राजेश जोशी की कविता और मेहनतकश - हाशिए के लोग (उत्तरार्द्ध)

 राजेश जोशी की कविता और मेहनतकश - हाशिए के लोग (उत्तरार्द्ध)

बहुत थोड़ी सी जगह चाहिए उन्हें पृथ्वी पर (पृ. 21) यह पंक्ति सभ्य, सुसंस्कृत समाज का इन हाशियों पर फेंके गए लोगों के प्रति जो रवैया है, उसे ही व्यक्त करती है

          कवि राजेश जोशी की कविता हाशिए के लोगों के जीवन से होकर गुजरती है हर जगह उन्हें इन हाशिए के लोगों का अस्तित्व दिखाई देता है यही कारण है कि जब वे पानी पीने लगते हैं तब उन्हें कुम्हार की याद आती है और वे कहते  है कि जब भी हम पानी पिए तो हमें उस कुम्हार का शुक्रिया अदा करना चाहिए इस भाव को व्यक्त करने वाली उनकी कर्बला कविता है इस कविता की निम्न पंक्तियाँ कवि की उपेक्षित-वंचित समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को ही दर्शाती है वे लिखते हैं-

पानी पियो तो शुक्रिया अदा करो कुम्हारों का

जिन्होंने बनाए पृथ्वी की तरह गोल मटके

और बहुत सुंदर सुराहियाँ जिनकी गरदनें

सुंदर स्त्रियों की तरह पतली और लंबी हैं!”  

(नेपथ्य में हँसी, पृ. 30)

         निरंतर भटकना कवि राजेश जोशी जी का स्वभाव है अपनी इस आवारगी को कवि ने अपनी कई कविताओं में अभिव्यक्त किया है प्लेटफार्म पर यह कविता भी उनकी इसी घुमक्कड़ प्रवृत्ति को दर्शाती है कवि देर रात सुनसान प्लेटफार्म पर भटकने के लिए गए हैं वहां पर वे केवल भटकने का आनंद नहीं लेते बल्कि उनकी दृष्टि उन लोगों पर टिक जाती है जो दूसरों की सेवा के लिए कर्मरत हैं। जैसे- चाय बेचने वाले, टिकट कलेक्टर, इंजन ड्राइवर, गार्ड आदि (पृ.17) अपना जीवन यापन करने के लिए दिन-रात मेहनत करने वाले ये लोग कवि राजेश जोशी की कविता में यत्र-तत्र मौजूद हैं।  

         वर्तमान राजनेताओं द्वारा ही नहीं बल्कि अब तक की कई शासन व्यवस्थाओं द्वारा किसान को उपेक्षित रखा गया सदियों से उसका शोषण हुआ, उस पर अन्याय हुआ देश में किसानों की दुर्दशा का ही परिणाम है कि आज किसान आत्महत्या करने के लिए विवश है आजादी के बाद जितनी भी सरकारें बनी, उन्होंने किसानों को कोई राहत नहीं पहुंचाई कि जिससे उनकी जिंदगी में बुनियादी सुधार हो और यही कारण है कि वर्तमान भूमंडलीकरण के दौर में किसान की हालत दिन--दिन बद-से-बदतर होती जा रही है राजेश जोशी जी की किसानों के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करने वाली उनकी कवितायें हैं - इस आत्महत्या को अब  कहाँ जोडूं’ (जिद, पृ.82) और विकल्प इन दोनों कविताओं के माध्यम से कवि ने कृषक जीवन की पीड़ा को और वर्तमान सच्चाई को अभिव्यक्त किया है

          आज तक किसान भले ही कविता और चिंतन का विषय बना रहा हो परंतु आज भी वह हाशिए की ही जिंदगी जी रहा है भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है लेकिन सच्चाई क्या है? कृषि-प्रधान देश में देश के अन्नदाता को आत्महत्या करनी पड़ती है इसी पर व्यंग्य प्रहार करती है राजेश जोशी की कविता-‘इस आत्महत्या को अब  कहाँ जोडूं (जिद, पृ.82) इस कविता के माध्यम से कवि कहना चाहते है कि किसानों को सभी लोग महत्वपूर्ण मानते हैं उनकी आवश्यकताओं को स्वीकारते हैं परंतु लोगों का उनके प्रति रवैया और व्यवहार उन्हें आज तक हाशिए पर रखने वाला ही है इसी कारण कवि किसान की अवस्था देखकर चिंतित होता है अपने गांव के किसान द्वारा की गई आत्महत्या को आत्महत्या के आंकड़ों में अब इसे कहाँ जोडूं? इस तरह का सवाल पूछते हुए सरकार तथा व्यवस्था के प्रति अपना विद्रोह व्यक्त करता है परमाणु करार को महत्व देने वाली सरकार के पास किसानों की समस्या हल करने के लिए समय नहीं है और जल्दी ही विचार करेगी वह किसान के बारे में इस तरह का जवाब देते हुए सरकार पत्रकारों और मीडिया कर्मियों के सवालों को टालती नजर आती है

           कवि राजेश जोशी जी की विकल्प कविता भी किसानों की जीवन की व्यथा को ही दर्शाती है इस कविता में कवि ने कॉरपोरेट व्यवस्था नीति किस तरह से किसान को मजदूर या घरेलू नौकर बनने के लिए विवश कर रही है, उनके घर की स्त्रियां कहीं झाड़ू-बासन के काम कर रही है अथवा किस तरह से वे  अपराध जगत में जाने के लिए विवश हैं, इसका वर्णन किया है अगर किसान ऐसा कुछ नहीं करता तो वह आत्महत्या कर रहा है इसका अत्यंत वास्तविक चित्रण विकल्प’ (जिद, पृ. 84) कविता करती है कवि की पंक्तियों में-

विकल्प ही विकल्प हैं तुम्हारे पास

मसलन भाग सकते हो शहरों की ओर

जहाँ तुम किसान रहोगे मजदूर

घरेलू नौकर बन सकते हो वहाँ

जैसे महान राजधानी में झारखंड के इलाकों से आई

लाखों लड़कियाँ कर रही है झाड़ू-बासन के काम

अपराध जगत के दरवाजों पर नोवैकेंसी का

कोई बोर्ड कभी नहीं रहा  (जिद, पृ. 84)

          इसलिए कवि कहना चाहता है अगर किसान लड़ना चाहता हो अगर किसान लड़का नहीं है संघर्ष नहीं करता है तो वहां आत्महत्या ही कर रहा है किसानों के प्रति अपनी सहानुभूति तथा प्रतिबद्धता को व्यक्त करते हुए राजेश जोशी नहीं कहते हैं कि आत्महत्या तकलीफों का इलाज नहीं है बल्कि जो बचे हुए लोग हैं उनकी तकलीफों में आत्महत्या से इजाफा होता है इस तरह की बात कहते हुए वे कवि भारतीय किसानों के प्रति अपने दायित्त्व का वहन करते हुए वे उन्हें आत्महत्या करने से परावृत्त करते हैं कवि के शब्दों में-

मृत्यु सिर्फ मर गए आदमी के दुख और तकलीफें दूर करती है

लेकिन बचे हुओं की तकलीफों में हो जाता है

थोड़ा इजाफा और...!”  (जिद, पृ. 85)

            कवि राजेश जोशी जी ने दूरदराज से अपने गांव से काम की तलाश में आनेवाले और नगरों, महानगरों में शानदार सड़के बनाने वाले मजदूरों की मेहनतकश जिंदगी को भी अपनी कविता का विषय बनाया है।उनके द्वारा बनायीं गयी शानदार सडकों से हम शान से गुजरते हैं। परंतु कोई भी व्यक्ति उनके बारे में यह तक नहीं सोचता कि यह सड़क बनाने वाले लोग आते कहाँ से हैं और सड़क बनाने के बाद जाते कहां है। इस तरह दूसरों के लिए सडक का निर्माण करनेवाले ये लोग हमेशा से उपेक्षित या हाशिये पर रहे।

          कवि राजेश जोशी जी जिदसंग्रह की सड़क पर चलते हुएकविता में मेहनतकशों के जिंदगी का पक्ष रखते हुए लिखा है कि डामर गाड़ी में बची हुई आग की रोशनी में रोटी और प्याज खाते हुए इन मजदूरों साल-दर-साल कई रातें काटते हुए सड़कों का निर्माण किया है देश में जब भी कहीं अकाल गिरता है तो जाने किन किन इलाकों से स्त्रियों और पुरुषों के समूह सड़क निर्माण के काम के लिए नगरों, महानगरों की ओर भागते हैं। बार-बार डामर बिछाते समय उनके बूट चिपक जाते हैं, जिसे बार-बार खींचकर निकालते समय पाँव नसें खिंचती हैं। इस काम के कारण वे कई-कई महिनों तक अपने गाँव नहीं लौट पाते। दिन भर के काम के बाद मन बहलाने के लिए अपने काँसे की थाली और माँदर बजा-बजाकर नाचते गाते हैं थककर चूर हो जाते हैं। उनके बच्चे लू के थपेड़े सहते हैं, धूल में खेलते हैं। (पृ.79-80)

         कवि की जनवादी दृष्टि ने इस मेहनतकश लोगों के जीवन के हर पहलू का यथार्थ अंकन किया है। कवि इस वास्तविकता से भी परिचित है कि ये सभी लोग आदिवासी भील जैसी जनजाति के लोग हैं जिन्हें हमारे तथाकथित सभ्य समाज ने सदियों से हाशिये पर रखा है यही कारण है कि सरकार के साथ-साथ उस सड़क से गुजरने वाला कोई भी व्यक्ति उन मजदूरों के बारे में कभी कुछ नहीं सोचता। अत: उन मजदूरों की स्थिति में स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी कोई परिवर्तन नहीं आया।  

           ऐसा नहीं है कि वर्तमान दौर में शोषित, पीड़ित, उपेक्षित श्रमजीवी वर्ग के  लोगों को ही हाशिए पर रखा जा रहा है मेहनतकश लोगों को हाशिए पर रखने का अत्यंत प्राचीन इतिहास है सदियों से इन लोगों का यह शोषण चक्र चल रहा है। मेहनतकशों की अब तक कि सैकड़ों पीढ़ियाँ इसकी शिकार रही हैं।  कवि केवल अपने वर्तमान समय के साथ-साथ इतिहास में भी किस तरह मेहनतकशों के साथ अन्याय हुआ है, इसका वर्णन करनेवाली कवि राजेश जोशी की कविता है- संग्रहालय  कवि ऐतिहासिक संग्रहालय में देखता है कि वहाँ कई सारी चीजें करीने से सजी हुई हैं, जिन्हें गुजरे हुए वक्त के लोगों ने कभी इस्तेमाल किया था। इन चीजों का इस्तेमाल करनेवाले उस समय के शासक थे। इन शासकों ने उनकी सेवा में जुटे लोगों का कहीं भी इतिहास में जिक्र होने नहीं दिया। वे लोग उस समय भी हाशिए पर ही रखे गए। कवि के शब्दों में -    

‘‘दीवारों पर सुनहरी फ्रेम में मढे हुए उन शासकों के विशाल चित्र थे

जिनके नीचे उनका नाम और समय भी लिखा था

जिन्होंने उन चीजों का उपयोग किया था

लेकिन उन चीजों को बनानेवालों का कोई चित्र वहाँ नहीं था

कहीं उनका कोई नाम था” (जिद, पृ. 61)

            यही कारण है कि कवि लिखते हैं कि हमें इतिहास कालीन शासकों के नाम तो इतिहास में मिल जाते हैं परंतु उनकी सेवा में अपनी जिंदगी व्यतीत करनेवाले उनके दर्जी, रंगरेज, मोची, बावर्ची, उनका हुक्का भरनेवाले तथा अन्य उपयोगी चीजें बनानेवाले कलाकारों, मजदूरों या सामान्य सिपाहियों के नाम नहीं मिलते 

          कवि राजेश जोशी जी की पाँव की नस कविता में हमारे देश की वर्ण-व्यवस्था और जाति-व्यवस्था द्वारा किस तरह से एक बहुत बड़े तबके को उसके सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, अधिकार छीनकर हाशिए पर रहने के लिए विवश कर दिया इसका वर्णन किया है इस कविता का आधार वर्ण व्यवस्था के उदय को लेकर जो मिथ्या कथा गढ़ी गई है, उसे बनाया है इस कथा के अनुसार कहा यह जाता है कि वर्ण-व्यवस्था का निर्माण ब्रह्मा से हुआ है ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण भुजाओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य और पैरों से शूद्रों का जन्म हुआ इस कविता में कवि ने प्रतीकात्मकता का प्रयोग करते हुए वर्ण-व्यवस्था एवं जाति-व्यवस्था द्वारा शोषित-उत्पीड़ित लोगों की पीड़ा को व्यक्त किया है। कविता की निम्न पंक्तियाँ कविता की प्रतीकात्मकता को दर्शाती है -

जातियों के जन्म की कोई मनुवादी धारणा

कौंधती है दिमाग में

इतनी पीड़ा कि फूट पड़ती है हँसी और कराह एक साथ” (जिद, पृ. 29)

 

          पांव की कोई नस का अचानक चढ़ जाना और तेज दर्द महसूस होना मतलब वर्तमान समय में दलित समुदाय का अपने हक एवं अधिकारों के प्रति जागृत होना है और जिसके कारण देश की समग्र सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक व्यवस्था में उत्तल-पुथल मच जाती है लोगों का जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है

         कविता में पाँव का तेज दर्द होना, बर्दाश्त न होना सवर्ण समाज द्वारा उनकी जागृति को सहन होना है शरीर की तमाम नसों का शरीर में सलीके से रहना मतलब अन्य वर्ण का उच्च जातियों का शांति से किसी एक जाति के आदेश के अनुसार रहना है पैरों के साथ बरती गई लापरवाही का मतलब एक संवेदनशील व्यक्ति का दलितों के ऊपर सदियों से हुए अन्याय एवं अत्याचार को स्वीकार करना है पैरों को दिनभर बेरहम जल्लादों की तरह थकाना, पैरों द्वारा दिनभर शरीर का भार ढोना, सड़के नापना, खाक छानना, आड़ी तिरछी गलियों में भटकना सवर्ण समाज द्वारा सदियों से दलित समाज के किए गए शोषण, अन्याय और अत्याचार को व्यक्त करना है घंटो पैरों को जूतों में कैद रखना मतलब दलित समाज को धर्मशास्त्र, कर्मकांड तथा मिथ्या रुढियों में जकड़ कर रखना है पैरों को ठंडे पानी से धोना भूल जाना अर्थात् दलितों के प्रति इतने शोषण, अन्याय अत्याचार के बावजूद सहानुभूति और करुणा की दृष्टि रखना है

           वर्तमान समय में कवि के समान कुछ सवर्ण लोगों के मन में यह सहानुभूति और करुणा जागृत हुई है उनके मानवीय हक और अधिकारों को वे स्वीकार कर रहे हैं लेकिन धर्मशास्त्र के अनुसार कर्मठ आचरण करने वाले कुछ समूह आज भी दलितों के मानवीय अधिकारों को स्वीकार नहीं कर रहे हैं यही कारण है कि दलित समाज अपने हक और मानवीय अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा हैं, आंदोलन कर रहे हैं इस आंदोलन के कारण सवर्ण समाज का शांतिप्रिय जीवन अस्त-व्यस्त हो रहा है इस मानसिकता को व्यक्त करते हुए कवि राजेश जोशी लिखते हैं-

ओह! पिंडली की एक नस ने हिलाकर रख दिया है

मेरे पूरे वजूद को

कितना असमर्थ कर दिया है इसने

पाँव को उतारकर जमीन पर टिकाना भी नामुमकिन

कमबख्त एक नस ने जरा-सा ऐंठकर

हर मुमकिन को कर दिया

नामुमकिन!”  (जिद, पृ. 29)

 

           अर्थात् कवि कहना चाहते हैं कि स्वतंत्र भारत में दलितों के हक एवं मानवीय अधिकारों को छीन कर कोई भी समूह- समाज शांति से देश में नहीं रह सकता उनकी उपेक्षा करते हुए या उनको टालकर देश का  विकास नामुमकिन है अपने देश के एक समूह को इस तरह से हाशिए पर रखना मतलब देश को अध:पतन की ओर ले जाना है इसी सच्चाई को कवि ने प्रस्तुत  कविता के माध्यम से व्यक्त किया है

         दलितों की तरह ही आदिवासी समुदाय भी सदियों से अपने मानवीय अधिकार और हकों से वंचित है आज भी एक मनुष्य के रूप में उनके अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया जा रहा है इसी कारण आदिवासी आंदोलन भी देश में चल रहा है राजेश जोशी जो मेहनतकश जिंदगी के हर पहलू को अपनी कविता में रेखांकित करते हैं, उनके कविता से भी आदिवासी समुदाय अछूता नहीं रहा उनकी प्रकृति में आए बदलाव को रेखांकित करनेवाली उनकी रतजगा कविता केवल प्रकृति का चित्र नहीं रेखांकित करती बल्कि हजारों सालों से प्रकृति की गोद में बसे हुए भील जनजाति का भी चित्र प्रस्तुत करती है इस कविता के माध्यम से वे कहते हैं कि हमारे नगरों, महानगरों की तमाम शानदार सड़कें जिन्होंने बनाई हैं वे भील जैसी अनेक आदिवासी जनजातियों के लोग ही हैं ये लोग अकाल के कारण अपना घर बार छोड़कर नगरों, महानगरों की ओर बढ़ते हैं शहरों के लिए शानदार सड़कें बनाते हैं और कहीं दूर जाकर बसते हैं शानदार सड़कों पर घूमने वाले शहर के व्यक्ति को बाद में इस व्यक्ति की याद तक नहीं आती उसके बारे में वह सोचता तक नहीं है कवि के शब्दों में-

लेकिन तपती चट्टानों पर नाचते गा रहे हैं

माँदर और कासे की थाली बजा-बजाकर

झाबुआ मेघनगर और जोबट के आए भील

अकाल हर बार ले आता है उन्हें

हमारे शहर

हमारे शहर की तमाम सड़कें निकली हैं उनके ही अकाल से (पृ. 114)

 

          प्रकृति से जुड़ी भील जैसी जनजातियाँ आज भी प्राकृतिक संकेतों को भली-भाँति जानती- पहचानती है इसी को व्यक्त करने वाले राजेश जोशी जी की कविता है राजा भोज ने तालाब बांधा इस कविता में कालिया भील का जिक्र करते हुए कवि ने इन जनजातियों को आम तौर पर किस तरह गुमनाम अँधेरे में हाशिये की जिंदगी जीने के लिए छोड़ दिया जाता है और जब पूँजीवादी ताकतों को अपनी इच्छापूर्ति के लिए उनके ज्ञान की आवश्यकता होती है तो उनका लाभ उठाते हैं, इसका अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है कवि कहना चाहते हैं कि प्राकृतिक जीवन से जुड़ा हुआ भील समुदाय पूंजीवादी ताकतों द्वारा आज भी शोषित है

            भारतीय पितृसत्ताक व्यवस्था द्वारा सभी जाति एवं वर्ण की स्त्री भी शोषित, उत्पीडित रही। सदियों से उसे भी हाशिए की जिंदगी जीने के लिए विवश किया गया। संविधान द्वारा आज उसे अधिकार तो प्राप्त हैं परंतु पितृसत्ताक मानसिकता में बदलाव न आने के कारण आज भी घर परिवार में उसका स्थान और उसकी अवस्था में कोई विशेष बदलाव दिखाई नहीं देता। कवि राजेश जोशी जी की पारखी नजर से स्त्री की यह हाशिए की जिंदगी छूट नहीं पाई। राजेश जोशी जी की प्रतिध्वनी कविता स्त्री की परंपरागत मानसिकता को दर्शाती है साथ ही पुरुष प्रधान व्यवस्था का भी पर्दाफाश करती है उसका अस्तित्व केवल पुरुषों को दोहराना है इस तरह की भावना प्रतिध्वनि कविता में व्यक्त हुई है कवि लिखते हैं-

वह एक परछाई की तरह चलती रही तुम्हारे साथ-साथ

उसने खो दिये अपने सपने और

अपना बातूनीपन

वो जिसे तुम अनदेखा करते रहे लगातार

वो अपनी अनुपस्थिति में भी रही उपस्थित

और दोहराती रही तुम्हारे हर वाक्य के

अंतिम शब्द!”

(दो पंक्तियों के बीच, पृ. 49)

         इसके अतिरिक्त उनकी उसकी गृहस्थी’ (दो पंक्तियों के बीच,पृ. 40) , ‘रैली में स्त्रियां तथा मुलाकात’ (चाँद की वर्तनी, पृ. क्रमशः 32 और 54-55) आदि कवितायें भी स्त्री के शोषित, उपेक्षित और हाशिए पर रखे गए रूप को ही दर्शाती है

         कवि राजेश जोशी जी की ज़िद संग्रह की जिद शीर्षक कविता मेहनतकश- श्रमजीवी, शोषित, पीड़ित लोगों की चेतनाता को अभिव्यक्त करती है यह समुदाय अल्प मात्रा में भी क्यों ना हो अपने हक और मानवीय अधिकार अधिकार के प्रति जागृत हो रहा है उसे प्राप्त करने के लिए आंदोलन तथा संघर्ष कर रहा है हाशिए पर बसे समाज के इस संघर्षशील पहलू को भी राजेश जोशी की कविता अभिव्यक्त करती है श्रम और शोषण ही इनकी एकता और संगठन का आधार है

        कवि ने लिखा है कि अपने हक एवं अधिकार को प्राप्त करने की लड़ाई में यह मेहनतकश लोग कभी-कभी निराश होते हैं परंतु उनकी निराशा अधिक समय तक नहीं रहती वे दुनिया के किसी भी कोने में हुए अन्याय और अत्याचार का विरोध करते हैं रैलियां निकालते हैं मीटिंग का आयोजन करते हैं और उस अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध प्रस्ताव पारित करते हैं उसकी एक खबर बनाते हैं और स्वयं ही अखबार के लिए भेज देते हैं कभी-कभी उनकी खबर अखबारों में छपकर आती है कभी खुद ही रात-रात भर जाग कर मशालें, पोस्टर और प्ले कार्ड बनाते हैं रैली में जुट जाते हैं अगर सौ लोग भी उनसे जुड़ जाते हैं तो उत्साह से भर जाते हैं दुनियादार लोगों की दृष्टि से वे हंसी का बहाना बनते हैं लोग जब उन्हें पूछते हैं कि क्या होगा आपके इस छोटे से विरोध से, परंतु वे पलट कर यह भी नहीं पूछते कि तुम्हारे चुप रहने में ही कौन-सा बड़ा कमाल कर दिया है इस दुनिया में  इस कविता में इस सच्चाई को भी उद्घाटित कर दिया है कि समाज के दुनियादार कहे जानेवाले लोगों की चुप्पियों ने ही अपराध और अपराधियों की संख्या बढ़ाई है अन्यायियों के हौसले बढ़ाए हैं और आज तक छोटी-छोटी आवाजों ने ही अत्याचारी सल्तनतकों बदल कर रख दिया आदि।(जिद, पृ. 33-35) इसी कारण आर. शशिधरन उनकी कविता के संदर्भ में लिखते हैं – “राजेश जोशी की कविताएँ उन लोगों का यशोगान करती हैं जो निरंतर संघर्ष करते हुए जीवन को बदलने का ताव रखते हैं।” (कविता का वर्तमान , संपा. डॉ. पी. रवि, पृ. 79) 

          इसके अतिरिक्त कवि राजेश की कविता में पीढ़ी-दर-पीढ़ी मनोरंजन का काम करनेवाले मसखरे’, बिजली का मीटर पढ़ने वाला व्यक्ति’, मछुआरे आदि श्रमजीवी समाज के लोग भी दिखाई देते हैं

             निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि राजेश जोशी की कविता मेहनतकश जिंदगी के अनछुए पक्ष को छूती है। उनकी कविता में वे मेहनतकश लोग दिखाई देते हैं जिन्हें सदियों से हाशिये पर रखा गया, जिन्हें कभी मुख्यधारा के समाज या व्यवस्था ने स्वीकार नहीं किया। उनकी कविता हाशिये के इन लोगों की जिंदगी के सूक्ष्म-से-सूक्ष्म पहलू को स्पर्श करती है। उनकी कविता में हाशिये के लोगों की संघर्षशीलता भी मुखर हो उठी है।       

 

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