संवैधानिक मूल्यों की काव्याभिव्यक्ति : मुक्ति-दूत
संवैधानिक मूल्यों की काव्याभिव्यक्ति : मुक्ति-दूत
डॉ. संजय रणखांबे
प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष
हिंदी विभाग
डॉ. अण्णासाहेब जी. डी. बेंडाले
महिला महाविद्यालय, जलगाँव
मोबा.9096306029
ई-मेल-dr.sanjay.rankhambe@gmail.com
‘मुक्ति-दूत’ हरिमोहन जी द्वारा लिखित खंडकाव्य है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के जीवन के कुछ प्रसंगों पर आधारित इस खंडकाव्य के माध्यम से हरिमोहन जी ने स्वतंत्रता, समता, बंधुता एवं न्याय इन संवैधानिक मूल्यों की भारतीय सामाजिक, आर्थिक परिप्रेक्ष्य में सशक्त अभिव्यक्ति की है। भारतीय संविधान की उद्देशिका में अंकित इन मूल्यों की महत्ता तथा देश की दृष्टि से आवश्यकता को भी कवि ने अभिव्यक्त किया है। मुक्ति-दूत खंडकाव्य के चार अध्याय है, जिसे दिशा कहा गया है। दिशा एक - समता, दिशा दो – स्वतंत्रता, दिशा तीन - न्याय और दिशा चार – स्त्री, इस तरह से यह विभाजन है। कवि हरिमोहन जी ने आंबेडकरवादी दर्शन तथा दृष्टिकोण से इस खंडकाव्य के माध्यम से संवैधानिक-मूल्यों को रेखांकित किया है।
देश को अगर सफल लोकतांत्रिक देश के रूप में संपूर्ण विश्व में अपनी पहचान बनानी है और उन्नति के शिखर तक पहुंचना है तो स्वतंत्रता, समता, बंधुता एवं न्याय इन संवैधानिक मूल्यों पर आधारित समतामूलक समाज का निर्माण करना आवश्यक है। भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था तथा जाति व्यवस्था थी और आज भी मौजूद है। यह सभी प्रकार की विषमताओं तथा असमानता का कारण है। इस सत्य को डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने सप्रमाण सिद्ध किया है। इसी कारण वे इस निष्कर्ष तक पहुंचे थे कि की भारत में तब तक समता स्थापित नहीं हो सकती जब तक जातिव्यवस्था का अस्तित्व है। डॉ. बाबासाहेब के इन्हीं विचारों को हरिमोहन जी ने मुक्ति-दूत इस खंडकाव्य में व्यक्त किया है। वर्ण व्यवस्था से उपजी असमानता को व्यक्त करते हुए कवि ने लिखा है- “ वर्ण - भारी भूल, / जिसकी ‘व्यवस्था’ / है सभी / असमानता की मूल।”1 तो जातिव्यवस्था द्वारा सदियों से फैलाई गई घृणा और असमानता को रेखांकित करते हुए कवि ने लिखा है – “जाति फैलाती घृणा / जाति ही जड़ / असमानता की। जाति की ही भावना से / अर्थ के विकास का / मार्ग है अवरुद्ध ; / बन जाती परिस्थितियाँ विकट, / कृषि – व्यापार - उद्योग के हर क्षेत्र में - / हमारे सभी के / सद्प्रयासों के विरुद्ध।”2 इस तरह हरिमोहन जी ने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा प्रतिपादित भारत में जाति ही सभी असमानताओं की जड़ है, जाति के कारण ही देश के आर्थिक विकास में बाधा उत्पन्न होती है, जातिव्यवस्था यह एक तरह से इस देश की विषमता पर आधारित अर्थव्यवस्था है, यह बात कवि हरिमोहन जी ने ‘मुक्ति-दूत’ खंडकाव्य के माध्यम से यहां प्रतिपादित की है। इसी कारण कवि हरिमोहन इस काव्य के माध्यम से यह रेखांकित करते है कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के इन विचारों को कि जब तक जातिव्यवस्था का अंत नहीं होगा तब तक सामाजिक और आर्थिक समता स्थापित नहीं होगी और देश का विकास अवरुद्ध होगा। कवि हरिमोहन जी डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर की जातिविहीन
समाज की आवश्यकता को अभिव्यक्त करते हुए लिखते हैं – “तो सबसे पहले / तोड़ो इस कारा को, / मोड़ो समतल पर / विकास की / समतामूलक - प्राणमयी धारा को।”3
वर्णव्यवस्था तथा जातिव्यवस्था ने अस्पृश्यता जैसी घिनौनी और अमानवीय प्रथा को जन्म दिया। यह कुप्रथा समतामूलक समाज के निर्माण में सदियों तक बाधा बनकर खड़ी रही और आज भी समाज में यह कमोबेश रूप में मौजूद है। इस असमानता या विषमता से डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर भी उत्पीड़ित रहे। उनके जीवन के एक प्रसंग को रेखांकित करते हुए कवि हरिमोहन जी ने लिखा है – “ “तुम महार, तुम अछूत / न – न, नहीं, / हो जाएगी अपवित्र / मेरी बैलगाड़ी !! कहकर, दिया दुत्कार / दुष्ट गाड़ीवान ने।”4
इसी कारण संविधान की धारा 15 (1)के अनुसार देश की जनता को समता का अधिकार प्राप्त हुआ। इसके अनुसार “राज्य, किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी के आधार पर विभेद नहीं करेगा।”5
संविधान की उद्देशिका में प्रतिष्ठा और अवसर की समता की बात कही गई है। अर्थात देश के सभी नागरिकों को प्रतिष्ठा और अवसर प्राप्ति का समान अवसर मिलेगा। यह अधिकार संविधान द्वारा इसलिए प्राप्त हुआ क्योंकि संविधान पूर्वकाल में जाति, वर्ण, लिंग आदि के आधार पर प्रतिष्ठा और अवसर प्रदान किए जाते थे। इस कारण तत्कालीन समाज में अत्यंत घिनौनी सामाजिक और आर्थिक विषमता समाज में व्याप्त थी।
इस प्रकार भारतीय समाज में सभी प्रकार की विषमता का कारण बनी जातिव्यवस्था एवं वर्णव्यवस्था का अंत कर समतामूलक समाज की स्थापना के लिए निरंतर संघर्ष करने का संदेश डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने दिया। इस संदेश को ही प्रचारित - प्रसारित करने का कार्य हरिमोहन जी की कविता कर रही है।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था कि जब तक देश में सामाजिक और आर्थिक समानता स्थापित नहीं होती तब तक राजनीतिक समानता निरर्थक है। हमारे देश में राजनीतिक समानता तो स्थापित हुई लेकिन सामाजिक और आर्थिक विषमता अभी भी बरकरार है। इसलिए सब कुछ व्यर्थ है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के इन्हीं विचारों को व्यक्त करते हुए हरिमोहन जी लिखते हैं - माना कि हमने प्राप्त कर ली / किसी भी तरह से / राजनीति की समानता; / किंतु सामाजिक - आर्थिक जिंदगी में / फैली हुई है, वही जड़ असमानता। / तब व्यर्थ होगा सब / हमारा यह भगीरथ यत्न, / जब तलक होगा नहीं - / विरोधाभास सारा खत्म।”6
इसीलिए कवि ने लिखा है कि जब तक देश के सभी मनुष्यों के मन में यह सामाजिक समानता की भावना जागृत नहीं होती तब तक सुदृढ़ समतामूलक समाज की स्थापना नहीं हो सकती – “आचरण में लायें / सभी यह भावना - / ‘सामाजिक समानता / के पत्थर से ही / हो पाती - सुदृढ़ समाज की / संस्थापना।’ ”7
हमारे भारतीय संविधान की उद्देशिका में समानता का अर्थ बताते हुए कहा गया है कि देश के हर एक व्यक्ति को समान सम्मान और अवसर की समानता मिलनी चाहिए। जाति, वर्ण, लिंग आदि के आधार पर व्यक्ति के साथ दुर्व्यवहार ना हो। समाज में समता स्थापित करना
ही इसका उद्देश्य है। इस उद्देशिका को काव्य में अभिव्यक्ति देते हुए कवि ने लिखा है – “समानता क्या है? - / यही कि मिले अवसर / सभी को समान; / मिले सभी की प्रतिभा को / विकास के एक-से साधन, / और प्रोत्साहन।”8
स्वतंत्रता भी एक संवैधानिक मूल्य है। स्वतंत्रता मनुष्य का मौलिक एवं प्राकृतिक अधिकार है। उसके संपूर्ण विकास के लिए स्वतंत्रता का अत्यंत महत्व है। भारतीय संविधान की उद्देशिका में तथा भारतीय संविधान में प्रतिपादित स्वतंत्रता इस जनतांत्रिक मूल्य का काव्यमयी विवेचन खंडकाव्य के दूसरे सर्ग में किया है। संविधान में भारतीय नागरिक के मूल अधिकारों का वर्णन है और स्वतंत्रता को मूल अधिकार के रूप में स्वीकृत किया गया है। देश के हर एक व्यक्ति को जीने की स्वतंत्रता है। किसी को भी गुलाम नहीं बना सकते। बलात् किसी के श्रम का शोषण नहीं किया जा सकता। मानव मनुष्य का आपसी संबंध भाईचारे का होगा। हर एक व्यक्ति को आत्म निर्णय का अधिकार होगा। हर किसी को राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक उन्नति करने की स्वतंत्रता होगी। कवि हरिमोहन जी ने इस स्वतंत्रता के अधिकार को मानव अधिकारों का पावन सूत्र कहते हुए लिखा है – “हर किसी को जीने की स्वतंत्रता - / व्यक्तिगत सुरक्षा का मिला अधिकार / मानव का मानव से हो भ्रातृवत् संबंध, / न कोई रहेगा किसी का गुलाम / बेगारी प्रथा पर भी रहे प्रतिबंध।”9
कवि ने भारतीय संविधान में प्रतिपादित भारतीय नागरिक की स्वतंत्रता के विभिन्न पहलुओं को उपर्युक्त पंक्तियों में अभिव्यक्त किया है। भारतीय संविधान की उद्देशिका10 में भारतीय नागरिक को ‘विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता’ की बात उल्लिखित है। हरि मोहन जी ने इस उद्देशिका में प्रतिपादित स्वतंत्रता के विविध पहलुओं को ही काव्य में वाणी दी है। संविधान में अनुच्छेद 19
के अंतर्गत स्वतंत्रता के विभिन्न पक्षों का विवेचन मिलता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19
(1) के अनुसार सभी नागरिकों को – “(क) वाक्- स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य का अधिकार होगा,”11 संविधान द्वारा प्राप्त वाक् स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य के संबंध में हरिमोहन जी ने लिखा है – “दी मुझे / सब स्वतंत्रताओं से ऊपर / मुक्त भाव से अपनी इच्छानुसार / सोचने, बोलने और - / तर्क करने की स्वतंत्रता।”12
भारत में संविधान लागू होने तक सभी भारतियों को यह अधिकार नहीं था। केवल विशेष वर्ण, जाति या वर्ग तक ही यह स्वतंत्रता थी। लेकिन संविधान ने सभी देशवासियों को एक पंक्ति में बिठाया। अतः जो वर्ग, समूह अब तक इन अधिकारों से वंचित था, उसकी दृष्टि से यह स्वतंत्रता का अधिकार अनमोल है।
भारतीय संविधान ने देश की जनता को धर्म पालन की स्वतंत्रता भी प्रदान की है। यह स्वतंत्रता का दूसरा पहलू है। भारतीय संविधान में अनुच्छेद 25 के अनुसार धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार है। अनुच्छेद 25 (1) के अनुसार – “लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य तथा इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, सभी व्यक्तियों को अंत:करण की स्वतंत्रता का और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का समान हक होगा।”13 इस अनुच्छेद को अपने काव्य के माध्यम से अभिव्यक्त करते हुए हरिमोहन जी लिखते हैं – “विचार, अंतश्चेतना या धर्म, / है मनुज का व्यक्तिगत, / और यह है आस्था का प्रश्न / अपना सके हर व्यक्ति अपना धर्म, / अधिकार उसको - / चुने, बदले, विश्व का कोई धर्म - / या कि वह चाहे / तो रहे नि:धर्म।”14
अर्थात् भारतीय संविधान ने सभी नागरिकों को धर्म के संबंध में यह स्वतंत्रता प्रदान की है कि धर्म संबंधी विचार, अंतश्चेतना और धर्म व्यक्तिगत है। यह उसकी आस्था का प्रश्न है। हर नागरिक अपने धर्म का पालन करने के लिए स्वतंत्र है। साथ ही उसे यह भी अधिकार है कि वह अपना धर्म स्वयं चुन सकता है, बदल सकता है और चाहे तो बिना धर्म के भी रह सकता है।
कवि हरिमोहन जी ने देश के संविधान की उद्देशिका में प्रतिपादित ‘एकता और अखंडता’ इस मूल्य के अनुसार धर्म को स्वीकार्य माना है। उनके अनुसार हमें उस धर्म की आवश्यकता है जो धर्म हमें समता, बंधुत्व और स्वतंत्रता के साथ जीना सिखाता है- “धर्म वह; जो सिखाए पाठ हमको – समता - बंधुत्व और स्वाधीनता के साथ जीना, / धर्म ऐसा ही हमें बस चाहिए।”15 इसका
अर्थ यह कि संविधान को धर्म का वह रूप स्वीकार है जो देश की एकता और अखंडता को दृढ़ करता हो। इसी कारण संविधानकर्ताओं ने संविधान में धर्मनिरपेक्षता इस मूल्य को स्थापित किया है। संविधान की उद्देशिका में धर्मनिरपेक्षता यह शब्द भले ही 42 वें संविधान संशोधन से आया हो परंतु संविधान में धर्मनिरपेक्षता तत्व का समावेश प्रारंभ से ही है। कवि हरिमोहन जी ने धर्मनिरपेक्षता को लोकतंत्र की उदार परंपरा कहा है और धर्मनिरपेक्षता का भारतीय परिप्रेक्ष्य में अर्थ प्रतिपादित करते हुए लिखा है – “सरकार को तो चाहिए यह / दे स्वतंत्रता नागरिकों को अंतःकरण की, / कर सकें पालन वे अपने धर्म का / कर सकें प्रचार नियमों में बँधे रह कर / या कर सकें वे निज धर्म-परिवर्तन।”16 इसका मतलब धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यह नहीं कि किसी धर्म विशेष को स्वीकार करने के लिए बाध्य करें बल्कि राज्य सरकार नागरिकों को अपने धर्म का पालन करने की और अपने धर्म का नियमों में बँध कर प्रचार करने अथवा अपना धर्म परिवर्तन करने की स्वतंत्रता दें।
भारतीय संविधान में नागरिकों को आर्थिक स्वतंत्रता का अधिकार भी प्रदान किया है। संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (छ) के अनुसार – “सभी नागरिकों को कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारबार करने का अधिकार होगा।”17 भारतीय संविधान के इस मौलिक अधिकार को अपनी कविता के माध्यम से व्यक्त करते हुए कवि हरिमोहन जी ने लिखा है- “काम करने के लिए / हम हैं स्वतंत्र, / स्वतंत्र हम, / मनपसंद रोजगार के लिए। / बिना किसी भेदभाव के / एक जैसा काम करना / अधिकार है सबका।”18 आर्थिक स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करते हुए संविधानकर्ताओं ने गरीब, वंचित समूह के साथ न्याय करते हुए अनुच्छेद 23 में शोषण के विरुद्ध अधिकार भी दिया है। अनुच्छेद 21 (1) के अनुसार – “मानव का दुर्व्यापार और बेगार तथा इसी प्रकार का अन्य बलात् श्रम प्रतिषिद्ध किया जाता है और इस उपबंध का कोई भी उल्लंघन अपराध होगा जो विधि के अनुसार दंडनीय होगा।”19 इसका मतलब यह कि देश के हर
नागरिक को यह स्वतंत्रता होगी कि वह अपनी इच्छा के अनुसार रोजगार करें, काम करें।
इस संबंध में जाति, धर्म, वर्ण, लिंग तथा अन्य किसी भी तरह का भेदभाव विधि के
अनुसार दंडनीय अपराध होगा।
भारतीय संविधान के अवसर की समानता इस मूल्य के अनुसार सभी लोगों को एक जैसा काम प्राप्त करने का अधिकार है। साथ ही उस काम का पारिश्रमिक भी समान होगा। उद्देशिका में उल्लिखित ‘मानवीय गरिमा’ के अनुसार श्रमिकों को अपने श्रम का इतना पारिश्रमिक पाने का अधिकार है कि वे मानवीय गरिमा के अनुसार जीवन यापन करें। कवि के शब्दों में – “एक जैसा काम करना / अधिकार है सबका / जैसे काम का अधिकार / या कि श्रम का, / ठीक पारिश्रमिक मिले / अधिकार यह भी सभी का। / मानवीय गरिमा के साथ / जीवन यापन कर सके परिवार, / हो नहीं कोई श्रमिक / बेकार या लाचार।”20
इस संबंध में भारतीय संविधान के भाग 4 - राज्य की नीति के निदेशक तत्व के अंतर्गत अनुच्छेद 43 में कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी आदि संबंधी प्रावधान किया है।21
आर्थिक स्वतंत्रता के साथ-साथ भारतीय नागरिकों को राजनीतिक स्वतंत्रता भी प्रदान की है। यह राजनीतिक स्वतंत्रता
हमें राजनीतिक लोकतंत्र से मिली है। यह राजनीतिक लोकतंत्र तब तक मजबूत नहीं हो
सकता जब तक सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र मजबूत नहीं होता। देश के सभी नागरिकों को अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से देश की सरकार में हिस्सा लेने का अधिकार प्राप्त है। कवि हरिमोहन जी ने लिखा है – “अधिकार यह सब का / स्वतंत्रतापूर्वक चुने गए / प्रतिनिधियों के जरिए / अपने देश की / सरकार में ले सकें हिस्सा।”22 इस दृष्टि से भारत के सभी नागरिकों को ‘एक व्यक्ति एक मूल्य के अनुसार किसी भी प्रकार के भेदभाव को नकारते हुए समान मतदान का अधिकार प्राप्त है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था कि राजनीतिक स्वतंत्रता का मूल आधार सामाजिक, आर्थिक स्वतंत्रता है। इस संबंध में 25
नवंबर, 1949 में संविधान समिति के भाषण में वे कहते हैं – “In politics we will
be recognizing the principle of one man one vote and one vote one value. In our
social and economic life, we shall, by reason of our social and economic
structure, continue to deny the principle of one man one value. How long shall
we continue to live this life of contradictions?” 23 अर्थात् राजनीतिक जीवन
में एक व्यक्ति एक मत और एक मत एक मूल्य इस तत्त्व का स्वीकार और आर्थिक, सामाजिक जीवन
में लेकिन इस तत्त्व को नकार यह अन्तर्विरोध है। यह अन्तर्विरोध हम कब तक सँभालनेवाले
है? जब तक समाज में सामाजिक, आर्थिक स्वतंत्रता स्थापित नहीं होती तब तक राजनीतिक स्वतंत्रता निरर्थक एवं असंभव है।
स्वतंत्रता का एक महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक स्वतंत्रता भी है। भारतीय संविधान की उद्देशिका में सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक न्याय का तत्व स्वीकार किया गया है। सभी लोगों को सामाजिक, सांस्कृतिक स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। इससे समाज का सर्वांगीण विकास संभव होता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (क)24 के अनुसार छह वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु वाले सभी बालकों के लिए निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्राप्त है। सभी के लिए ‘अवसर की समानता’ के तत्व के अनुसार शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है। कवि हरिमोहन ने लिखा है – “हर एक को अधिकार शिक्षा का। / अनिवार्य बुनियादी शिक्षा और / तकनीकी, व्यावसायिक, उच्च शिक्षा - / व्यक्ति की योग्यता के अनुरूप; / किंतु सबके लिए है समान अवसर।”25
सामाजिक-सांस्कृतिक स्वतंत्रता के संबंध में संविधान के प्रावधानों के अनुसार लिखी अपनी काव्य पंक्तियों में हरिमोहन जी ने लिखा है – “शिक्षा और समाज से है जुड़ी - संस्कृति। / संस्कृति एक उपलब्धि मानव की। / मानवाधिकारों की यह घोषणा; / ‘हर एक को मिली अधिकार - मान्यता - / सांस्कृतिक जीवन में ले सके हिस्सा। / - उठा सके लाभ वैज्ञानिक प्रगति वा प्रयोगों का। / - हो सके लाभान्वित निज रचित / वैज्ञानिक - साहित्यिक या / कलात्मक / नैतिक और भौतिक हितों के संरक्षण से।”26
इस प्रकार स्वतंत्रता इस संवैधानिक मूल्य के संबंध में संविधान में प्रतिपादित विभिन्न पहलुओं का अत्यंत तार्किक और सूक्ष्म विवेचन हरिमोहन जी ने मुक्ति-दूत इस खंडकाव्य में किया है।
भारतीय संविधान का अत्यंत महत्वपूर्ण मूल्य है - न्याय। उद्देशिका में सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक न्याय यह तत्व सम्मिलित है। भारतीय संविधान के अनुसार विधि या कानून के सामने सभी समान हैं। जाति, धर्म, वंश, जन्मस्थान, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव को अस्वीकृत किया है। इस कारण विधि के सम्मुख सभी समान हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14
और 15 (1) के अनुसार समता तथा न्याय का अधिकार प्रदान किया गया है।27 समता तथा न्याय इस संवैधानिक मूल्य को रेखांकित करते हुए कवि हरिमोहन जी ने अपनी कविता में लिखा है – “ “है कानून के सम्मुख, हर कहीं हर व्यक्ति को, / व्यक्ति के रूप में अधिकार निज मान्यता का।” / है बराबर कानून में सब / अधिकार सब को / कानून के संरक्षण का; एक जैसा।”28
इस समता के अधिकार के बल पर वही व्यक्ति न्याय प्राप्त कर सकता है जो संघर्ष करने के लिए तत्पर होता है। बिना संघर्ष के न्याय असंभव है। इसीलिए डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के जीवन संघर्ष का हवाला देते हुए कवि हरिमोहन जी ने लिखा है - “जागृत है जो, / जो है संघर्षरत / पाता न्याय स्थाई, वह अनंत।”29
निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं
कि मुक्ति-दूत खंडकाव्य में संवैधानिक मूल्यों की सशक्त अभिव्यक्ति हुई है। कवि
हरि मोहन जी ने समता, स्वतंत्रता और न्याय इन तीन संवैधानिक मूल्यों का भारतीय
सामाजिक, आर्थिक परिप्रेक्ष्य में अंकन किया है। उन्होंने आंबेडकरवादी-दर्शन के
आधार पर इन संवैधानिक मूल्यों की व्याख्या की है। उनकी दृष्टि से भारतीय सामाजिक
परिवेश में जातिव्यवस्था और वर्णव्यवस्था तथा इस विषमतावादी व्यवस्था से बनी
जातिवादी तथा वर्णवादी मानसिकता समता इस संवैधानिक-मूल्य की स्थापना में सबसे बड़ी
बाधा है। स्वतंत्रता के संबंध में उनकी कविता डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर के इन
विचारों की प्रस्थापना करती है कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब ही सार्थक कही जाएगी जब
देश में सामाजिक आर्थिक स्वतंत्रता हो। हरि मोहन जी की कविता न्याय प्राप्ति के
लिए संघर्षशीलता की अनिवार्यता को व्यक्त करती है।
संदर्भ –
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