निर्बलतम के गीत गाती अरुण कमल की कविता
निर्बलतम के गीत गाती अरुण कमल की कविता
डॉ. संजय रणखांबे
प्रोफ़ेसर तथा विभागाध्यक्ष
डॉ. अण्णासाहेब जी. डी. बेंडाले
महिला महाविद्यालय, जलगाँव
मोबा.9096306029
शोध सार :
प्रस्तुत शोधालेख में कवि अरुण कमल के ‘मैं वो शंख महाशंख’ और हालिया प्रकाशित ‘योगफल’ इन दो काव्य-संग्रहों की समाज के
निर्बलतम वर्ग के जीवन पक्षों को अभिव्यक्त करती कविता का विवेचन किया गया है।
अरुण कमल जी की इन दोनों संग्रह की कविताओं में समाज के उपेक्षित, वंचित, शोषित, निर्बल वर्ग का यथार्थ
चित्रण किया है। वे अपनी कविता के माध्यम से इन लोगों का पक्ष लेकर व्यवस्था से
लड़ने के लिए भी तैयार है। कवि की इस जनपक्षधरता तथा संघर्षशीलता को भी इस शोधालेख
के जरिए रेखांकित किया है। पूँजीवादी-व्यवस्था द्वारा हमेशा से समाज के निर्बलतम तबके की
उपेक्षा की जाती है, कवि अरुण कमल जी की कविता में मौजूद इस वर्ग की उपेक्षित जिंदगी के कई चित्रों
को इस शोधालेख के माध्यम से प्रस्तुत किया है। लोकतांत्रिक देश में निर्बल वर्ग के
नाम पर भले ही योजनाएँ बनती हो परंतु राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था की मिली भगत
से वे योजनायें पूंजीपतियों द्वारा हथिया ली जाती है। इस सच्चाई को भी अरुण कमल की कविता के माध्यम से इस
शोधालेख में उद्घाटित करती है।
बीज शब्द : निर्बलतम, पूँजीवादी-व्यवस्था, संघर्षशीलता, शोषण, जनपक्षधरता, मेहनतकश,
श्रमजीवी, लोकतांत्रिक, विषमतावादी-व्यवस्था।
मूल शोधालेख :
समकालीन कविता के अंतर्गत 90 के दशक से अब तक निरंतर काव्य-सृजन से जुड़े जनपक्षधर कवि अरुण कमल जी के अब तक पाँच काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए हैं। ‘अपनी केवल धार’ इस पहले काव्य-संग्रह से उन्होंने अपनी जनपक्षधरता घोषित की और पाँचवें संग्रह ‘योगफल तक बरकरार है। अपनी कविता के माध्यम से कवि अरुण कमल जी ने समाज के शोषित, पीड़ित और असहाय मेहनतकश या श्रमजीवी वर्ग का पक्ष लेते हुए उसके जीवन के विभिन्न पहलुओं का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है। इस शोधालेख के लिए उनके ‘मैं वो शंख महाशंख’ और ‘योगफल’ इन दो शब्दों का चयन किया गया है।
कवि अरुण कमल जी अपनी कविता के माध्यम से समाज के निर्बल लोगों का चित्र अंकित करते हैं। कविता का दायित्त्व प्रतिपादित करते हुए अरुण कमल जी ने लिखा है – “कविता निर्बलतम का पक्ष है। जिसका कोई नहीं उसकी कविता है। जो सबसे कमजोर, दलित और असहाय है उसका बल है।”1 समाज का निर्बल वर्ग वह कहलाता है जो आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से कमजोर हैं, जो पूंजीवादी-व्यवस्था द्वारा किसी-न-किसी तरह से शोषित, पीड़ित और असहाय है। इस दृष्टि से अरुण कमल की कविता में आर्थिक दृष्टि से निर्बल वर्ग के जीवन के कई पक्ष हमें देखने के लिए मिलते हैं। समाज का निर्बल वर्ग मतलब मेहनत, मजदूरी करने वाला मजदूर, किसान है। ‘मैं वो शंख महाशंख’ संग्रह की पहली ही ‘जनगणना’ शीर्षक कविता में जो एक अंक है, जो शंख या महाशंख है वह समाज का उपेक्षित, वंचित, निर्बल जन है। गणना में जो सबसे अंत में होता है, वह निर्बलतम जन होता है। पूंजीवादी-व्यवस्था द्वारा जिसके पास पूंजी है वह ऊंची श्रेणी में आता है, वह अमीर कहलाता है और जो निर्धन है, गरीब हैं, निर्बल है वह अंत में आता है। उसे गिनती में भी नहीं रखा जाता। शंख महाशंख यह एक गणना परिमाण है। जैसे दशक, शतक, सहस्त्र, लक्ष, दशलक्ष, करोड़, शंख, महाशंख आदि। कवि राजेश जोशी इसे ‘इत्यादि’2 कहते हैं। अर्थात् लोकतांत्रिक देश में इस निर्बल वर्ग के नाम पर भले ही कई योजनाएँ बनती हो
परंतु उसका सारा लाभ पूँजीवादी ताकतें ही उठाती है। पूंजीवादी-व्यवस्था द्वारा सारी योजनाएँ, गतिविधियाँ केवल उच्च वर्ग के हित को ध्यान में रखकर संचालित की जाती है, अंमल में लायी जाती है। इन योजनाओं में इस निर्बल जन के लिए कोई स्थान नहीं होता। जनगणना करते समय भी उसकी गिनती की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता। कवि अरुण कमल जी ने व्यवस्था द्वारा इस जन की उपेक्षा की नीति का सत्य उद्घाटित करते हुए लिखा है – “मैं वो हूँ जिसकी गिनती होने से रह गई / पूरी आबादी में जो एक कम होगा वो मैं हूँ / जिसके वास्ते किसी अदहन में डाला नहीं जाएगा चावल / जिसके नाम की रोटी नहीं पकेगी वो मैं हूँ / वो मैं हूँ मैं वो अंक वो शंख महाशंख”3 इस निर्बल जन के लिए व्यवस्था किसी भी तरह की योजनाएँ उस तक पहुँचने नहीं देती। अर्थात् कवि कहना चाहते हैं कि पूंजीवादी-व्यवस्था में निर्बल जन के लिए कोई स्थान नहीं है। उसके लिए ‘चावल’ और ‘रोटी’ तक की व्यवस्था न होने का अर्थ यह है कि जितनी भी योजनाएँ पूंजीवादी-व्यवस्था द्वारा संचालित की जाती है, उनमें केवल ऊंचे या पूंजीपतियों का हित होता है।
निर्बल जन पराधीनता में अपना जीवन यापन करने के लिए विवश है। वह अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए भी पूंजीपतियों पर निर्भर है। पूंजीवादी-व्यवस्था इसी कारण इनका शोषण करती है। इस व्यवस्था द्वारा उस पर अन्याय, अत्याचार किए जाते हैं। अपनी व्यवस्था को बरकरार रखने के लिए यह विषमतावादी व्यवस्था इस निर्बल जन पर अपना खौफ, डर बना कर रखना चाहती है। इसी कारण यह जन निरंतर भय या डर के साए में अपनी जिंदगी यापन करता है। निर्बल जन के इस डर को व्यक्त करते हुए अरुण कमल जी ने लिखा है – “मैं जी रहा हूं एक एक साँस गिनता / अभी अगले पल कुछ भी हो सकता है / मेरी नाव डूब रही है मेरा घर गिर रहा है / मेरा रास्ता रसद पानी बंद / मेरे पैरों के नीचे फट रही है धरती / मैं डूब रहा हूँ”4
जीवन के कटु अनुभवों ने इस निर्बल जन को यह सिखा दिया है कि इस जीवन में उसे उसकी अवस्था के साथ तब तक जिंदा रहना है जब तक साँस चलती है। वह किसी से कोई उम्मीद नहीं रखता। उसे किसी का आश्रय या सहारा नहीं है। उसकी दयनीय अवस्था का यथार्थ चित्रण करते हुए कवि ने लिखा है – “जीता रहूंगा / उस पेड़ की तरह जिस पर ठनका गिरा / उस कुत्ते की तरह जिसकी देह में खौरा है / उस पक्षी की तरह जिसके पंख झड़ रहे हैं / मैं एक टूटी सड़क की तरह जिंदा रहूँगा / एक सूखी नदी की तरह अगले आषाढ़ तक”5 इस तरह से कवि अरुण कमल जी ने निर्बल वर्ग की असहायता का चित्रण किया है।
इन निर्बल जन समूह में अस्पताल में सेवा-सुश्रुषा का काम करने वाला ‘सेवक’ भी एक है। वह मरिजों के बीच रहकर अपने संवेदनशील मन के कारण बेतहाशा बेचैन रहता है। किसी भी स्थिति में वह अपना काम छोड़कर दूसरा काम करना चाहता है। परंतु व्यवस्था इस निर्बल जन के लिए कोई विकल्प नहीं रखती ही नहीं। हर निर्बल जन अपना चला आ रहा काम करने के लिए विवश है। वह हिम्मत कर कोशिश करें तो भी कह नहीं सकते कि उसे कोई अन्य काम मिले। निर्बल जन की इसी विवशता को चित्रित करते हुए कवि अरुण कमल जी ने अपनी ‘सेवक’ कविता में लिखा है - कई बार मन में बाँधा कोई और काम खोजूँगा / स्कूल की दरबानी या बच्चों का रिक्शा हाकूँगा / पर धीरे-धीरे ऐसा समय आता है / जब सारे रास्ते पानी में डूब जाते हैं / जब तुम्हारा सोचा कुछ नहीं होता”6 पूँजीवादी व्यवस्था अपना शोषणचक्र बरक़रार रखने के
लिए कई हथखंडे अपनाता है और जो जिस व्यवस्था में फँसा है उसे वहाँ से निकलने के
सारे रास्ते नियम, अनुभव आदि शर्तों के आधार पर बंद करता है।
निर्बल जन अर्थात् मेहनतकश, श्रमजीवी वर्ग अपने आर्थिक अभाव के कारण शहरों में अत्यंत दयनीय स्थिति में जिंदगी व्यतीत करने के लिए मजबूर है। शहरों में यह लोग झुग्गी- झोपड़ियों में झोपड़पट्टी में, गंदगी के बीच रहते हैं। इनमें तरह-तरह की मजदूरी करनेवाले मजदूर तथा फैक्ट्री के दरबान आदि आते हैं। उनकी जिंदगी का यथार्थ चित्र खींचते हुए कवि अरुण कमल जी ने लिखा है – “पीछे नाला है / दाहिने मैदान और झाड़ / और आगे नल पर बर्तनों की कतार / चारों तरफ मक्खियाँ / और तुम्हारे लंबे हाथ सूखे आम्रपल्लव”7
कवि अरुण कमल जी की ‘दूसरा आँगन’ कविता के पहले उपखंड- ‘जब तुम किसी के करीब आते हो’ उपशीर्षक की कविता में अपनी जिंदगी के संघर्ष से जूझता निर्बल-जन ‘किसी कटे उदास खेत’ की तरह लगता है। इस निर्बल जन को पूँजीवादी ताकतें धन और सत्ता हथियाने के लिए धर्म, जाति या देश में विभाजित करती है। इस विभाजन की राजनीति के लिए जिन लोगों का उपयोग किया जाता है वे भी निर्बल ही होते है। वे अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए पूँजीवादी इशारों से बँटवारे का चाकू चला रहे हैं। जैसे ही यह निर्बल जन दूसरे निर्बल जन के घर जाता है तो पाता है कि उसके घर में भी वही अभाव, समस्याएं हैं जो यहाँ वह देख रहा है। इसके घर की फटी चादर, चाय के लिए मंगवाई गई चीनी की एक पुड़िया, पड़ोसी से लाया गया दूध, खाँसती हुई माँ, प्यारी बच्ची, उसका नन्हा भाई, दहेज के कारण बिनब्याही बहन और कर्ज में डूबा हुआ निर्बल जन उसे अपने घर की याद दिलाते हैं। और वह अपना चाकू वापस आस्तीन में खोज कर दबे पाँव निकल जाता है।8 इस कविता के माध्यम से परिस्थितिवश कठोर बने निर्बल वर्ग की संवेदनशीलता का
चित्रण किया है।
निर्बल जन की जिंदगी के कई चित्र अरुण कमल की कविता में अंकित है। टीटीई वीरेश चंद्र की स्मृति में लिखी कविता ‘आवर्त’ में कवि ने रेल से माथे पर लकड़ियों का गट्ठर लेकर जाने वाली औरतें, दिहाड़ी मजदूर और गाकर भीख मांगने वाले साधु फ़क़ीर का चित्र उतारते हुए कवि ने लिखा है – “वे बूढ़ी औरतें माथे पर लकड़ियों का गट्ठर लिए / देखेगी आसरा तुम्हारा / वे दिहाड़ी मजदूर जिनसे कभी तुमने टिकट नहीं माँगा। / और वे गाकर भीख माँगने वाले साधु फकीर”9
कवि अरुण कमल जी की ‘महाशक्ति’ कविता में बिजली के खंभे को रंगने का काम करने वाले मजदूर की जिंदगी का तथा प्रशासन की क्रूरता का वास्तविक चित्रण किया है। खंभे को रंगने का काम करने वाला मजदूर अंतिम खंभे को रंग रहा है और आज ठीकेदार मजदूरी भी देगा यह सोच कर आनंदित है। परंतु बिजली के करेंट से वह खंभे पर ही चिपक कर मर जाता है। इस यथार्थ दृश्य का कारुणिक चित्रण करते हुए कवि ने लिखा है – “वह टँगा रहा ऊपर खम्भे पर वैसे ही जैसे कोई / कनकौवा फँसा हो लेकिन कोई फड़फड़ नहीं / ‘उसको करेंट मार दिया... दौड़ो’ ”10 जब वह खम्भे पर चिपक कर मरता है तो उसे देखने के लिए उसकी बीवी, बच्चे और माँ समेत रिक्शेवाले, ठेलेवाले आते हैं। परंतु अधिकारी गुस्से में कहता है – ‘जल्दी उतारो बेवकूफ को’।11 मजदूरों में अपनी समान समस्याओं, समान दु:ख, दर्द के कारण कुछ मायने में संगठन भी है। इसी कारण इस घटना पर एक मजदूर कहता है – ‘वह हमारा भाई था हमारा साथी मजूरा।’12 इस घटना-प्रधान कविता के माध्यम से कवि ने निर्बल वर्ग की
जिंदगी की दर्दनाक तस्वीर प्रस्तुत की है।
इस तरह का काम करने वाले सभी असंगठित मजदूर होते हैं। ये लोग किसी यूनियन के सदस्य भी नहीं होते। इनके आगे-पीछे भी कोई नहीं होता। यह दिहाड़ी मजदूर कहलाते हैं। इसी कारण हर कोई इनके साथ अपमान भरा व्यवहार करता है। अगर कहीं काम कर रहे हैं और वहाँ कुछ चोरी हुई या कुछ गलती हुई तो अक्सर इल्जाम इन दिहाड़ी मजदूरों पर ही डाला जाता है। अरुण कमल की ‘खुली मुट्ठी’ कविता भी मजदूरों के इसी अपमान से भरे पक्ष को उद्घाटित करती हैं। इस कविता में फ्लैट रंगने का काम करने वाले मजदूरों को एक नौजवान फ्लैट के अंदर घुसता है और उन्हें बाहर खींचता है। और अपनी कार की बड़ी पर पड़ी खरोंच दिखाकर कहता है कि ‘यह खरोंच तुमने सायकिल से मारी’13 और उनकी दोनों सायकिलें उठाकर बाहर फेंक देता है। इस पर वे काम रोक देते हैं। कवि लिखते हैं कि उनकी एक तरह से यह हड़ताल है। ऐसे मजदूरों के लिए उनकी सायकिल सब कुछ होती है। कवि के शब्दों में – “साइकिल उनके लिए पैर थी, बैल थी, घोड़ी थी / कार मोटर जहाज अन्न धन्न थी”14 इस तरह से कवि ने मजदूरों के जीवन के सूक्ष्म पहलुओं
का मार्मिक चित्रण किया है।
मेहनतकश जिंदगी जीने वाले कई लोग कवि अरुण कमल की कविता में मौजूद हैं। जैसे- सड़क बुहारने वाले, अस्पताल में दवा-दारू करने वाले ब्रदर या नर्स, गोताखोर आदि। कवि के शब्दों में - “मैं उन्हें खोजता हूँ जो रात रहते आए / और बुहार गए मेरी गली / मैं उन्हें खोजता हूँ जो रात के दो बजे मेरा ललाट छू / हाथ में नब्ज ले एक खुराक दवा दे चले गए / × × × / अभिनंदन करो उन गोताखोरों का / जो बहती जान को खींच
लाए भँवर से”15
इसके अतिरिक्त विदर्भ, तेलंगाना के किसान,16 शव जलाने का काम करने वाले डोम,17 माथे पर झाड़-फानूस ढोते मजदूर,18 आदिवासी19 आदि मेहनतकश लोग जो अपने निरंतर हो रहे श्रम शोषण के कारण निर्बल बने हुए हैं, कवि उनका पक्ष लेता है। कवि की दृष्टि से राजकवि बनकर रहने से किसी भी कवि को अमरता प्राप्त नहीं होगी। बल्कि मेहनतकशों की बस्ती या गली के टूटे घर में जो नरक है वहीं पर अमरता है – “चलो फिर वहीं उसी गली के टूटे घर में / जीवन का जो नरक है वही अमरता है।”20
इसी कारण कवि अरुण कमल जी ‘गुन गाऊँगा’ कविता में लिखते हैं – “गुन गाऊँगा / होली में घर लौटते / जन मजूर परिवारों के गुन”21। कवि अरुण कमल जी इस निर्बल जन को ‘खुदरा’ आदमी कहते हैं। यह खुदरा आदमी अपनी पुरानी पैंट को काट कर झोला बनाता है और खरीददारी के लिए निकलता है। खरीददारी में ताजा लौकी, शीशी में पाव भर तेल, नमक, एक पुड़िया चाय और चीनी, नींबू आदि रोजमर्रा की जरूरतों का सामान लाता है। इन लोगों को कोई पूछता नहीं। इन्हें शासन, प्रशासन कोई अहमियत
नहीं देता। पूंजीपति थोक कहे जाते हैं और ये गरीब, निर्बल खुदरा। इन
लोगों के सामाजिक, राजनीतिक स्थान के संबंध में कवि अरुण कमल जी लिखते हैं- “बात ये है भाई मोरे कि मैं खुद एक खुदरा आदमी हूँ / (मोटे लोग थोक होते हैं दुबले खुदरा ) / खुदरा जो भीखमंगों के कटोरे में होता है / वही खुदरा रेजकी चिल्लर टूटा / एक खुदरा आदमी जो कविता भी खुदरा ही लिखता है / पर जोहता है बाट विदेशी निवेश का।”22 इस तरह से अरुण कमल जी भी अपने आप को खुदरा लोगों के
ही बीच का मानते है। क्योंकि उनकी कविता में भी इस खुदरे लोगों की जिंदगी के खुदरे
प्रसंग चित्रित हैं।
उनकी ‘घर भी उतनी ही दूर जितना कब्रिस्तान’ शीर्षक कविता के चौथे खंड में अनाथों के प्रति सहानुभूति की भावना व्यक्त की है। उनकी ‘एक वृद्ध की रात’ कविता में मजदूर, दरजिन, आंगनवाड़ी सेविकाएँ, किसान की संघर्षशीलता को सलाम किया है। कवि लिखते हैं – “मनेसर के मारुति मजदूरों को सलाम / बंगलुरु की दरजिनों को / बिहार की आंगनबाड़ी सेविकाओं को सलाम / महाराष्ट्र के किसानों को सलाम”23। इसप्रकार अरुण कमल जी की कविता निर्बल जनों के
संघर्ष की भी भूरि-भूरि प्रशंसा करती है।
अरुण कमल की ‘अभी तैयार नहीं’ कविता किसान जीवन के यथार्थ का चित्रण करती है। साहूकार के कर्ज के तले दबे किसान की सच्चाई को अभिव्यक्त करते हुए कवि ने लिखा है- “अभी तो दाने बटोरे ही नहीं कि / द्वार पर आकर खड़े हैं / वसूली वाले”24
अरुण कमल जी की कविता में समाज के सभी क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमजीवी, निर्बल लोग बड़ी सहजता से आ गए हैं। इस संबंध में उनकी ‘किस वतन के लोग’ शीर्षक कविता के खंड 2 की ‘लोकपाल’ उपशीर्षक कविता दृष्टव्य है। इस कविता में कवि ने रिक्शावाला, कूड़ा बीनते बच्चे, मिस्त्री मजदूर, घर में काम करने वाली बाई, आदि की प्रामाणिकता का अत्यंत मार्मिक चित्रण करते हुए उन्हें सलाम किया है - “उसको सलाम / उस रिक्शेवाले को सलाम / जो कल मेरा छूटा थैला दे गया घर पर / उस कूड़ा बीनते बच्चे की जै / जिसने बम देखा फटने से पहले / उस मिस्त्री मजदूर को वंदे / जिसने कहा आप दस टका ज्यादा दे रहे हैं सर, / उस बाई को नमन जिसने गिरी अँगूठी / ढूंढकर दी आज प्रातः”25 इस तरह से निर्बल जनों के प्रति अरुण कमल जी के मन
में कृतज्ञता का भाव है। इसीकारण अशोक कुमार पांडेय उनकी कविता के संबंध में लिखते हैं – “वंचित कामगार वर्ग के लिए उनका यह विनीत और कृतज्ञता-भाव उनकी पूरी काव्ययात्रा में बार-बार आया है, लेकिन यहाँ इस कविता में ही नहीं, बल्कि कई अन्य कविताओं में भी इस कृतज्ञता की जगह एक सहयात्री होने का भाव है।”26
अरुण कमल जन पक्षधर कवि हैं। वह अपनी कविता के माध्यम से निर्बलतम का पक्ष लेते हैं। इसलिए वे श्रमजीवी लोगों की बस्ती से गुजरते हैं। उनकी कविता प्रकृति, कल्पना मनोरंजन आदि कलावादी तत्त्वों का वहन नहीं करती। वे भाट बनकर सांसद, पार्षद या श्रेष्ठजनों के साथ घूमने वाले कवि नहीं हैं। वे आम- निर्बल जनों की बस्ती में घूमने वाले कवि हैं। इस संबंध में उनकी ‘कवि थे’ शीर्षक कविता उल्लेखनीय है - “कूड़े के ढेर से गुजरते आज मैं यही सोचता टहल रहा था / कि पीछे से तेज फटफटिया ने कोंचा - हट बे पागल! / काफिला आ रहा था सी.एम. का लाल पीला – ”27 यही कारण है कि कवि अरुण कमल जी अपनी कविता को हथियार बनाकर निर्बल जन का साथ देते हुए व्यवस्था से लड़ रहे हैं और लड़ना चाहते हैं। उन्हें यह भी पता है कि पूंजीवादी ताकतों से लड़ना बहुत मुश्किल है जिसमें हार ही होगी। लेकिन फिर भी लाखों गरीब, निर्धन, निर्बल लोगों के पक्ष में वे लड़ना चाहते हैं। कवि के शब्दों में – “चाहे मेरे पक्ष में खड़े हों लाखों गरीब फिर भी ये पैसा है जो / जीतेगा और हम हारेंगे / फिर भी लड़ेंगे हर तरह से लड़ेंगे / खुरपी कुदाल हँसिया ढोल ढपली सिंगा सूप / ऊँगली पर स्याही की बूँद से / इन नाखूनों से”28 इस तरह से निर्बल जनों को न्याय दिलाने के लिए, आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए कवि हर तरह से लड़ना चाहता है। वह हर तरह से लड़ना चाहता है फिर चाहे वह तरीका लोकतांत्रिक हो या अन्य।
निष्कर्ष
निष्कर्ष
रूप में कह सकते है कि कवि अरुण कमल जी की कविता लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्बल
वर्ग की की जा रही उपेक्षा का पर्दाफाश करती है। नीतियाँ भले ही इस
निर्बल वर्ग के नाम पर बनती हो परंतु बड़ी चालाकी से पूँजीवादी ताकतें अपने हित में
उसे कर लेती है। निर्बल वर्ग आर्थिक अभाव के चलते अपनी बुनियादी जरूरतों की पूर्ति
के लिए पूँजीवादी व्यवस्था पर निर्भर है। उसकी इसी विवशता का फायदा उठाते हुए वह
व्यवस्था उसका शोषण करती है। पूँजीवादी व्यवस्था अपने फायदे के लिए निर्बल वर्ग के
जीवन यापन विकल्प को भी बड़ी चालाकी से ख़त्म करती है, इस सत्य को भी अरुण
कमल की कविता व्यक्त करती है। कवि अरुण कमल जी ने निर्बल वर्ग की संवेदनशीलता को
व्यक्त करते हुए समाज में श्रमरत विभिन्न निर्बल जन के जीवन के पहलुओं का मार्मिक
चित्रण किया है। उनकी कविता निर्बल जन की दयनीय जिंदगी से गुजरती हुई अपनी
जनपक्षधरता भलीभांति वहन करती है।
संदर्भ :
- कमल, अरुण. कविता और समय. नयी दिल्ली:वाणी प्रकाशन, 2002, पृ. 232
- जोशी, राजेश. दो पंक्तियों के बीच, नयी दिल्ली: राजकमल प्रकाशन, 2004 पृ. 13
- कमल, अरुण. मैं वो शंख महाशंख. नयी दिल्ली: राजकमल प्रकाशन, 2012, पृ. 11
- वही, पृ. 12
- वही, पृ. 14-15
- वही, पृ. 17
- वही, पृ. 26
- वही, पृ. 30
- वही, पृ. 33
- वही, पृ. 64
- वही, पृ. 65
- वही, पृ. 65
- वही, पृ. 67
- वही, पृ. 67
- वही, पृ. 104
- वही, पृ. 67
- वही, पृ. 45
- वही, पृ. 48
- वही, पृ. 95
- वही, पृ. 92
- कमल, अरुण. योगफल, नयी दिल्ली : वाणी प्रकाशन, 2019. पृ. 14
- वही, पृ. 18
- वही, पृ. 34
- वही, पृ. 37
- वही, पृ. 71
- महेश्वरी, अशोक कुमार. प्रकाशन समाचार. नयी दिल्ली: राजकमल प्रकाशन, सितम्बर, 2013 पृ. 16
- वही, पृ. 45
- कमल, अरुण. मैं वो शंख महाशंख. नयी दिल्ली: राजकमल प्रकाशन, 2012, पृ. 82
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