सूरजपाल चौहान की कविता और संवैधानिक मूल्य
सूरजपाल चौहान की कविता और संवैधानिक मूल्य
डॉ.
संजय रणखांबे प्रोफेसर एवं
विभागाध्यक्ष
हिंदी विभाग
डॉ.
अण्णासाहेब जी. डी. बेंडाले
महिला महाविद्यालय, जलगाँव
मोबा-9096306029
ई-मेल-dr.sanjay.rankhambe@gmail.com
स्वतंत्र भारत की संविधान सभा द्वारा निर्धारित उद्देशिका में संवैधानिक मूल्यों का प्रतिपादन हुआ । 26 जनवरी 1950 से संविधान लागू हुआ। इसके बाद देश की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक स्थितियों में आमूलचूल परिवर्तन हुआ। देश की जनता के प्रति आत्मार्पित इस संविधान में देश का सामान्य जन केंद्रवर्ती है। संविधान की उद्देशिका1 तथा संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों के आधार पर विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, (संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न) समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्रात्मक गणराज्य, सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय, प्रतिष्ठा और अवसर की समता, व्यक्ति की गरिमा, राष्ट्रीय एकता और अखंडता और बंधुत्व यह संवैधानिक मूल्य हैं।
संविधान स्थापित होने के बाद भारतीय जनजीवन इन मूल्यों द्वारा ही प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित रहा है। ज्ञान की सभी शाखाओं को इन मूल्यों ने प्रभावित किया है। साहित्य अपनी संवेदनशीलता की विशेषता के कारण इन मूल्यों के प्रति अधिक आकर्षित रहा। इसी कारण देश की आजादी के बाद का और विशेषकर संविधान लागू होने के पश्चात का साहित्य मनुष्य को केंद्र में रखकर उसकी प्रभुत्व संपन्न ता को महत्व देने वाला, उसकी गरिमा, उसकी स्वतंत्रता और अस्तित्व को सहर्ष स्वीकारने वाला साहित्य सृजन हुआ।
शिक्षा का अधिकार जाति, वर्ण तथा लिंग के आधार पर संविधान लागू होने तक संकीर्ण किया गया था, सीमित रखा गया था। परंतु संविधान की धारा 21 (क) के अनुसार 2 छह वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु वाले सभी बालकों के लिए निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने का अधिकार प्राप्त हुआ। जिससे जाति, वर्ण और लिंग के आधार पर सदियों से शिक्षा से वंचित तबकों को शिक्षा प्राप्त हुई। और शिक्षा सभी परिवर्तनों का मूल होने के कारण जीवन के सभी क्षेत्रों को इसने परिवर्तित कर दिया । साहित्य में अब तक केवल विशिष्ट वर्ग एवं वर्ण की जीवन पद्धति, संस्कृति और विचारों का बोलबाला था। लेकिन नव शिक्षा प्राप्त उपेक्षित, वंचित समूह ने अपने जीवन, अपने विचार और अपनी समस्याओं को साहित्य के माध्यम से अभिव्यक्त करना प्रारंभ किया । और यही कारण है कि 1950 के बाद दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, स्त्री विमर्श जैसे विमर्शमूलक साहित्य का प्रारंभ हुआ। दलित साहित्य के अंतर्गत आत्मकथा, कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि विधाओं के माध्यम से दलित जीवन का यथार्थ और दलितों को उनकी सदियों की दासता से मुक्त करनेवाले आंबेडकरवादी विचारों का सूत्रपात हुआ। ओमप्रकाश वाल्मीकि, जयप्रकाश कर्दम, मोहनदास नैमिशराय, सूरजपाल चौहान आदि कवियों और लेखकों ने दलित जीवन के यथार्थ को और अंबेडकरवादी विचारों अपने साहित्य के माध्यम से अभिव्यक्त किया। अंबेडकरवादी साहित्य संवैधानिक मूल्यों के आधार पर लिखा गया साहित्य है।
सूरजपाल चौहान की कविता भी संवैधानिक मूल्यों की संवाहक कविता है। अब तक उनके चार कविता संकलन प्रकाशित हो चुके हैं – प्रयास, क्यों विश्वास करूं, कब होगी वह भोर और वह दिन जरूर आएगा।
धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान मूलाधार है। इस देश की एकता और अखंडता बनाए रखने के लिए संविधान कर्ताओं ने धर्मनिरपेक्षता इस मूल्य का संविधान में स्थापित किया। परंतु सांप्रदायिक ताकतें अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए और बनाए रखने के लिए धर्मनिरपेक्षता इस तत्व को बाधा के रूप में पाती है। और इसी कारण समय-समय पर धर्मनिरपेक्षता के तत्व को खंडित कर सांप्रदायिकता को बढ़ावा देती आई है। अंबेडकरवादी कवि सूरजपाल चौहान इस सच्चाई से भली-भांति परिचित हैं। इसी कारण संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए अपना दायित्व निभाते हुए ‘ग़रीबी-भेद’ कविता में लिखते हैं- “खोलकर दुकानें / मजहब और धर्म की /करता नहीं /धर्म का व्यापार /तरह-तरह के मुखोटे लगाकर /नहीं करता/ लूटमार ।”3 अर्थात कवि कहना चाहता है कि जब धर्मांध ताकते मजहब और धर्म की दुकानें लेकर बैठी हैं ऐसी स्थिति में समाज का शोषित, दलित वर्ग समूह धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में डटकर खड़ा रहता है।
यही धर्मांध ताकतें अब ताकतें अपनी सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने के लिए देश के नाम तक को बदलने का साहस कर रही है। संविधानकर्ताओं को भविष्य के इन खतरों आहट शायद कहीं ना कहीं रही होगी। यही कारण है कि भारतीय संविधान की पहली धारा में ही देश का नामकरण करते हुए संविधान कर्ताओं ने लिखा है- इंडिया अर्थात भारत।4 लेकिन सत्ता के लिए देश की अखंडता से खिलवाड़ करनेवाली ताकतें देश को एक धर्म के साथ जोड़कर उसका नया नामकरण करना चाहती है। धर्मनिरपेक्षता इस मूल्य के साथ किया गया यह सबसे बड़ा खिलवाड़ लगता है। इसका भी तार्किक चित्रण सूरजपाल चौहान की कविता करती है। वे लिखते हैं- वह- / भरमाने लगा है / ‘आई लव माय इंडिया’ को / अपनी ओछी हरकतों से / रोको उसे- पाखंडी चला है / भारत को हिंदुस्तान बनाने।”5
इस सांप्रदायिकता के चलते देश के अल्पसंख्यक समूह के मन में एक भय तथा आतंक फैलाने का प्रयास यह सांप्रदायिक ताकतें कर रही है। संविधान में प्रतिपादित धर्मनिरपेक्षता यह तत्व इन समूहों को अपना सुरक्षा कवच लगता है।इस तरह भरमाने, डराने का प्रयास करना इस कवच को ही तोड़ने का प्रयास यह सांप्रदायिक ताकतें कर रही है। उसे रेखांकित कर कवि पाठकों को आगाह करना चाहता है कि अगर वे सचेत न रहे तो उनका सुरक्षा कवच निश्चित रूप से एक दिन टूट जाएगा।
संविधान की धारा 15 (1)के अनुसार देश की जनता को समता का अधिकार प्राप्त हुआ। इसके अनुसार “राज्य, किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी के आधार पर विभेद नहीं करेगा।”6
संविधान की उद्देशिका में प्रतिष्ठा और अवसर की समता की बात कही गई है। अर्थात देश के सभी नागरिकों को प्रतिष्ठा और अवसर प्राप्ति का समान अवसर मिलेगा। यह अधिकार संविधान द्वारा इसलिए प्राप्त हुआ क्योंकि संविधान पूर्वकाल में जाति, वर्ण, लिंग आदि के आधार पर प्रतिष्ठा और अवसर प्रदान किए जाते थे। इस कारण तत्कालीन समाज में अत्यंत घिनौनी सामाजिक और आर्थिक विषमता समाज में व्याप्त थी।
इन्हीं विषमताओं के उन्मूलन के लिए और समाज में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक समता स्थापित करने के लिए और समतामूलक समाज की स्थापना के लिए निर्माण के लिए संविधान में यह मूल अधिकार देश की जनता को दिया है। और संविधान की
उद्देशिका में इसका समावेश कर भारतीय जनता के लिए एक संवैधानिक मूल्य जो सबसे अहम है, स्थापित किया। परंतु वर्तमान भारत का यथार्थ कुछ और कहता है। आज भी देश में पूरी तरह से प्रतिष्ठा और अवसर की समता स्थापित नहीं हुई है। देश की जनता के मन से जाति और वर्ण का दंभ, अहंकार अभी तक पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। यही कारण है कि सभी सेवा क्षेत्रों में विषमता और अन्याय दिखाई देता है। कवि ने अपने अनुभव को व्यक्त करते हुए लिखा है- “ पिता, / सदा यही समझाते रहे / कि- /अनपढ़ होने के कारण / करना पड़ता है / सफाई - मजदूर का काम / लेकिन पिता जी, / तुम्हारा साथी - / रामनाथ शर्मा भी तो अनपढ़ था/ फिर वह क्यों था चपरासी / और तुम...?”7
जाति और वर्ण के कारण संविधान स्थापित होने तक देश में सामाजिक और आर्थिक विषमता छाई थी। देश के शूद्र वर्ण के लोगों को या निम्न जाति के लोगों को संपत्ति या धन -संग्रह करने तक का अधिकार नहीं था। यही कारण है कि संविधान लागू होने तक देश के निम्न जाति और वर्ण के लोगों के पास अपना कोई धन या संपत्ति नहीं थी।
इस तरह से आर्थिक समता स्थापित करने के लिए अवसर की समता आवश्यक है। संविधान लागू होने तक जाति के आधार पर गांव के किसी भी हिस्से में गांव के निम्न जाति के व्यक्ति का प्रवेश तक निषिद्ध माना जाता था। इसके कारण संपूर्ण देश में हमें सामाजिक विषमता का वातावरण देखने के लिए मिलता है। आज भी इस घिनौने यथार्थ के
चित्र कमोबेश रूप में देखने के लिए मिलते हैं। यही कारण है की संविधान की धारा 15 (2) (ख) के अनुसार8 देश का हर नागरिक अपनी इच्छा से कहीं भी विचरण कर सकता है। सार्वजनिक समागम के स्थानों का उपयोग कर सकता है। परंतु समाज में यह परिवर्तन पूरी तरह से तभी संभव है, जब समाज के सवर्ण समाज के मन से जाति और वर्ण का अहंकार नष्ट हो जाएगा। उसके मन में देश की अखंडता और समता का विचार बना रहेगा। लेकिन यह बदलाव अभी तक समाज में पूरी तरह से नहीं आया है। समता के इस संवैधानिक मूल्य के समाज में पूरी तरह से स्थापित न होने के कारण कवि सूरजपाल चौहान आज भी यह इंतजार करते हैं कि “कब होगी वह भोर / जब मेरी बहन या बेटी की शादी पर / चढ़कर दूल्हा आएगा घोड़ी / घूमेगा वह / पूरे गांव की गली-गली/ कब? /न जाने कब?? / कब होगी वह भोर ???”9
जब तक मनुष्य के मन से जाति , वर्ण एवं वर्ग की भावना पूरी तरह से समाप्त नहीं होगी तब तक हमारे देश में सही मायने में अवसर की समता स्थापित होना असंभव है। गांव की तुलना में शहरों में सार्वजनिक जीवन में भले ही समता दिखाई देती हो परंतु जब कहीं नौकरी प्राप्ति की बात होती है तब हमारे मन में पहले से ही संस्कार रूप में मौजूद जाति अपना असर छोड़ देती है। कहीं-कहीं जानबूझकर कई सारे लोग केवल अपनी ही जाति के उम्मीदवार का चयन करते हैं। यही कारण है की जाति और वर्ण की मान्यता संविधान द्वारा प्रतिपादित समता की स्थापना के लिए एक बहुत बड़ा रोड़ा बनकर आज भी खड़ी है।
लेकिन 1950 के बाद काफी मात्रा में समाज तथा समाज की सोच में बदलाव भी देखने के लिए मिलता है। इसी कारण इस बदलाव को कवि सूरजपाल चौहान अपनी ‘ सभ्य होता जा रहा है मेरा देश’ कविता में व्यक्त करते हुए लिखा है – “सचमुच / अब सभ्य होता जा रहा है मेरा देश / क्योंकि / सभी को मिल गया है / पढ़ने -लिखने / और समानता का अधिकार। / मैं भी / घर बनाकर रह सकता हूं / और / रख सकता हूं संपत्ति भी । ......क्योंकि - / अब नहीं रहा / इन पर / किसी वर्ग-विशेष का अधिकार ।”10 कवि सूरजपाल चौहान जी ने संविधान ने शिक्षा, संपत्ति और अवसर की समानता का जो अधिकार देशवासियों को दिया है उसके सफल परिणामों को यहां अंकित कर संविधान द्वारा स्थापित समता इस मूल्य के महत्त्व
को रेखांकित किया है।
गांव की तुलना में शहर में सामाजिक तथा आर्थिक विषमता का चित्र अधिक उभर कर दिखाई देता है। जाति और वर्ण के आधार पर ही नहीं हमारे देश में लिंग के आधार पर भी आधी आबादी को अपने प्राकृतिक अधिकारों से वंचित रखा गया। सभी जाति, वर्ण की स्त्रियों को उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा गया। उनकी स्वतंत्रता पर पाबंदी लगाई गई। संविधान ने इन पाबंदियों को हटाकर उन्हें
मुक्त किया। स्त्री को भी एक मनुष्य के रूप में स्वीकार कर स्त्री -पुरुष विषमता को खत्म किया ।लेकिन विधि द्वारा यह स्थापित यह विचार व्यवहार में तभी स्थापित होगा जब हर मनुष्य के मन से स्त्री की ओर देखने का रवैया बदल जाएगा। गांव में आज भी स्त्री को गौण एवं हीन
समझा जाता है । लेकिन शहर में यह स्थिति नहीं है । संवैधानिक मूल्यों के
परिणामस्वरुप आए इस बदलाव को कवि सूरजपाल चौहान जी ने रेखांकित करते हुए लिखा है – “विद्यालय, / विश्वविद्यालय, / चिकित्सालय व ऊंची - ऊंची / अट्टालिकाएँ हैं / पुरुषों के संग / कंधे से कंधा मिलाकर / चलती महिलाएं हैं।”11
भारत की सामाजिक समता में सबसे बड़ी बाधा जातिवाद और छुआछूत की है। संविधान कर्ता इस सच्चाई से अच्छी तरह
से परिचित थे। यही कारण है कि संविधान की धारा 17 के अनुसार12 अस्पृश्यता का अंत किया गया है। “अस्पृश्यता का अंत किया जाता है और उसका किसी भी रुप में आचरण निषिद्ध किया जाता है। अस्पृश्यता से उपजी किसी निर्योग्यता लागू करना अपराध होगा जो विधि के अनुसार दंडनीय होगा।” इस
प्रावधान के कारण शहर तथा गांव में सार्वजनिक रूप से छुआछूत या अस्पृश्यता और जातिवाद कानूनी रूप से खत्म हुआ । परंतु यह समस्या भी मनुष्य की मानसिकता और संस्कारों की सोच से जुड़ी हुई है । इसलिए यह जातिवाद का संस्कार और अस्पृश्यता की भावना जब तक सवर्ण समाज के मन से खत्म नहीं होती तब तक यह विषमता समाज में बनी रहेगी और संविधान को
अपेक्षित समता असंभव सी लगेगी। क्यों कि आज भी गांव में हर शख्स को उसकी जाति के आधार पर पहचाना जाता है। कोई पढ़-लिख कर भले ही बड़ा ओहदा प्राप्त करें। लेकिन गांव में उसे उसकी जाति से पहचाना जाता है और संबोधित भी किया जाता है। इसलिए कवि सूरजपाल चौहान को गांव से अधिक शहर भाता है। वे लिखते हैं – “शहरों में / हम होते हैं, / सिर्फ ‘शेड्यूल का कास्ट’।”13
संविधान ने दलित, हरिजन या जातिसूचक नाम से मुक्ति दिलाकर इस समूह को ‘शेड्यूल का कास्ट’ या नामाभिधान दिया और शहरों में संविधान को लेकर
जाग्रति होने के कारण कोई अपमानजनक जाति से संबोधित नहीं करता। इसी कर्ण कवि को शहर पसंद
है। संपूर्ण देश इस जातिवाद और छुआछूत की बीमारी से ग्रस्त है। देश का विकास और देश की अखंडता के मार्ग में यही सबसे बड़ी की बाधा है ।
समाज में ऊंच-नीच का का कारण भी यही है। देश की एकता और अखंडता यह एक संवैधानिक मूल्य है। संविधान की उद्देशिका भी इस बात से हमें सूचित करती है ।परंतु जातिवाद और यह छुआछूत की प्रथा देश की जनता के मन में परस्पर विश्वास, आस्था और सौहार्द की भावना पनपने नहीं देती। इसी कारण संवैधानिक मूल्यों की स्थापना में यह एक बाधा है। इसलिए जब तक इस बीमारी का जड़ से इलाज नहीं होगा तब तक देश विकास और देश की अखंडता का स्वप्न देखना बेबुनियाद है। कवि के शब्दों में - जातिवाद / व्यक्ति विशेष में करता है अंतर / जाति में श्रेष्ठ होने का / पढता है मंतर / देश का विकास नहीं होने देता / नहीं पनपने देता / आपस में विश्वास / और / आस्था- ”14
इसी कारण कवि अपना सामाजिक और देश के प्रति दायित्व निभाते हुए देश की जनता को आवाहन करता है – “ऊंच-नीच और छुआछूत का / मत खेलो अब तुम यह खेल। प्यार के दीपक जला डगर में, / हाथ मिला आ कर ले मेल ।।”15 इसलिए कवि का कहना है कि अगर देश का सही मायने में विकास करना है , देश को एकता और अखंडता के सूत्र में बांधना है तो एक दूसरे को गलबहिया डाल कर ही चलना होगा । इस तरह की बंधुता ही भारत को अखंड और एक राष्ट्र के रूप में विश्व के सामने प्रस्तुत करेगी। इसलिए विशुद्ध बंधुत्व की या भाईचारे की भावना आवश्यक है ।
भारतीय समाज में सामाजिक विषमता के साथ-साथ आर्थिक विषमता भी मौजूद है । जाति, वर्ण और धर्म के आधार पर समाज के पिछड़े तबकों का आर्थिक शोषण किया जाता है। इसलिए भारतीय संविधान में शोषण को समाप्त करनेवाली धारा का भी प्रावधान किया है। भारतीय संविधान की धारा 23 (1)और (2) के अनुसार16 मानव के दुर्व्यापार और बलात श्रम का प्रतिरोध किया गया है । परंतु अज्ञानतावश अपनी धर्म भीरुता के कारण देश का निम्न जाति का भारतीय नागरिक अभी भी शोषण से पूरी तरह से मुक्त नहीं हुआ है। शोषण के विरुद्ध अपने अधिकार का भी उसे पता नहीं है। इसी कारण जातिव्यवस्था द्वारा सौंपे गए परंपरागत काम वह बिना किसी प्रतिक्रिया के चुपचाप करता हुआ नजर आता है। जाति व्यवस्था द्वारा निर्धारित काम मनुष्य की गरिमा को खत्म करने वाले हैं। इसी कारण भारतीय संविधान में मनुष्य की गरिमा को एक महत्वपूर्ण मूल्य के रूप में स्थापित किया है और शोषण के विरुद्ध भारतीय जनता को मूल अधिकार प्रदान किया है। परंतु अभी भी देश का चित्र कुछ विशेष रूप से बदला हुआ नहीं है। यही कारण है कि कवि सूरजपाल चौहान बौखलाहट भरे शब्दों में लिखते हैं- “ मेरी मां, बहन / और भाइयों का- / रक्त चूसने वालों / अपने आप को मनुष्य कहते / तुम्हें – लाज- शर्म नहीं आती”17
भारतीय समाज में जाति व्यवस्था और वर्ण व्यवस्था ने मनुष्य की गरिमा को छीन लिया। उसके श्रम का शोषण किया और इसके बदले में उसे केवल अपमान मिला। यही कारण है कि कवि परंपरागत भारतीय संस्कृति के इन मूल्यों को नकारता है और संविधान द्वारा स्थापित समता और न्याय इन मूल्यों को स्वीकारता है।
भारतीय समाज ने जाति एवं वर्ण व्यवस्था द्वारा संचालित की अमानवीय परंपराओं में फँस कर व्यक्ति की गरिमा को गौण स्थान दिया । उसके स्वतंत्र अस्तित्व को नकारा । जिसके कारण निम्न जाति एवं वर्ग के लोग अपने मानवीय अधिकारों से भी सदियों तक वंचित रहे। डॉ बाबासाहेब आंबेडकर के आंदोलन, संघर्ष और संविधान ने व्यक्ति की गरिमा को फिर से स्थापित किया । इसलिए आज
उपेक्षित, वंचित समूह अपने अस्तित्व और पहचान के लिए सम्मान, प्रतिष्ठा और पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। संविधान भी उन्हें उनकी गरिमा और प्रतिष्ठा प्रदान करता
है। कवि सूरजपाल चौहान व्यक्ति की सदियों से खोई हुई गरिमा के संबंध में लिखते हैं – “सचमुच, सह रहा हूं / कदम- कदम पर / ओछापन जाति का / क्योंकि- / मेरी धार्मिक / और सामाजिक पहचान खो चुकी है / घोर अंधकार में / आज भी- / लगा हूं खोज में / कि- / मैं कौन हूँ।”18
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय यह भी एक संवैधानिक मूल्य है, जो संविधान ने भारतीय मनुष्य को प्रदान किया। परंतु वर्तमान विषमतावादी व्यवस्था ने इस न्याय की अवधारणा को भी मिथ्या साबित किया है । जाति- वर्ण की मानसिकता के कारण सामाजिक न्याय असंभव लगता है। आर्थिक विषमता के कारण सामान्य मनुष्य शोषण और अन्याय के चक्कर में फंसा हुआ है। और आर्थिक ताकतों ने देश की राजनीतिक सत्ता अपने हाथों में ले ली है। यही कारण है कि न्याय नदारद है, जिससे लोकतंत्रात्मक गणराज्य यह संवैधानिक मूल्य आहत हो चुका है। कवि सूरजपाल चौहान लिखते हैं- “ मेरे देश गणतंत्र में कितना हुआ विकास। / बाबू चाचा आज भी, छील रहा है घास ।।”19 इसलिए सभी विभेदों का कारण बनी जाति एवं वर्णवादी व्यवस्था जब तक सामान्य मनुष्य का जीवन स्तर बेहतर नहीं होगा तब तक भारत सही मायने में विकसित नहीं हो सकता।
निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि सूरजपाल चौहान की कविता भारतीय संविधान की उद्देशिका में प्रतिपादित स्वतंत्रता, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्रात्मक गणराज्य, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता इन संवैधानिक मूल्यों का प्रतिपादन करती है। साथ ही भारतीय परिप्रेक्ष्य में इन मूल्यों की वास्तविकता
को भी दर्शाती है। सूरजपाल जी की कविता इस सत्य को भी उद्घाटित करती है कि जब तक
जाति, वर्ण, लिंग, वर्ग आदि के आधार पर स्थापित
विषमताओं का अंत नहीं होता तब तक संविधान द्वारा स्थापित समतामूलक समाज का निर्माण
असम्भव है। उनकी कविता इन संवैधानिक
मूल्यों को समाज तक पहुँचाने का महत्त्वपूर्ण कार्य करती है और देश के सामान्य
मनुष्य को अन्याय, शोषण, विषमता से मुक्ति पाने के लिए संविधान द्वारा स्थापित मार्ग का चयन करने के लिए प्रेरित करती है।
संदर्भ -
- भारत का संविधान, भारत सरकार, विधि और न्याय मंत्रालय विधायी विभाग राजभाषा खंड, नयी दिल्ली110001, 9 नवंबर, 2015 को यथाविद्यमान, उद्देशिका।
- वही, पृ. 13
- सूरजपाल चौहान, क्यों विश्वास करूँ, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली सं. 2004, पृ. 17
- भारत का संविधान, भारत सरकार, पृ.2
- सूरजपाल चौहान, कब होगी वह भोर, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली सं. 2012, पृ. 72
- भारत का संविधान, भारत सरकार, पृ.8
- सूरजपाल चौहान, कब होगी वह भोर, पृ. 22
- भारत का संविधान, भारत सरकार, पृ.8
- सूरजपाल चौहान, कब होगी वह भोर, पृ. 33
- सूरजपाल चौहान, वह दिन जरुर आएगा, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली सं. 2014, पृ. 44
- वही, पृ. 30
- भारत का संविधान, भारत सरकार, पृ.10
- सूरजपाल चौहान, कब होगी वह भोर, पृ.21
- सूरजपाल चौहान, वह दिन जरुर आएगा, पृ.
35-36
- वही, पृ.39
- भारत का संविधान, भारत सरकार, पृ.16
- सूरजपाल चौहान, क्यों विश्वास करूँ, पृ.38
- सूरजपाल चौहान, वह दिन जरुर आएगा, पृ.61
- सूरजपाल चौहान, कब होगी वह भोर, पृ.47
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