीय नहीं बनता – “ ऊँचे कुल के कारनै , ब्राह्मण कोय न होय |” पृ.१३९ और कोई चंडाल या शूद्र वर्ण में भले ही पैदा हो गया हो वह अगर गुणवान या प्रवीण है तो पूजनीय है-
                                        रैदास’  ब्राह्मण मति पूछिए , जउ  होंवै  गुण  हीन |
                        पूजिहिं चरन चंडाल के , जउ होंवै गुन परवीन ||163||13
              अर्थात् संत रैदास जी जन्माधारित जातिव्यवस्था का अंत करना चाहते हैं और एक नई व्यवस्था जो कर्मप्रधान हो उसकी न केवल चाह रखते हैं बल्कि उसकी स्थापना के लिए कार्य करते रहे | वे केवल एक ही  जाति अर्थात् ‘मनुष्य जाति’ को मानते हैं | इसलिए वे कहते हैं कि किसी की भी जाति नहीं पूछनी चाहिए | जाति-पांति के कोई मायने नहीं हैं | ब्राहमण , क्षत्रीय , वैश्य और शूद्र सभी एक ही जाति के हैं और वह है ‘मनुष्य जाति’ | इसप्रकार संत रैदास जी वर्ण एवं जातिविरहित समाज का निर्माण करना चाहते हैं –
                      “‘रैदास’  जात  मत  पूछिए ,  का  जात  का पात  |
                       ब्राहमण खत्री वैस , सूद , सभन की इक जात ||161||14
                  इस जातिवादी तथा वर्णवादी व्यवस्था ने ही देश को विनाश की कगार पर ला खड़ा किया है | आतंरिक अव्यवस्था , अशांति , और मनमुटाव ने देश के विकास को अवरुद्ध कर दिया है | हमारे देश में न केवल जातियां हैं बल्कि देश में स्थित विषमतावादी व्यवस्था ने उपजातियों के बीज बोकर देश को पूरी तरह से खोखला कर दिया है | संत रैदास के समय में भी उपजातियों का बोलबाला था जो सामान्य मनुष्य को उत्पीडित कर रहा था | इस सामाजिक यथार्थ को भी रैदास जी ने चित्रित किया है | संत रैदासकालीन यह स्थितियां आज भी बरक़रार है | जाति-उपजातियों में विभाजित भारत में यह जातियां ही हैं जो मनुष्य को मनुष्य से जुड़ने नहीं दे रही हैं | इसलिए संत रैदास की निम्न साखी आज भी प्रासंगिक है-
                      “जात - जात  में  जात  है , ज्यों   केलन   के  पात |
                       ‘रैदास’ न मानुष जुड़ सकै , जौं लौं जात न जात ||162||15
                    अर्थात् वे कहते हैं कि जब तक यह जातिव्यवस्था है तब तक मनुष्य मनुष्य से जुड़ नहीं सकता  | ऐसी मनुष्य मनुष्य के बीच विभाजन के बीज बोनेवाली ब्राह्मणवादी व्यवस्था कर्म-धर्म तो नहीं जानती  | इसलिए संत रैदास जी कहते है कि ऐसी व्यवस्था से अच्छी तो श्रमिक व्यवस्था है जो केवल अपने कर्म और धर्म को मानती है-
                     “धरम  करम  जानै नहीं , मन मंह  जाति अभिमान |
                      ऐसउ ब्राहमन सो भलो , ‘रैदास’ स्रमक हूँ जान ||171||16   
               निष्कर्षत: कह सकते है कि संत रैदास जी ने अपनी साखियों के माध्यम से  मध्यकालीन भक्ति परंपरा का वहन किया है तथा निर्गुण , निराकार ईश्वर की भक्ति , नैतिकता , सत्य, अहिंसा , शील और सदाचार का उपदेश दिया है | तत्कालीन समाज जाति , धर्म एवं वर्ण में विभाजित था | इस आधार पर समाज में उंच-नीचता , छुआछुत तथा भेदभाव था | अत: संत रैदास जी ने हिंदू-मुस्लिम धर्म में एकता स्थापित करने का प्रयास किया | वर्णव्यवस्था एवं  जातिव्यवस्था   के परिणामस्वरूप शूद्र-अतिशूद्र तथा सामान्य मनुष्य का जीवन अत्यंत दयनीय बन गया था | सामान्य मनुष्य जाति-उपजातियों के चंगुल में फंसकर अपने मनुष्यत्व से दूर चला गया था | जातिय अहंकार के कारण समाज से  समानता की भावना लगभग लुप्त हो गई थी | इसलिए संत रैदास जी ने अपने ज्ञान , बुद्धि और तर्क के आधार पर इस व्यवस्था पर प्रहार करते हुए इसकी निरर्थकता साबित कर दी | मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने के लिए अवरोध बनी वर्णव्यवस्था और जातिव्यवस्था के अंत की आवश्यकता न केवल प्रतिपादित की बल्कि सम्पूर्ण जीवन इस कार्य के लिए समर्पित किया | आज भी भारतीय समाज में जातिव्यवस्था अपनी जड़ें फैलाकर बसी हुई हैं | जाति एवं उपजातिगत संकीर्ण भावनाएं मन-मन में पीढ़ी दर पीढ़ी संक्रमित होती आ रही है | जाति-उपजातिगत संगठन, गाँव तथा शहरों में जाति , धर्म के नाम पर बने मुहल्ले-नगर हमारी जातिगत , धर्मगत संकीर्ण मानसिकता के ही द्योतक हैं | इसकारण संविधान में प्रतिपादित समता एवं बंधुत्व की भावना  समाज में दिखाई नहीं दे रही है | अतः अगर सही मायने में हमें समतामूलक समाज की स्थापना करनी है तो संत रैदास जी जैसे संतों के विचार और कार्य से प्रेरणा ग्रहण कर जाति अंत करना होगा | आज भी  जाति अंत की लड़ाई में संत रैदास की वाणी हमारा पथप्रदर्शन कर सकती है | इस दृष्टि से कह सकते है कि संत रैदास की वाणी आज भी प्रासंगिक है |                             
 

       संदर्भ –
1.  मध्ययुगीन भक्तिकाव्य के विचार पक्ष का आलोचनात्मक अनुशीलन , डॉ. शिवप्रसाद
 शुक्ल , पृ. 10
2.      डॉ.एन. सिंह , संत शिरोमणि रैदास वाणी और विचार, पृ. 143
3.      वही, पृ.133
4.      वही, पृ.133
5.      वही, पृ.133                             
6.      वही, पृ.133                             
7.      वही, पृ.133                             
8.      वही, पृ.138                             
9.      वही, पृ.138                             
10.   वही, पृ. 86-87                             
11.   वही, पृ.138                             
12.   वही, पृ.139                             
13.    वही, पृ.138                             
14.    वही, पृ.138                             
15.    वही, पृ.138                             
     16.  वही, पृ.139       

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