राजेश जोशी की कविता और मेहनतकश लोगों का संघर्ष
राजेश जोशी की कविता और मेहनतकश लोगों
का संघर्ष
डॉ. संजय रणखांबे
प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष
हिंदी विभाग
डॉ. अण्णासाहेब जी. डी. बेंडाले
महिला महाविद्यालय, जलगाँव मोबा.9096306029
ई-मेल- dr.sanjay.rankhambe@gmail.com
समकालीन हिंदी कविता में कवि राजेश
जोशी का नाम प्रमुख कवियों में शामिल है। कई समकालीन कवियों ने समाज के वंचित, उपेक्षित, शोषित, उत्पीड़ित, मेहनतकश लोगों का
अपनी कविता में चित्रण किया है।
ये सभी लोग सदियों से हमारी वर्ण एवं जाति आधारित विषमतावादी समाजव्यवस्था, धर्मव्यवस्था, अर्थव्यवथा
तथा राजनीतिक व्यवस्था द्वारा हाशिए पर ही रखा गया। इन्हें कभी भी विकास तथा
सम्मान की मुख्यधारा में शामिल नहीं किया गया। जीवन यापन करने के लिए आवश्यक साधन
जुटाने तक की स्वतंत्रता तथा अवसर तक को तक नकारा गया है। उन्हें सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक
तथा मानसिक दृष्टि से गुलाम बनाकर रखा गया। वे गुलाम मानसिकता में ही बने रहे इसके
लिए एक स्वतंत्र व्यवस्था संचालित की गयी,
जो आज भी काम कर रही है। इसीकारण वर्तमान समय में
संविधान द्वारा प्रदान की गयी स्वतंत्रता और सुअवसर के बावजूद उनकी स्थितियों में
कोई विशेष बदलाव नहीं आया है।
यही
कारण है की समकालीन कवियों ने पूंजीवादी, सामंती-व्यवस्था द्वारा होनेवाले शोषण, अन्याय, अत्याचार तथा जी तोड़ मेहनत - मजदूरी के बावजूद अभावभरी जिंदगी व्यतीत करनेवाले हाशिए के
लोगों की छटपटाहट और व्यवस्था के प्रति उनके बौखलाहट को अपनी कविता
में अभिव्यक्त किया है। समाज के ये शोषित, उपेक्षित लोग हमें समकालीन कविता में बिखरे हुए मिलते हैं। समकालीन कविता की यह प्रवृत्ति राजेश जोशी की कविता में भी प्रखरता से परिलक्षित होती है।
इसी कारण विवेक निराला जी उनके के संबंध में लिखते हैं- ‘संवेदनशीलता
और जनपक्षधरता उनकी कविताओं का सहज गुण है।’ (समकालीन
जनमत, दि.18 जुलाई,2019) उनकी प्रमुख काव्य कृतियों में- समर गाथा, एक दिन बोलेंगे पेड़, मिट्टी का चेहरा, नेपथ्य में हँसी, दो पंक्तियों के बीच, चाँद की वर्तनी, ज़िद आदि प्रमुख हैं। इनमें से इस प्रस्तुत शोधालेख हेतु नेपथ्य में हँसी, दो पंक्तियों के बीच, चाँद की वर्तनी, ज़िद इन चार काव्य-संकलनों का चयन किया है।
कवि राजेश जोशी समाज के इन शोषित, उपेक्षित, मेहनतकश - हाशिए
के लोगों के जीवन के विविध पक्षों का बड़ी सूक्ष्मता से चित्रण करते हैं। कई बार उनकी कविता में ये लोग भले ही कविता का मुख्य विषय न बन गए हो परंतु अप्रत्यक्ष रूप से उनकी पैनी नजर से और उनकी
जनपक्षधरता या सामाजिक प्रतिबद्धता के दृष्टिकोण के कारण उनकी कविता में शोषित, उपेक्षित-वंचित और हाशिए पर बसे हुए लोगों का चित्र मौजूद है। इन हाशिए के लोगों को कवि ने ‘इत्यादि’ कहकर संबोधित किया है। ‘दो पंक्तियों के बीच’ इस संग्रह की उनकी ‘इत्यादि’ (दो पंक्तियों के बीच’, पृ. 13) यह कविता लोकतांत्रिक-व्यवस्था में किस प्रकार इन लोगों अंतिम और अनुल्लेखनीय माना जाता है।
इस कविता के माध्यम से कवि कहना चाहते हैं कि हाशिए के लोगों को लोकतांत्रिक-व्यवस्था जो कि लोगों की लोगों द्वारा लोगों के लिए संचालित व्यवस्था कही जाती है। लेकिन इस व्यवस्था में भी इन लोगों को हाशिए पर फेंक दिया जाता है। जिसके पास धन होता है, वह यहाँ विशेष की पंक्ति में स्थान पाता है और जो मेहनत, मजदूरी करता है, उसे उल्लेखहीन या इत्यादि की पंक्ति में फेंक दिया जाता है।
उसके स्वतंत्र वजूद को नकारा जाता है। संपूर्ण लोकतांत्रिक-व्यवस्था के लिए उसका उपयोग किया जाता है और बड़ी चालाकी से उसे सत्ता और सुविधाओं से वंचित रखा जाता है। उसमें यह झूठ प्रचारित-प्रसारित किया जाता है कि इस व्यवस्था में उसी की सत्ता है, वही है जो सरकार बनाता है। इस तरह से भ्रम का आवरण डालकर उसके असंतोष, क्रोध और अस्तित्व को भी बड़ी चालाकी से खत्म किया जाता है।
ये ‘इत्यादि’
अपनी रोटी-कपड़ा जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में ही
अपनी सम्पूर्ण जिंदगी कट देते हैं। उनके बच्चों का भविष्य भी अंधकारमय ही होता है।
वर्तमान समाज की विषमताधारित संरचना के इस सत्य को उद्घाटित करनेवाली कवि राजेश
जोशी की ‘चाँद की वर्तनी संग्रह’ की
‘कवि
की जगह’ कविता
द्रष्टव्य है-
“समाज
की संरचना इतनी दिलचस्प थी कि आधी से ज्यादा आबादी
दो जून
की रोटी और कपड़े लत्तों की फ़िक्र में ही
अपनी
पूरी जिंदगी काट देती थी
उनके
बच्चे कुपोषण के बाद भी अगर जिन्दा रह जाते थे
तो वहीँ
धूल में खेलते हुए बड़े होते रहते थे” (दो पंक्तियों के बीच’, पृ.76 )
ये सभी इत्यादि जन समाज के विभिन्न क्षेत्रों में काम करनेवाले मजदूर, मेहनतकश या श्रमजीवी लोग हैं। श्रमजीवी लोगों के बच्चे या तो भीख मांगते पाए जाते हैं या फिर कहीं बाल मजदूरी करते हुए। राजेश जोशी जी की ‘बच्चे काम पर जा रहे हैं’ यह कविता हमारे समाज की इसी वास्तविकता को रेखांकित करती है।
इन लोगों की जिंदगी का अभाव, गरीबी, दरिद्रता उनके बच्चों का बचपन छीन लेता है। जीवन
यापन की बुनियादी चीजे जुटाने में ही उनकी सारी जिंदगी गुजर जाती है। जब मुख्यधारा के लोगों के बच्चे अच्छे-अच्छे स्कूलों में, महाविद्यालयों में पढ़ते हैं, अपने बचपन का लुफ्त उठाते हैं तब मेहनतकश लोगों के बच्चे मजदूरी करने के लिए
विवश हैं। इस सामाजिक वास्तविकता पर व्यंग्य करती हुई राजेश जोशी की ‘बच्चे काम पर जा रहे हैं’ कविता की
पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-
“काम पर क्यों
जा रहे है बच्चे?
क्या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदे
क्या दीमकों ने खा लिया है
सारी रंग बिरंगी किताबों को
क्या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने
क्या किसी भूकंप में ढह गई हैं
सारे मदरसों की इमारतें” (नेपथ्य में
हँसी, पृ. 23)
कवि कहना
चाहते हैं कि अमीर लोगों के बच्चे गेंद खेलते हैं, अच्छी-अच्छी पुस्तकें पढ़ते हैं, खिलौनों से खेलते हैं, स्कूलों में, मदरसों में पढ़ते हैं। परंतु मेहनतकश-हाशिये के
लोगों के बच्चे अपने बचपन को भूल कर काम पर जाने के लिए विवश है। ना उनके पास खेलने के लिए खिलौने हैं, न पढ़ने के लिए पुस्तकें हैं, न स्कूल और मदरसों में जाने के लिए अवसर। यही कारण है कि कवि को ‘बच्चे काम पर जा रहे हैं’ यह पंक्ति अपने समय की भयानक पंक्ति लगती है। वे लिखते हैं कि ‘बच्चे काम पर जा रहे हैं’ इसे विवरण की तरह नहीं लिखा जाना चाहिए। वे इसे सवाल की तरह कहना चाहते हैं – ‘काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?’ कवि की यह
कविता हमारे देश की व्यवस्था को इस समस्या पर सोचने के लिए विवश करती है। उनकी ‘जिद’ काव्य संग्रह की ‘नसरगट्टे’ कविता भी देश
का भविष्य अर्थात् बच्चे किस तरह अध:पतन की ओर जा रहे हैं, इसका यथार्थ
वर्णन करती है। हमारी राजनीतिक व्यवस्था, शिक्षा-व्यवस्था ने देश के भविष्य पर सोचना चाहिए। परंतु सच्चाई यह है कि राजनीतिक दृष्टि से बाल मजदूरी को अपराध बनानेवाला कानून पारित करने वाले हमारे राजनेताओं ने यह व्यवस्था नहीं की है कि सभी बच्चे शिक्षा हासिल कर सके, सभी बच्चे अपने बचपन का आनंद ले सके, सभी बच्चे अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो सके। यही कारण है कि आज भी समाज
में बाल मजदूरी जैसी भयानक स्थितियाँ देश की ज्वलंत वास्तविकता है। राजेश जोशी की कविताएँ देश की इस वास्तविकता का
यथार्थ चित्रण करती हैं।
मेहनतकश लोगों में मजदूर हमारे देश में हाशिए का समूह बना हुआ है। किसी भी दृष्टि से समाज द्वारा और व्यवस्था द्वारा उनके कल्याण एवं उन्नयन के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। अमीरों के महल घर बनानेवाले यह मजदूर जिंदगी भर अपना घर नहीं बना पाते। मजदूरों की इसी वास्तविकता को राजेश जोशी जी की ‘घोंसला’ कविता अभिव्यक्त करती है। किसी का घर बनाया जा रहा है और वह घर बनाने के लिए जो सामग्री लगेगी उसकी रक्षा के लिए मजदूर को काम पर लगाया
जाता है। वे वहीं एक झोपड़ा बनाकर रहने लगते हैं। उनके बच्चे सुबह शाम उस थोड़ी-सी जगह पर खेलते रहते हैं। मजदूर लोगों
के जीवन से जुड़े इस पहलू को उनकी ‘घोंसला’ शीर्षक कविता व्यक्त करती है-
“घर के सामने ही खुली जगह में बनने वाला था कोई मकान
नींव के लिए खोदी जा रही थी जमीन
वहीं किनारे से लगा दिया गया था बल्लियों का ऊँचा ढेर
बगल ही डाल लिया था मजूरों ने अपना झोंपड़ा
उसी थोड़ी सी जगह में खेलते रहते थे
मजूरों के बच्चे सुबह शाम!
मँडराता रहता था एक मरघिल्ला सा कुत्ता आसपास”
(नेपथ्य में
हँसी, पृ. 19)
कवि अपने आसपास जो शोषित है, जो पीड़ित है, जो मेहनतकश लोग हैं, जिसे व्यवस्था ने हाशिए पर रखा है, उसे अपनी जनपक्षधर दृष्टि से देखते है। उनके प्रति सहानुभूति रखते है। यही कारण है कि उनकी कविता
में मजदूरों के जीवन के सूक्ष्म-से-सूक्ष्म पहलू को देखा जा सकता है। मरघिल्ला सा कुत्ता, सुबह शाम खेलते मजदूरों के बच्चे, बल्लियों का ढेर, झोंपड़ा ये सारी चीजें मजदूरों के अभाव से भरे जीवन का यथार्थ तथा
कवि राजेश जोशी की हाशिए के लोगों की ओर
देखने की पैनी दृष्टि और उनके प्रति अपनी प्रतिबद्धता को व्यक्त करती है।
हमारे लिए प्लंबर भी एक सेवा देने वाला मेहनतकश मनुष्य है। जब कहीं घर के पाइप लाइन में गड़बड़ होती है तो हम उसे बुला लेते हैं। अपना जीवन निर्वाह करने के लिए वह प्लम्बर का काम
करता है। अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए हर दिन मेहनत करता है। परंतु हमारे लिए
वह कोई ऐसा इंसान नहीं है जिसका नाम याद रखा जाए। इसलिए जैसे ही हमारी जरूरत पूरी होती है फिर उसका नाम याद रखना तक हम भूल जाते हैं। हाशिए पर खड़े इन मेहनतकश लोगों के प्रति अमीर या उच्च वर्ग के लोगों का जो दृष्टिकोण है, उसे ‘उस प्लंबर का नाम क्या है’ इस कविता में व्यक्त किया है। कवि लिखते हैं-
“लेकिन घंटे भर से कोशिश कर रहा हूँ
पर याद नहीं आ रहा है इस वक्त उस प्लंबर का नाम
जो कई बार आ चुका है हमारी पाइप लाइन में
अक्सर हो जाने वाली गड़बड़ी को ठीक करने
वह कहाँ रहता है, कहां है उसके मिलने का ठीहा
कुछ भी याद नहीं
उसके परिवार के बारे में तो खैर...”
(दो पंक्तियों
के बीच, पृ. 46)
कवि कहना चाहते हैं कि हम नाकारा राजनीतिज्ञों की भरसक जानकारी रखते हैं। उन पर घंटों बोल सकते हैं। परंतु हमारे लिए सबसे उपयोगी प्लंबर जैसे सामान्य काम करने वाले व्यक्ति का नाम तक हम भूल जाते हैं। उसके परिवार के बारे में जानकारी रखना तो बहुत दूर की बात है। मेहनतकश
लोगों के प्रति उच्च वर्गीय लोगों की यह कृतघ्न मानसिकता उसे और अधिक हाशिए पर फेंक देती है।
अपने जीवन निर्वाह के लिए गैरेज पर काम करनेवाला मेहनतकश व्यक्ति भी राजेश
जोशी जी की कविता का विषय बनकर आता है। मेहनतकश इन्सान किसी भी काम को करते हुए
हिचकता नहीं। अपने कपड़ों पर पड़े मेहनत दागों पर उसे शर्म नहीं आती बल्कि उसे यह
भावना सुख पहुचती है कि उसने किसी और की रोटी नहीं छीनी। कवि राजेश जोशी की ‘दाग’ शीर्षक
कविता इसी भाव को व्यक्त करती है-
“मेरी
कमीज की आस्तीनों पर कई दाग हैं ग्रीस और आइल के
पीठ पर
धूल का एक बड़ा-सा गोल
छपका है
जैसे
धूल भरी हवाओं वाली रात में चाँद
मैं इन
दागों को पहनता हूँ
किसी
तरह की शर्म नहीं काम के बाद की तसल्ली है इन दागों में
कि किसी
दूसरे की रोटी नहीं छीनी मैंने
अपने को
ही खर्च किया है एक-एक कौर
के लिए” (चाँद की
वर्तनी, पृ.
80)
दिन-रात जनता की
सेवा करनेवाला और ‘मैं भी कई रातों से अपना घर ढूंढ रहा हूँ’(चाँद की वर्तनी, पृ. 20) कहनेवाला पुलिसवाला भी राजेश जोशी का काव्य-विषय बन गया
है।
इस प्रकार कवि राजेश जोशी जी की कविता में पाई जाने वाली
विषयगत नवीनता उनके अन्य समकालिनों में शायद ही मिलें। मेहनतकाश जिंदगी के भी कई
अछूते पहलू उनकी कविता में मुखर हो गए हैं। इसी कारण उनकी कविता के संबंध में डॉ. संतोष
कुमार तिवारी जी का यह मत कि “बिलकुल नए विषय उठाना और उन अछूते सन्दर्भों में
मानवीय दृष्टिकोण को प्रतिफलित करना राजेश जोशी की सार्थक सर्जना का द्योतक है।” (अज्ञेय
से अरुण कमल भाग -2, पृ.184)
वर्णव्यवस्था और जातिव्यवस्था ने देश का सबसे अधिक नुकसान किया है। देश वर्णों में तथा जाति एवं उपजातियों में सदियों से विभाजित है। जाति एवं वर्ण गत ऊंच-नीचता की भावना ने देश के मनुष्य को मनुष्य नहीं रहने दिया। मनुष्य के साथ उसका व्यवहार जाति एवं वर्ण की मानसिकता के कारण पशु जैसा रहा है। यह असमानता या विषमता का इतिहास सदियों से रहा है। आज भी देश वर्ण एवं जाति की घिनौनी प्रथा से निजात नहीं पा सका। गांव या शहरों में रहने वाले सभी लोग इस जाति एवं वर्ण व्यवस्था के शिकार हैं। लेकिन देश में ऐसे भी कई समूह हैं जिन्हें इस गांव और शहर की संरचना में ही शामिल नहीं किया गया। वे निरंतर घूमते रहे। यह जनजातियां घुमंतू या खानाबदोश कही गई। ऐसी ही जनजातियों में से एक बंजारा जनजाति है। यह सभी समूह हाशिए पर ही रहे। देश की आजादी तक उनके विकास एवं उन्नति की ओर किसी ने भी ध्यान नहीं दिया। आजाद देश में लागू किए गए संविधान ने इन लोगों की दुर्दशा की ओर सबसे पहले ध्यान खींचा और उनके सुधार एवं कल्याण के लिए नीतियां संचालित की गई। लेकिन आज भी यह समूह हाशिए की जिंदगी जीने के लिए विवश है। कवि की ‘नेपथ्य में हँसी’ संग्रह की पहली ही कविता ‘जन्म’ बंजारा समूह की दुर्दशा और पिछड़ेपन को अभिव्यक्त करती है। साथ ही यह संकेत देती है कि न जाने कितनी पीढ़ियां इसी तरह अंधकार की खाइयों में लुप्त हो गई। और आज जिस नई पीढ़ी का जन्म हुआ है, उसके भी भविष्य का कोई आशादायी चित्र नजर नहीं आता। ऊंट जैसे किसी जानवर पर अपना सारा संसार लादकर निरंतर भटकना ही इस समूह की नियति बन गई है। बंजारा लोगों
की जीवन की झांकी प्रस्तुत करते हुए कवि लिखते हैं-
“वह छोटी सी काली हंडिया जिसमें पकाई जाती है दाल
और रख ली जाती हैं जीवन की छोटी छोटी खुशियाँ।
पुराने अखबार का वो कोई छोटा सा टुकड़ा
जिसमें बांध कर रखा जाता है नमक
इतने सहेज कर रखती है वह बंजारन औरत नमक को
कागज में बांध लिया हो जैसे उसने पूरा अरब सागर।”
(1नेपथ्य में हँसी, पृष्ठ 9)
कवि बंजारा समाज की इस दशा को देखकर बेचैन हो जाता है। कवि के घर के सामने ही उन्होंने अपना डेरा डाला है और वही सड़क के किनारे बंजारन बहू अपने बच्चे को जन्म देती है। कवि ने इस मार्मिक दृश्य को रेखांकित करते हुए देखा है-
“सड़क के एक किनारे, पान की गुमटियों के पीछे
एक छोटे से टाट की आड़ और लालटेन की मद्धिम रोशनी में
बंजारन बहू ने जन्म दिया है अभी अभी
एक बच्चे को!”
(नेपथ्य में हँसी, पृष्ठ 9)
बंजारों का यह जीवन देखकर और इस तरह सड़क पर
बच्चे का जन्म होता देखकर कवि की आत्मा बेचैन होती है।
बंजारों की तरह ही नट भी एक जनजाति है। नट लोग जानलेवा करतब दिखाकर अपना गुजारा करते हैं। यह जनजाति भी सदियों से समाज एवं व्यवस्था द्वारा उपेक्षित और वंचित रही है।
हाशिए पर रही है। इसका भी चित्र राजेश जोशी जी की कविता में मिलता है। राजेश जोशी जी की ‘नट’ कविता इस समूह की दुर्दशा और जीवन के प्रति आशावादी दृष्टिकोण व्यक्त करती है। वे लिखते हैं-
“दीमकें जगह जगह से खा चुकी हैं तुम्हारे बासों को
भूख खा चुकी है तुम्हारा सारा बदन
कदमों को साध कर चलते हो जिस रस्सी पर
इस छोर से उस छोर
टूट चुके हैं उसके रेशे, जर्जर हो चुकी है वो रस्सी
जब जब शुरू करते हो तुम अपना खेल
कहीं बहुत करीब से आती है यम के भैंसे के खुरों की आवाज
कहीं बहुत पास सुनाई पड़ती हैं
उसके गले में लटकी घंटियाँ।”
(नेपथ्य में
हँसी, पृ.13)
कवि कहना चाहते हैं कि सदियों से नट समूह आज भी रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं से उपेक्षित रहा है, हाशिए पर रहता आया है। निरंतर भूख से उसका सारा बदन जर्जर हो चुका है। जिस रस्सी पर वह चलता है उसके रेशे-रेशे टूट चुके हैं। इस कारण जब वह अपना खेल प्रारंभ करता है तब ऐसा लगता है कि वह उस रस्सी से गिरकर कहीं मर ना जाए। लेकिन उसे अपनी रस्सी पर पूरा भरोसा है। इसलिए वह कहता है कि वह उस जर्जर रस्सी पर नहीं चलता भरोसे की डोर पर चलता
है। नट समाज की यह उपेक्षित और दरिद्रता भरी जिंदगी का अत्यंत मार्मिक चित्र राजेश जोशी की कविता करती है।
रोजी-रोटी की तलाश
में मजदूरों का एक जगह से दूसरी जगह पर जाना, यात्रा करना विवशता है। जब भी वे
यात्रा करते हैं तो उनके साथ उनका सारा घर-संसार होता है। लकड़ी का गट्ठर लेकर वे रेल में किसी भी बोगी में चढ़कर यात्रा करना चाहते हैं। परंतु सह यात्रियों की उनकी ओर हिकारत की नजर उन्हें बेचैन कर देती है। उन्हें छोटी सी जगह चाहिए होती है। परंतु इन मजदूरों की ओर देखने का हमारा रवैया उन्हें पैर रखने के लिए एक छोटी सी जगह भी नहीं देना चाहता। इसी सच्चाई को और समाज की वास्तविकता को दर्शाते हुए ‘थोड़ी सी जगह’ इस कविता में कवि राजेश जोशी लिखते हैं-
“सिर पर लकड़ी का गट्ठर लिए
वे दौड़ रहे हैं प्लेटफार्म पर
किसी बोगी के दरवाजे में अपना गट्ठर चढ़ा
किसी भी कोने में सिकुड़ कर बैठ जाएंगे वे
चारों ओर हिकारत फैंकती तुम्हारी नजरों के बीच
वे तलाश रहे हैं
एक छोटी सी जगह!”
(नेपथ्य में
हँसी, पृ.21)
ऐसा नहीं कि इन लोगों को केवल यात्रा के दौरान ही जगह नहीं दी जाती या सभ्य सुसंस्कृत समाज के लोग देना नहीं चाहते। बल्कि यह तथाकथित सभ्य समाज इस पृथ्वी पर ही इन लोगों के अस्तित्व को हिकारत भरी दृष्टि से देखता हैं। इसी वास्तविकता को प्रस्तुत कविता स्पष्ट करती है।
‘बहुत थोड़ी सी जगह चाहिए उन्हें पृथ्वी पर’ (नेपथ्य में हँसी, पृ. 21) यह पंक्ति सभ्य, सुसंस्कृत
समाज का इन हाशियों पर फेंके गए लोगों के प्रति जो रवैया है, उसे ही व्यक्त करती है।
इसके
अतिरिक्त कवि राजेश की कविता में पीढ़ी-दर-पीढ़ी मनोरंजन का काम करनेवाले ‘मसखरे’, ‘बिजली का मीटर पढ़ने वाला व्यक्ति’, मछुआरे, चाय
बेचनेवाले, इंजन ड्राइवर आदि श्रमजीवी समाज के लोग भी दिखाई देते हैं।
कवि ने लिखा है कि अपने हक एवं अधिकार को प्राप्त करने की लड़ाई में यह मेहनतकश
लोग कभी-कभी निराश होते हैं। परंतु उनकी निराशा अधिक समय तक नहीं रहती। वे दुनिया के किसी भी कोने में हुए अन्याय और अत्याचार का विरोध करते हैं। रैलियां निकालते हैं। मीटिंग का आयोजन करते हैं। और उस अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध प्रस्ताव पारित करते हैं। उसकी एक खबर बनाते हैं और स्वयं ही अखबार के लिए भेज देते हैं। कभी-कभी उनकी खबर अखबारों में छपकर आती है। कभी खुद ही रात-रात भर जाग कर मशालें, पोस्टर और प्ले कार्ड बनाते हैं। रैली में जुट जाते हैं। अगर सौ लोग भी उनसे जुड़ जाते हैं तो उत्साह से भर जाते हैं। दुनियादार लोगों की दृष्टि से वे हंसी का बहाना बनते हैं। लोग जब उन्हें पूछते हैं कि क्या होगा आपके इस छोटे से विरोध से, परंतु वे पलट कर यह भी नहीं पूछते कि तुम्हारे चुप रहने में ही कौन-सा बड़ा कमाल कर दिया है इस दुनिया में। इस कविता में इस सच्चाई को भी उद्घाटित कर दिया है कि समाज के दुनियादार कहे जानेवाले लोगों की चुप्पियों ने ही अपराध और अपराधियों की संख्या बढ़ाई है। अन्यायियों के हौसले बढ़ाए हैं। और आज तक छोटी-छोटी आवाजों ने ही अत्याचारी सल्तनतकों बदल कर रख दिया। आदि। (जिद, पृ. 33-35) इसी कारण आर.
शशिधरन उनकी कविता के संदर्भ में लिखते हैं – “राजेश
जोशी की कविताएँ उन लोगों का यशोगान करती हैं जो निरंतर संघर्ष करते हुए जीवन को
बदलने का ताव रखते हैं।” (कविता का वर्तमान , संपा. डॉ. पी. रवि, पृ. 79)
निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि राजेश जोशी की कविता मेहनतकश जिंदगी के
अनछुए पक्ष को छूती है। उनकी कविता में वे मेहनतकश लोग दिखाई देते हैं जिन्हें
सदियों से हाशिये पर रखा गया, जिनकी जिंदगी को कभी कभी मुख्यधारा के समाज या
व्यवस्था ने स्वीकार नहीं किया। उनकी कविता हाशिये के इन लोगों की जिंदगी के
सूक्ष्म-से-सूक्ष्म पहलू को स्पर्श करती हुई उनकी
संघर्षशीलता को भी अभिव्यक्त करती है।
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