दुष्यंत कुमार की परिवर्तनवादी कविता

दुष्यंत कुमार की कविता का परिवर्तनवादी स्वर
                                                      डॉ. संजय रणखांबे
                                                      विभागाध्यक्ष , हिंदी विभाग
                                                    डॉ. अण्णासाहेब जी. डी. बेंडाळे
                                                   महिला महाविद्यालय , जलगाँव
                                                                                                                                  मोबा. 9096306029
                                                                                          Email : Dr.sanjay.rankhambe@gmail.com


“हो गई है पीर पर्वत–सी पिघलनी चाहिए ,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग , लेकिन आग जलनी चाहिए ।”
            दुष्यंत कुमार जी की ‘साये में धूप’ ग़ज़ल-संग्रह की उपर्युक्त पंक्तियां परिवर्तनवादी लडाइयों में सक्रिय कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा एवं स्फूर्ति प्रदान कराती हैं । विषमतावादी व्यवस्था के  परिवर्तन में जुटे हुए, संघर्षरत  सामान्य मनुष्य के लिए उनकी कविता उर्जास्रोत है । वे कविता को सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन का हथियार मानते हैं । इस संबंध में उनकी ‘सूर्य का स्वागत’ संग्रह की निम्न पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं –
“मैंने कुछ तेज-सा कहा है ,
यों मुझे क्या पड़ी थी
जो अपनी कलम को खड्ग बनाता मैं ?”
          डॉ. मोहन समकालीन कविता की संघर्षशीलता के संबंध में लिखते हैं – “समकालीन कविता हर तरह की विषमताओं से लड़ती हुई कविता है । अंतर चाहे वर्ग का हो , या वर्ण का या रंग का जो विषमताएं जीवन को झकझोर देती है , समकालीन कविता इनके खिलाफ खडी रहती है ।”1
         समकालीन कविता की इस प्रवृति को पूरी सामर्थ्य से अभिव्यक्त करने में दुष्यंत कुमार जी की कविता अग्रणी है । परिवर्तन के गीत जन-जन के बीच पहुँचानेवाली दुष्यंत की कविता अपनी समकालीन व्यवस्था को ध्वस्त कर नई जनकेंद्री व्यवस्था की पक्षधर है । उनकी ‘सूर्य का स्वागत’ और ‘आवाजों के घेरे’ काव्य-संग्रह की अधिकतर कविताएँ नयी समतामूलक शोषणमुक्त व्यवस्था लाने की जद्दोजहद करती दिखायी देती हैं । इसके लिए दुष्यंत की कविता अपनी समकालीन व्यवस्था से सीधा लोहा लेती हुई सामान्य जनता के पक्ष में खडी होती है । इसलिए दुष्यंत कुमार जी की कविता में सामान्य मेहनतकश आदमी की अभावभरी जिंदगी के कई चित्र अंकित हुए हैं । उसकी दयनीय दशा का यथार्थ चित्र प्रस्तुत कर दुष्यंत कुमार जी उस आदमी के मन में क्रांति की चिंगारी जलाना चाहते हैं ।
              अपनी आम जरूरतों के लिए भागता, खटता यह श्रमजीवी आदमी व्यवस्था द्वारा शोषित, पीड़ित है । अभाव तथा दुःख-दर्दभरी जिंदगी, दिन-रात की मेहनत और उस पर व्यवस्था द्वारा शोषण के कारण आम आदमी की दशा अत्यंत दयनीय बन गई है । वह शारीरिक तथा मानसिक दृष्टि से पूरी तरह से टूट गया है । कवि दुष्यंत कुमार जी ने अपनी ‘इनसे मिलिए’ शीर्षक कविता से इसी शोषित, पीड़ित जीव का सजीव अंकन किया है-
“चुकता करते-करते जीवन का सूद
बाहें ढीली-ढीली ज्यों टूटी डाल
अंगुलियाँ जैसे सूखी हुई पुआल
छोटी-सी गरदन रंग बेहद बदरंग
हर वक्त पसीने की बदबू का संग
पिचकी अमियों से गाल लटे से कान
ऑंखें जैसे तरकश के खुट्टल बान
माथे पर चिंताओं का एक समूह ।”2
            इस प्रकार दुष्यंत कुमार जी ने अपनी कविता में शहरों तथा गाँवों में निरंतर श्रम की चक्की में पीसकर , जिंदगी का बोझ उठाने के कारण घीस चुके , पीस चुके ,पसीने से तर-बतर बेहद बदरंग बने और दिन-रत माथे पर चिंताओं समूह लेकर निरंतर खटनेवाले आम आदमी की जिंदगी की कई झाकियाँ अंकित की है ।
           दुष्यंत कुमार जी ने अपनी कविताओं में सामान्य मेहनतकश आदमी की  अभाव तथा यातनाभरी जिंदगी का यथार्थ चित्रण किया हैं । कभी-कभी संघर्षरत जीवन पथ पर चलते हुए सामान्य मनुष्य छोटी-मोटी हार से निराश होता है । यह हार उसे अपने लक्ष्य से विचलित करती है । वह अपना आत्मविश्वास खो बैठता है । अपनी परिस्थितियों से हारकर बेबस बन जाता है । यह बेबस मानसिकता उसे पराधीन बनाती है । अत: अपने संघर्षमय जीवन से हताश एक आम आदमी की बेबस मानसिकता को रेखांकित करते हुए कवि लिखता है-
“खंडहरों-सी भावशून्य ऑंखें
नभ से किसी नियंता की बाट जोहती हैं ।
बीमार बच्चों से अपने उचाट हैं
टूटी हुई जिंदगी
आंगन में दीवार से पीठ लगाए खड़ी है,
कटी हुई पतंगों से हम सब
छत की मुंडेरों पर पड़े हैं ।”3
               कवि कहना चाहते हैं कि अपनी अज्ञानता, अभाव और यातनाभरी जिंदगी के कारण आम आदमी अपने मस्तिष्क की शक्ति विवेक खो बैठता है और अपनी वर्तमान दशा को प्रारब्ध मानकर उससे मुक्ति पाने के लिए किसी अज्ञात नियंता की बाट जोहता है । कवि ने ऐसी हारी हुई, बेबस मानसिकता का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत पंक्तियों में किया है ।
              दुष्यंत कुमार जी की कविता उपेक्षित जनता की अभावभरी, यातनामय जिंदगी को चित्रित कर उनमें क्रांति के लिए आवश्यक चेतना जागृत करती है । इसी कारण इन कवियों ने अपनी कविता में सामान्य मेहनतकश लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी के प्रसंगों, घटनाओं, दृश्यों को अंकित किया है । इसके लिए ये कवि हमेशा मेहनतकशों की बस्ती में ही घूमते रहते हैं । उनके जीवन के विविध पक्षों का, सुख-दुःख का चित्रण करना ही उनके साहित्य का उदेश्य होता है । वे अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता का वहन करते हुए लोगों के जीवन यथार्थ प्रस्तुत करते हैं-
“माना इस बस्ती में धुआँ है,
खाई है / खंदक है / कुआँ है / पर जाने क्यों ?
कभी-कभी धुआँ पीने को भी मन करता है ,
खाई खंदकों में जाने को भी मन करता है ,
यह भी मन करता है- / यहीं कहीं झर जाएँ
यहीं किसी भूखे को देह – दान कर जाएँ
यहीं किसी नंगे को खाल खींच कर दे दे
प्यासे को रक्त आंख मींच-मींच कर दे दें
सब उलीच कर दे दें / यहीं कहीं ।”4
               इस प्रकार दुष्यंत कुमार जी ने धुआँ , खंदक , खाई से भरे मेहनतकश वर्गों की बस्ती-झोपड़पट्टी का वर्णन करते हुए इन लोगों के लिए अपना जीवन समर्पित करने की उदात्त भावना को अभिव्यक्त किया है । अपनी दायित्वबोध की भावना के कारण ही कवि मेहनतकश लोगों के लिए सब कुछ उलीचकर दे देना चाहता है ।  
              अपनी ‘गौतम बुद्ध से’ कविता में जनता के प्रति प्रतिबद्ध कवि इस विवशता को भी व्यक्त करते है कि आज कोई  भी प्रतिबद्ध – सच्चा प्रतिबद्ध कवि अपने आसपास की अभाव , दुःख-दर्दभरी जिंदगी , कराहों और चीखों से पृथक नहीं रह सकता । कवि बुद्ध से संबोधित करते हुए कहता है-
“ये जो उठती चीख कराहें
सब गलियों सब दरवाजों से ,
सच कहना क्या बचकर जा सकते थे
तुम इन आवाजों से ?”5
              दुष्यंत कुमार जी को यह अच्छी तरह से ज्ञात है कि क्रांति का अपना समय होता है । केवल आम जनता में चेतना की जाग्रति ही परिवर्तन के लिए आवश्यक नहीं होती । जब वक्त की मार और अन्याय तथा शोषण से जर्जर आम जनता की सहनशीलता का अंत होगा तब ही परिवर्तन का स्वप्न साकार हो सकता है । कवि दुष्यंत कुमार के शब्दों में –
“सुख नहीं यों खौलने में सुख नहीं कोई ,
पर अभी जागी नहीं वह चेतना सोयी –
वह, समय की प्रतीक्षा में है , जगेगी आप
ज्यों कि लहराती हुई ढकने उठाती भाप ।
अभी तो यह आग जलती रहे , जलती रहें ,
जिंदगी यों ही कडाही में उबलती रहे ।”6
             इसका कारण यह है कि अधिक समय तक कोई भी मनुष्य अन्याय और शोषण के प्रहारों को सहन नहीं कर सकता । जब आम जनता की सहनशीलता दम तोडती है तो उमड़ते जन-सैलाब के बहाव में अत्याचारी व्यवस्था तहस-नहस हो जाती है । इस अपार जनसागर की सामर्थ्य के संबंध में कवि दुष्यंत कुमार लिखते हैं-
“कब तक सहता रहता
अन्यायी वायु के प्रहारों को मौन यों ही
गरज उठा सागर –
विवेकहीन जल है , मनुष्य नहीं ।”7
               कवि कहना चाहता है कि जब जनता को अपनी जीर्ण-शीर्ण दशा के लिए जिम्मेदार व्यवस्था तथा उन आततायियों का पता चलेगा तो वह उसे उखाड़ फेंक देगी  । इसी कारण दुष्यंत कुमार जी ने अपनी काव्य साधना के माध्यम से आम जनता को देश की वर्तमान दशा और उसमें उसकी स्थिति से अवगत करवाकर जनता में चेतना जागृत करने का प्रयास किया है । वह अपने सभी साथी कवियों , कलाकारों को भी इसी प्रकार की ‘शुद्ध चेतना’ जागृति के गीत गाने का आह्वान करता है –
“गाओ....! / काई किनारे से लग जाए
अपने अस्तित्व की शुद्ध चेतना जग जाए
जल में ऐसा उबाल लाओ.... ।”8
                   कवि अपनी समकालीन कवियों से आह्वान करता है कि वे ऐसे ओजस्वी गीत गायें जिससे आम जनता के मन में अपने अस्तित्व , स्वाभिमान की शुद्ध चेतना का संचार हो । उनके मन तथा बुद्धि पर चढ़ी अन्धविश्वास , अज्ञान , भय की काई छंट जाये । क्योंकि कवि को जनता की इस शुद्ध चेतना तथा जनशक्ति पर पूरा विश्वास है । वह मानता है कि इस अदम्य जनशक्ति का केवल एक संगठित प्रयास इस पूंजीवादी-सामंती व्यवस्था को ध्वस्त कर सकता है ।
                  अपनी इस जगी हुई क्रांति-चेतना के साथ शोषित , पीड़ित , दमित जनता अत्याचारी व्यवस्था के खिलाफ आक्रमक रूप धारण कर रास्ते पर उतरती है । जन-जन के मन में जलती यह ज्वाला एक होकर अपनी उष्णता से शोषणकारी-पूंजीवादी व्यवस्था को भस्म करने के लिए आगे बढती है । उसके इस रूप को देखकर अत्याचारी शासक भयभीत होता है । आज तक झुग्गी-झोपड़ियों, गांवों , गलियों में बदहाल जिंदगी जीनेवाले आदमी के पाँव जब राज-पथ पर पड़ने लगते हैं तो वह आततायी शासक  भयभीत होकर अपने दुर्ग में छिप जाता है और कवि से पूछता है कि यह राज-पथ की ओर कौन बढ़ता आ रहा  है ? कवि दुष्यंत कुमार ने व्यवस्था परिवर्तन के पथ पर अग्रसर जनता में जगी चेतना और उसके साहसी रूप का वर्णन करते हुए कहा है –
“आज लेकिन / आज  / वर्षों बाद /झोपड़ों से
आहटें सुन पड़ रही हैं / गली में आने
गली से राजपथ में पहुँच पाने के लिए
पगडंडियों से लड़ रही हैं..
आहटें ! / एक, दो, दस नहीं / अनगिन पगों की
रह-रह तड़पती / लडखडाती पर पास आती हुई
हर क्षण / बढ़ रही है .../ अभी होगा भग्न
दैत्याकार यह वातावरण / एक मरणासन्न रोगी की तरह
अकुला रहा है मौन / पूछती है गली मुझसे बावली –
कवि ! / राजपथ पर आ रहा है कौन ?”9
                इस प्रकार जागृत चेतना से भरा जनसागर जब अपने सदियों से हो रहे शोषण के खिलाफ पूंजीवादी व्यवस्था की ऊँची , चिकनी दीवार पर धावा बोलता है तब वह खोखली दीवार पल में ढह जाती है । कवि दुष्यंत कुमार लिखते हैं –
“दीवार, दरारें पड़ती जाती हैं इसमें
दीवार दरारें बढती जाती हैं इसमें
तुम कितना प्लास्टर और सीमेंट लगाओगे
कब तक इंजीनियरों की दवा पिलाओगे
गिरनेवाला क्षण दो क्षण में गिर जाता है ,
दीवार भला कब तक रह पायेगी रक्षित
यह पानी नभ से नहीं धरा से आता है ।”10 
               यही कारण है कि डॉ. विजय बहादुर सिंह उनकी कविता के संबंध में लिखते हैं – “ कविता को वे सिर्फ शब्दों तक सीमित रखने के कायल नहीं थे । उसे परिवर्तन के सबसे धारदार हथियार के रूप में देखने के आदी है ।”11        
               निष्कर्षतः  कह सकते है कि दुष्यंत कुमार जी यह अच्छी तरह से जानते हैं कि किसी भी समाज में समाज का सामान्य मनुष्य जो सबसे शोषित, पीड़ित है वही परिवर्तन ला सकता है । इसलिए उसकी सोयी हुई परिवर्तनवादी चेतना को जगाना ही कवि अपना कर्त्तव्य मानता है । इसलिए दुष्यंत जी की सभी कविताएँ सामान्य शोषित, पीड़ित, अज्ञान, अंधविश्वास की खंदक और खाई में फँसे हुए आदमी के मन में व्यवस्था परिवर्तन की चेतना का संचार कराती है । उसे परिवर्तन के पथ पर बढ़ने के लिए प्रवृत्त करती है । इसलिए उनकी कविता केवल कोरी कविता नहीं रहती वह व्यवस्था परिवर्तन का हथियार बनती है । जन-जन के मन की ज्वाला बनकर व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए धधकती दिखाई देती है । इसीलिए दुष्यंत की कविता परिवर्तन के पथ पर अग्रसर सामान्य मनुष्य का उर्जास्रोत है ।
संदर्भ –
1 . समकालीन कविता की भूमिका – डॉ. मोहन , पृ. 127     
2 . सूर्य का स्वागत  – दुष्यंत कुमार , पृ. 56
3 . वही , (अनुभवदान) , पृ. 68
4 . वही , (पर जाने क्यों ) , पृ. 55
5 . आवाजों के घेरे  – दुष्यंत कुमार , पृ. 87
6 . वही, (आग जलती रहे) , – दुष्यंत कुमार , पृ. 12
7 . वही, (विवेकहीन) , – दुष्यंत कुमार , पृ. 31
8 . सूर्य का स्वागत , (उबाल) , दुष्यंत कुमार , पृ. 71
9 . आवाजों के घेरे , (गली से राजपथ पर) , – दुष्यंत कुमार , पृ. 70 -71
10 . सूर्य का स्वागत , (दीवार) , दुष्यंत कुमार , पृ. 43
11.  दुष्यंत कुमार रचनावली , खंड 1, संपा. डॉ. विजय बहादुर सिंह , पृ.111 


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