केदारनाथ सिंह की कविता में अभिव्यक्त प्राकृतिक संवेदना
केदारनाथ सिंह की कविता में अभिव्यक्त
प्राकृतिक संवेदना
डॉ. संजय रणखांबे
प्रोफ़ेसर तथा विभागाध्यक्ष
हिंदी विभाग
डॉ. अण्णासाहेब जी. डी. बेंडाळे
महिला महाविद्यालय, जलगाँव
केदारनाथ सिंह नयी कविता आन्दोलन के प्रमुख कवियों
में से हैं। अपनी ग्रामीण जीवन की स्मृतियाँ, अनुभव, मानवीय
संवेदना, राजनीतिक और
सामाजिक चेतना, प्रकृति के
प्रति गहरा लगाव, प्रकृति और मनुष्य का सहसंबंध केदारनाथ सिंह की
महत्त्वपूर्ण काव्य-विशेषता है।
“रचनाकार की
सबसे बड़ी संपत्ति है- ‘संवेदना’ जिससे बहुत भीतर तक की बातें पर्त-दर-पर्त खुलती
नजर आती हैं। संवेदना के सहारे ही अँधेरे की धमनियों के संकेत दर्ज होते हैं। चाहे
मौसम के परिवर्तन हो या रोजमर्रा की जिंदगी की बदलती स्थितियाँ - संवेदना की
गहराई और व्यापकता रचनाकार की बुनियाद है।" (अज्ञेय से अरुण
कमल, डॉ. संतोषकुमार
तिवारी,पृ. 69) कवि केदारनाथ सिंह की कविता में संवेदना की यह
गहराई मौजूद है। विविधमुखी संवेदना यह उनकी कविता की विशेषता है। उनकी कविता में
ग्रामीण जीवन- संस्कृति के कईं चित्र मिलते हैं।
केदारनाथ सिंह की कविता में प्रकृति का चित्रण केवल
दृश्य अथवा पृष्ठभूमि के रूप में नहीं हुआ है। प्रकृति उनकी कविता में मनुष्य की
भावनाओं, स्मृतियों और
अनुभवों के साथ जुडी हुई है। इसी कारण आलोचक उनकी प्राकृतिक संवेदना के संबंध में
लिखते हैं- "प्रकृति केदार जी की कविताओं का विषय नहीं, उनकी सहचरी है।
वे प्रकृति को देखते भी हैं, उससे उजास भी लेते हैं और उसकी पुनर्रचना भी करते
हैं।"
(अभी बिल्कुल अभी, केदारनाथ सिंह, फ्लैप) केदारनाथ सिंह प्रकृति के प्रति अत्यंत संवेदनशील
है। वे न केवल प्राकृतिक सौंदर्य को परखते हैं बल्कि प्रकृति के साथ उनका आत्मीय
जुड़ाव है। वे प्रकृति के हर परिवर्तन को महसूस करते हैं। वे प्रकृति की भाषा से
भलीभाँति वाकिफ है। ‘प्रकृति का कण-कण' (वही) वे सुनते
हैं।
केदारनाथ
सिंह ने 'सूर्यास्त' कविता में
ढलते हुए सूरज के साथ बिखरते प्रकाश का
चित्रण करते हुए लिखा है-
"दिन ढले के
बाद / लाल, भूरी / हरी, नीली / पीत
संख्यातीत / फरफराती
धूप की उल्टी पताकाएँ" (अभी बिल्कुल अभी, केदारनाथ
सिंह, पृ. 29)
अर्थात् सूर्यास्त के समय आकाश में लाल, हरे, नीले, भूरे रंग की
छटाएँ बिखरती है। और रोशनी अब ऊपर नहीं नीचे गिरने लगती है यानी ‘धूप की उल्टी
पताकाएँ' बन जाती है।
इसप्रकार कवि ने सूर्यास्त का अत्यंत मनोहारी चित्र अंकित किया है। इस कविता के
अंत में कवि ने प्रकृति के इस रूप को मनुष्य की टूटती उम्मीदों के साथ जोडते हुए
लिखा है-
“रिक्तता में
गुनगुनाती / पताकाएँ हैं, / कि जो / अब गिर रही
हैं / गिर रही है
भागते पैरों-तले / पहियों-तले / चक्कों – तले / नगर के चौड़े पथों पर - गिर रही हैं अनवरत टूटी पताकाएँ / सात रंगों की पताकाएँ।"(अभी बिल्कुल अभी, केदारनाथ
सिंह, पृ. 30)
कवि कहना चाहते हैं कि सामान्य लोगों का जीवन इन्हीं
रंगों के साथ परिपूर्ण बन जाता है। सूर्यास्त के साथ केवल ये रंग ही नहीं मिटते
बल्कि रोजमर्रा के जीवन की व्यस्तता ने इन लोगों की ऊर्जा, चमक और
उत्साह भी छीन लिया है। कवि ने इस कविता में मनुष्य और प्रकृति के रूप में अत्यंत
सुंदर समन्वय स्थापित किया है।
केदारनाथ सिंह की ‘सुबह-पतझर' कविता जहाँ
एक ओर पतझरी हवा के रूप को चित्रित करती है तो दूसरी ओर मनुष्य के चंचल स्वभाव और
मनुष्य के मन की
बेचैनी को दर्शाती है। कवि के शब्दों में – "झर-झर-झर... / झरती हैं
पत्तियाँ सवेरे से / और हवा पागल है।"(वही, पृ. 41)
यहाँ कवि पतझर के मौसम की सुबह के माध्यम से मनुष्य
के मन की चंचलता, बेचैनी किस प्रकार घर के साथ मन को भी अव्यवस्था
में बदल देती है, इसका अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है।
केदारनाथ सिंह की 'जल-हँसी' कविता में जलाशय पर पड़ी सुबह की सुनहरी धूप का
सुंदर चित्र खींचती है। कवि को यह जल-हँसी लगती है। वह सुबह की हँसी सिहरते जलाशय के
लहरदार पानी में, बालू पर, सूखी जलघासों के पास, हल्दी के पानी के समान फैल जाती है। कवि के शब्दों
में -
“हँस दी वह
सुबह-सुबह /सिहरते जलाशय के लहरदार पानी में / बालू पर,
सूखी जलघासों के इर्द-गिर्द / हल्दी के
पानी-सी / हँसी वह फैल गई / दूर-दूर लहरों
में,
लहरों की भीतरी गुफाओं-कन्दराओं में / गूँजती चली गई!" (वही, पृ.48)
इस कविता में एक यात्री बूढे बरगद के माध्यम से उस
सुनहरी हँसी से बोलता है –
"सुबह के
स्वच्छ नील पानी में घुली हुई / उच्छल हँसी ओ सुनो,/ नाम नहीं पूछूँगा!"(वही,पृ. 49)
इस प्रसंग के माध्यम से कवि ने प्रकृति के साथ अपना
आत्मीय जुड़ाव दर्शाया है। कवि प्रकृति के साथ संवाद स्थापित करते हैं।
इसके अतिरिक्त केदारनाथ सिंह के ‘अभी बिल्कुल
अभी’ संग्रह की ‘पपीहा-दिन' और 'उषःदान' कविता भी
प्रकृति के मनोरम दृश्य को रेखांकित करती हैं। ‘उषःदान' कविता में
कवि सुबह की सुनहरी धूप का अत्यंत सुंदर चित्र खींचते हैं।
उनका प्रकृति के प्रति कोमल मन सुबह के उस धूप के गुच्छे को अपनी जेब
में रखना चाहते हैं या अपनी खास अच्छी चिटिठ्यों के बीच सहजकर रखना चाहते
हैं। काव्य-पंक्तियां
द्रष्टव्य हैं -
“सुबह नीले
व्योम से / हवा का फेंका
हुआ / जो धूप का
गुच्छा अचानक गिरा मेरी मेज पर; जी हुआ / उस मुलायम
मासूम गुच्छे को उठाकर / जेब में रख
लूँ, / बंद शीशे में
सजा दूँ,
बहुत भली चिट्ठियों के / बीच में धर दूँ।"(वही, पृ.75)
इसप्रकार कवि
केदारनाथ जी प्रकृति के प्रति अत्यंत संवेदनशीलता रखते हैं।
केदारनाथ जी की कविता में ग्रामीण जीवन के कई बिंब
सजीव हो उठे हैं जो प्रकृति का भी चित्र अंकित करते हैं। उनकी 'बैल' कविता जहाँ
समय के साथ बैल की उपयोगिता पर सवाल करती हैं वहीं प्रकृति का भी रूप लेकर आती है।
बैल भी प्रकृति का ही एक रूप है। ग्रामीण जीवन का यह आम और अत्यंत लुभावना
प्राकृतिक बिम्ब अंकित करते हुए कवि केदारनाथ सिंह जी कहते हैं -
“मैं नहीं
जानता अब भी उसकी जरूरत है / या नहीं / लेकिन वह लौट रहा है
डूबते हुए सूरज की तन्दूरी रोटी से / बेखबर / सिर्फ हवा की
नमी और घास का गट्ठर
अपनी पीठ पर लिए हुए” (जमीन पक रही है, केदारनाथ
सिंह, पृ. 38)
तंदूरी रोटी-सा डूबता सूरज, हवा की नमी और घास का गट्ठर पीठ पर लिए बैल यह सब
प्रकृति की सुंदरता को ही अंकित करता है।
केदारनाथ सिंह जी की ‘जमीन पक रही
है’ संग्रह की ‘बढ़ई और
चिडिया' कविता में
अंकित चिड़िया, जंगल की नमी, गिलहरी की
पूँछ की हरकत, बाघिन के
बच्चे प्रकृति की छवि ही गढ़ते हैं। इस तरह से अपनी कविताओं के माध्यम से
संवेदनाओं को व्यक्त करते समय प्रकृति केदारनाथ जी की सहचर बनकर साथ चलती है।
उनकी 'पेड़' कविता में वे
हमारे जीवन के साथ हर जगह किस तरह से पेड़ जुड़े हुए हैं, इसका वर्णन
करते हैं। पेड़ और मनुष्य का संबंध अटूट हैं। जहाँ मनुष्य है वहाँ पेड़ जरूर होता
है। इसी प्राकृतिक सच्चाई को व्यक्त करते हुए केदारनाथ सिंह लिखते हैं -
“पेड़ / भीड़ में छिपे
जासूस की तरह / तुम्हारा पीछा करेंगे तुम जहाँ भी जाओग”(वही, पृ.44)
केदारनाथ सिंह के काव्य संग्रह ‘सृष्टि पर
पहरा' की ‘कपास का फूल', 'घास' 'एक पुरबिहा
का आत्मकथ्य',
'फसल’, 'नदी का
स्मारक', 'जैसी कविताओं
में कपास का फूल, घास, नदी, पर्वत, खेत-खलिहान, पशु-पक्षियों उल्लेख कवि का प्रकृति के प्रति लगाव और
अपनी संवेदनाओं की ही अभिव्यक्ति है।
कवि को एक
सूखते हुए वृक्ष की फुनगी पर तीन-चार हरी पत्तियाँ उम्मीद की किरण लगती है। कवि को
लगता है मानो वे पत्तियाँ सृष्टि की रक्षा के लिए पहरा दे रही है। इस प्रकृति के
उम्मीद भरे चित्र को अंकित करते हुए केदारनाथ सिंह लिखते हैं-
“कितना भव्य
था / एक सूखते हुए
वृक्ष की फुनगी पर / महज तीन-चार पत्तों का हिलना
उस विकट सुखाड़ में / सृष्टि पर पहरा दे रहे थे / तीन-चार पत्ते”
(सृष्टि पर
पहरा, केदारनाथ
सिंह, पृ.62)
'बबूल के नीचे सोता बच्चा’ कविता
पाठकों के मन में कविता की मूल संवेदना के साथ काँटो भरे बबूल के पेड़ को भी सजीव
करती है। इस संग्रह की 'हक', 'लौटते हुए बगुले’, कवितायें
पक्षियों और बगुलों के झुंड का दृश्य मन में उभारने में सफल हुई हैं।
‘सृष्टि पर पहरा' संग्रह की 'कृतज्ञ कीचड़', कविता पर्यावरणीय चेतना को अभिव्यक्त करती है।
दुनिया बचाने की दिशा में तुच्छ कीचड़ का योगदान सराहनीय है। यह कीचड़ जंगल के
जानवरों को पानी देकर पर्यावरण की रक्षा में अपना योगदान देता है।
केदारनाथ
सिंह ने 'नये शहर में
बरगद' (आँसू का वज़न, पृ.8) कविता में
उनका बरगद के प्रति लगाव व्यक्त किया है। कवि केदारनाथ जी ने मातृभाषा कि प्रति अपने प्रेम
को व्यक्त करने के लिए भी प्रकृति के कई रूपों को उपमा के रूप अंकित किया है। उनकी
कविता में मूल संवेदना के साथ प्रकृति सहचर बनकर आती है। वे कविता में लिखते हैं कि
वे अपनी भाषा की ओर ऐसे लौटते हैं- “जैसे चींटियाँ लौटती हैं / बिलों में / कठफोड़वा
लौटता है / काठ के पास” (आँसू का वज़न, केदारनाथ सिंह, पृ. 11)
किसान जीवन से जुड़ा बिंब प्रकृति का अत्यंत सुंदर
चित्त खींचता है। केदारनाय सिंह की कविता 'जनहित का काम' की चिड़िया प्रकृति का ही एक रूप है। खेत-खलिहान और
चिड़िया की इस छवि को अंकित करते हुए कवि लिखते हैं-
“वह एक अद्भुत
दृश्य था / मेह बरसकर
खुल चुका था / खेत जुतने को
तैयार थे
एक टूटा हुआ हल मेंड़ पर पड़ा था /और एक चिड़िया बारबार-बारबार
उसे अपनी चोंच से / उठाने की कोशिश कर रही थी" (आँसू का वजन, पृ.27)
नदी किनारे के बालू पर हवा से कई
प्रकार के आकार और रेखाएँ निर्मित होती हैं। ऐसी रेखाओं के बीच कवि को अपने हस्ताक्षर
नजर आते हैं। असंख्य हस्ताक्षरों के बीच कवि को अपना हस्ताक्षर देख आश्चर्य
होता है। कवि के शब्दों में-
"बालू पर हवा
के /असंख्य
हस्ताक्षर थे / और उन्हें
देखकर हैरान था मैं
कि मेरा हस्ताक्षर / हवा के हस्ताक्षर से / कितना मिलता है।"
(उत्तर कबीर
और अन्य कविताएँ, पृ. 48)
निष्कर्ष रूप से कह सकते
है कि केदारनाथ सिंह की कविता ग्रामीण जीवन और संस्कृति का अत्यंत सूक्ष्म और
सुंदर चित्रण करती है। शहरी जीवन के भी पहलुओं को भी वह भूलती नहीं। कविता की मूल
संवेदनाओं के साथ प्रकृति उनकी कविता में घुलमिल-सी गयी है।
ग्रामीण जीवन का संपूर्ण परिवेश उनकी कविता में सजीव हो उठा है। प्रकृति के जिन
रूपों की ओर अब तक किसी का ध्यान नहीं गया था ऐसे सूक्ष्म और अछूते दृश्यों को
केदारनाथ जी ने बड़ी सहजता और सुंदरता से अपनी कविता में पिरोया है। अपनी संवेदनाओं
की अभिव्यक्ति में उनकी प्राकृतिक संवेदना सहचर बनकर आती है और उनकी कविता को सजीव
और सुंदर बनाती है।
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