हिंदी आंबेडकरवादी कविता और व्यक्ति की गरिमा
हिंदी आंबेडकरवादी कविता और व्यक्ति की गरिमा
डॉ. संजय रणखांबे
प्रोफ़ेसर तथा विभागाध्यक्ष
हिंदी विभाग
डॉ. अण्णासाहेब जी. डी. बेंडाळे
महिला महाविद्यालय, जलगाँव
भूमिका
स्वतंत्रता के बाद विशेषत: देश में संविधान लागू होने के बाद देश
की सोच में बुनियादी परिवर्तन आया। सभी ज्ञान शाखाओं के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्र में भी
स्वतंत्रता आंदोलन द्वारा तथा देश के संविधान में प्रतिपादित मूल्यों ने जनता को
काफी प्रभावित किया। देश की जनता की गुलामी तथा परंपरागत सोच में भी सकारात्मक
परिवर्तन आया। स्वतंत्रता, समता, बंधुता जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों ने देश के जन-सामान्य को झकझोर दिया। परिणामस्वरुप
देश में विमर्शमूलक साहित्य का साहित्य प्रारंभ हुआ। यह साहित्य संविधान में प्रतिपादित
स्वतंत्रता, समता, बंधुता, न्याय, धर्मनिरपेक्षता, व्यक्ति की गरिमा, आदि लोकतांत्रिक मूल्यों से प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हैं।
हिंदी में भी यह प्रभाव दिखाई देता है। अगर हम संविधान लागू होने से पूर्व का
साहित्य और संविधान लागू होने के बाद का साहित्य देखें तो यह अंतर स्पष्ट रूप से
देख सकते हैं। हिंदी कविता को लेकर भी यह अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
महात्मा फुले, छत्रपति शाहू महाराज, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर आदि महापुरुषों के
आंदोलन, विभिन्न सुधारवादी आंदोलन तथा संविधान ने जो स्वतंत्रता, समानता, बंधुता, न्याय, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता का वातावरण तैयार किया, इसके परिणामस्वरूप समकालीन हिंदी
कविता के साथ समान्तर रूप से विमर्शमूलक साहित्य जैसे- स्त्रीवादी कविता, दलित या आंबेडकरवादी कविता, आदिवासी कविता जैसी काव्यधाराओं का
सूत्रपात हुआ। धीरे-धीरे, दशक-दर-दशक इन काव्यधाराओं का विकास हुआ। प्रारंभ में मुख्यधारा के
साहित्यकारों ने इनकी अलग पहचान को अस्वीकार किया परंतु समाज के हाशिये के लोगों
की आवाज को अंतत: स्वीकार करना पड़ा। परंतु आज भी इस साहित्य को वह जगह प्राप्त नहीं
हुई है जो मुख्यधारा के साहित्य की है। यह साहित्य प्रमुख रूप से सदियों से
उपेक्षित, वंचित समुदाय का है।
प्रमुख
आंबेडकरवादी कवि
हिंदी के प्रमुख आंबेडकरवादी कवियों
में ओमप्रकाश वाल्मीकि, डॉ. एन. सिंह, मोहनदास नैमिशराय, रमणिका गुप्ता, डॉ. पुरुषोत्तम सत्यप्रेमी, सुशीला टाकभौरे, श्यौराजसिह बेचैन, सी. बी. भारती, उमरावसिंह जाटव, डॉ. शरतेन्दु, डॉ. अभयकुमार, सूरजपाल चौहान, ईशकुमार गंगानिया, डॉ. राजेन्द्र बडगुजर, जयप्रकाश लीलवान, सुशीलकुमार शीलू, चिरंजी कटारिया, जयप्रकाश कर्दम, डॉ. रमाशंकर आर्य, रजनी तिलक, कँवल भारती, रामदास निमेश, हरिमोहन आदि प्रमुख हैं।
व्यक्ति की गरिमा
भारतीय संविधान में व्यक्ति
की गरिमा को सर्वोपरि माना है। भारतीय संविधान की उद्देशिका में इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है। उद्देशिका में
स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भारत के सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक
न्याय प्राप्त करने का समान अधिकार है। उन्हें विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की
पूरी स्वतंत्रता है। सभी नागरिकों को
प्रतिष्ठा और अवसर प्राप्त करने की समता है। परंतु यह प्राप्त करने के लिए इन सब में व्यक्ति की गरिमा को
सर्वोपरि माना है। अर्थात् न्याय, स्वतंत्रता, समता इन अधिकारों का प्रयोग करते हुए हर एक नागरिक को हर
व्यक्ति की गरिमा का भी ध्यान रखना है। इन अधिकारों का प्रयोग करते समय दूसरे मनुष्य की गरिमा का हनन
न हो इसका ध्यान सभी नागरिकों ने रखना है।
इस प्रकार भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों की संरचना की गई
है जिसमें हर नागरिक को
अपने अधिकार तो प्रदान किए गए हैं लेकिन साथ ही साथ यह भी ध्यान रखा गया है कि
दूसरे व्यक्ति की गरिमा को किसी भी प्रकार से क्षति न पहुंचे। इस तरह से भारतीय
संविधान व्यक्ति की गरिमा इस मूल्य की स्थापना करता है। “प्रस्तावना में व्यक्ति के गौरव को बनाए रखने के लिए व्यवस्था की गई है। स्वतन्त्रता से पहले
अंग्रेजों ने भारतीयों के गौरव को मान्यता प्रदान नहीं की। भारतीयों के साथ अच्छा
व्यवहार नहीं किया जाता था। आजादी के बाद भारतीयों में गौरव को बनाए रखने के लिए
प्रस्तावना में इस बात को अंकित किया गया कि बिना गौरव अनुभव किए कोई भी राष्ट्र
उन्नति नहीं कर सकता। इस तरह से संविधान की प्रस्तावना के द्वारा भारत में
व्यक्तिगत गौरव को स्थापित रखा जाएगा। इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए सभी
व्यक्तियों को मौलिक अधिकार समान रूप से दिए गए हैं।”1 भारतीय इतिहास में राजतंत्रात्मक व्यवस्था में जहाँ व्यक्ति के
अधिकारों को कुचला गया, उसकी गरिमा को तहस-नहस किया गया, ऐसी स्थिति में
भारतीय संविधान स्वतंत्रता के बाद व्यक्ति की गरिमा को सर्वोच्च स्थान देता है।
हिंदी आंबेडकरवादी कविता में व्यक्ति की गरिमा
भारतीय समाज में सदियों तक जाति व्यवस्था और वर्ण व्यवस्था ने मनुष्य की गरिमा को छीन लिया। उसके श्रम का शोषण किया और इसके बदले में उसे केवल अपमान मिला।
यही कारण है कि कवि परंपरागत भारतीय संस्कृति के इन मूल्यों को नकारता है और संविधान द्वारा स्थापित समता और न्याय इन मूल्यों को स्वीकारता है। क्योंकि
वह जान चुका है कि संविधान में प्रतिपादित मूल्यों से ही उसे परंपरागत
अपमानभरी जिंदगी से मुक्ति मिली है और गरिमा
प्राप्त हुई है-
"अब
वह जान
गये है
/ स्वतंत्रता-समता
और बंधुत्व
जैसे
मानवीय मूल्यों
को जो
मनुष्य मात्र
को / गरिमा
प्रदान करते
हैं।"2
भारतीय समाज ने जाति एवं वर्ण
व्यवस्था द्वारा संचालित अमानवीय परंपराओं में फँस कर व्यक्ति की गरिमा को गौण स्थान दिया । उसके स्वतंत्र अस्तित्व को नकारा ।
जिसके कारण निम्न जाति एवं वर्ग के लोग अपने मानवीय अधिकारों से भी सदियों तक वंचित रहे। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के आंदोलन, संघर्ष और संविधान ने व्यक्ति की गरिमा को फिर से स्थापित किया । इसलिए आज उपेक्षित, वंचित समूह अपने अस्तित्व और पहचान के लिए सम्मान, प्रतिष्ठा और पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। संविधान भी उन्हें उनकी गरिमा और प्रतिष्ठा
प्रदान करता है। कवि सूरजपाल चौहान व्यक्ति की सदियों से
खोई हुई गरिमा के संबंध में लिखते हैं –
“सचमुच, सह रहा हूं / कदम- कदम पर / ओछापन जाति का / क्योंकि- /
मेरी धार्मिक / और सामाजिक पहचान खो चुकी है / घोर अंधकार में /
आज भी- / लगा हूं खोज में / कि- / मैं कौन हूँ।”3
जातिव्यवस्था भारत की वास्तविकता है।
जाति के आधार पर जगह-जगह पर दलित समुदाय को अपमानित किया जाता है। जातिगत ऊँच-नीचता के चलते जानबूझकर उन्हें
अपमानित किया जाता है। सार्वजनिक जगह पर नाम, उपनाम के आधार पर अगर किसी की जाति
पता नहीं चलती तो सीधे जाति पूछ ली जाती है। और जब पता चलता है कि वह किसी दलित
जाति समूह का है तो मुँह बिचकाया जाता है-
“वो पूछता है हर बार / हर मौके पर / हमसे हमारी जात
हमारा जवाब सुन / उसका मुँह कसैला हो जाता है,
साथ ही उसकी आँखों में हमारे प्रति नीचता का भाव और अधिक गहराता जाता है”4
डॉ. आंबेडकर ने अपने संपूर्ण जीवन काल
में अछूत-दलित समाज का जीवन संपूर्ण संसार के सामने रखकर उन्हें न्याय तथा
सभी मानवीय अधिकार दिलवाने का प्रयास किया। उनका यह प्रयास शोषित, पीड़ित जन को गरिमा प्रदान करने के
लिए था। जिंदगी भर वे अछूतों, दलितों के उद्धार के लिए संघर्ष करते रहे। गोलमेज परिषद के माध्यम
से दुनिया के सामने दलितों की गरीबी, दरिद्रता, अज्ञान, अशिक्षा, शोषण तथा अभावग्रस्त जिंदगी का सच
उद्घाटित किया। और उन्हें न्याय दिलाने का प्रयास किया। संविधान का निर्माण करते
समय उन्होंने इस बात का पूरी प्रामाणिकता के साथ ध्यान रखा। यही कारण है कि भारत
का संविधान मनुष्य की गरिमा को सर्वोपरि मानता है। परंतु अभी भी उसके सभी दुःखों
का तथा यातनाओं का सफर खत्म नहीं हुआ है। आज भी सवर्ण समाज द्वारा उसका सामाजिक
तथा आर्थिक शोषण होता हुआ दिखायी देता है। डॉ. शरतेन्दु दलित जीवन का सच बयान करते हुए लिखते हैं -
"भंगी उठा-उठा कर मैला सबका रोज बहाते । इस
पुनित अपराध के लिये कितना पैसा पाते ?
बदले में मुठ्ठी भर गौरव प्यार दे दिया होता। कोई हाथ बढाकर अपना
तनिक छू दिया होता।”5
जाति व्यवस्था और छुआछूत ने यहाँ के सामान्य मनुष्य की गरिमा को रौंद दिया है। सदियों तक इस दलित समाज को यह नरकवत जिंदगी झेलनी पड़ी है। संविधान लागू होने के बाद संवैधानिक रूप से मनुष्य को सम्मान प्राप्त करने का समान अवसर मिला। परंतु जातिव्यवस्था और ऊँच-नीचता समाज में इस तरह से पैठी हुई है कि आज भी इस समुदाय को सम्मान और गरिमा प्राप्त नहीं हुई। शहरों में अभी भी निचले स्तर के काम करना इस समुदाय की मजबूरी है। और यह सफाई का काम करने से सम्मान नहीं मिलता। बल्कि अपमान ही सहन करना पड़ता है। भारत में जातिव्यवस्था, अस्पृश्यता जैसी कुप्रथाएँ किस तरह से यहाँ के मनुष्य की गरिमा को रौंदती आ रही है, इसी का चित्रण आंबेडकरवादी कवि यथार्थ रूप में करता है-
“क्या है यह शहर / ऊंच-नीच का सड़ता मलबा घिन का गारा
यही बात करती हक्का-बक्का
जो करता नरक की सफाई उसको मिलती फटकार-दुत्कार / घूंसे और लातें”6
वर्णव्यवस्था तथा जातिव्यवस्था ने
सदियों से शूद्र तथा अछूत समाज को अत्यंत घिनौनी तथा गंदगी से भरी जिंदगी जीने के
लिए विवश किया। दलित या शूद्र समाज गरीबी, दरिद्रता में जीवन व्यतीत करता था।
अपनी भूख मिटाने के लिए सवर्णों की जूठन का इंतजार करना पड़ता था। गाँव में अगर
कोई जानवर मरता तो उसे गाँव से खींचकर, उस मरे जानवर का मांस खाना पडता था।
भूख के कारण तथा जातिप्रथा के कारण उन्हें यह जिंदगी जीनी पडती थी। इस व्यवस्था ने
दलित व्यक्ति की गरिमा को तार-तार कर दिया था। दलित जीवन के इस
घिनौने और विद्रूप जीवन अतीत को रेखांकित कर, कवि वर्तमान आंबेडकर समाज में चेतना
जागृत कर, उस उत्पीडित दलित जीवन को परिवर्तन के लिए प्रेरित कर, गरिमा प्रदान करना चाहता है।
सवर्णों द्वारा जाति तथा धर्म और धर्मग्रंथों विशेषकर मनुस्मृति के
आधार पर दलितों को गंदगी से भरा जीवन व्यतीत करने के लिए विवश किया। स्वयं साफ-सुथरी तथा विलासिता में जिंदगी
व्यतीत करने वाले सवर्ण समाज ने दलितों को अत्यंत बर्बर जिंदगी जीने के लिए मजबूर
किया। इस सामाजिक विषमता का यथार्थ चित्रण करते हुए आंबेडकरवादी कवि लिखता है-
"उनके आँगन गड्या, बछिया / मेरे आँगन सूअर, मुर्गियाँ / मेरा सिर उनकी लाठी, / बेगारी करने को
गाँव। मेरा गाँव, कैसा गाँव ? / न कहीं ठौर न कहीं ठाँव ।।
ब्याह-बारात का काम कराते / देकर जूठन बहकाते / जब मरता है कोई जानवर / दे देकर गाली उठवाते / दिन रात गुलामी कर-करके / थक गए बिबाई फटे पाँव।
मेरा गाँव, कैसा गाँव ? / न कहीं ठौर, न कहीं ठाँव।"7
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के आंदोलन, संघर्ष और विचारों से तथा संवैधानिक
मूल्यों से जागृत आंबेडकरवादी कवि दलित समाज को अगर सम्मान और गरिमामय जीवन यापन
करना है तो संघर्ष करने और गुलामी की जंजीरें तोड़ने का संदेश देता है-
“उठो, झटक कर फेंक दो ये दासता की बेड़
समता और सम्मान की अगर चाहते हो भोर।”8
इस प्रकार दलित समाज का
सवर्ण समाज द्वारा जो आर्थिक शोषण होता है और जातिप्रथा के कारण उसे जो अपमान से
भरी जिंदगी जीने के लिए मजबूर किया जाता है, इसी का यथार्थ चित्रण आंबेडकरवादी
कवि ने किया है।
देश के दलित समुदाय की गरिमा को इस देश की जाति और वर्ण पर आधारित व्यवस्था, परंपरा और नियमों ने रौंद दिया। कौन नहीं चाहता अच्छा पढ़ना, लिखना, खाना, पीना, साफ सफाई, शांति से रहना, मनुष्य को यह सारी सुख-सुविधाएँ एक गरिमा प्रदान करती है। परंतु धर्म और धर्म ग्रंथो के आधार पर तरह-तरह के नियम बनाकर इस देश के दलित समुदाय को सुख-सुविधाओं से वंचित रखा गया, उसकी गरिमा को खत्म किया गया। उसकी अज्ञानता और अशिक्षा के बल पर तथा अर्थ और ज्ञान पर अपना नियंत्रण स्थापित कर सदियों तक उसे अंधकार की खाई में धकेल दिया गया, इसी सच्चाई को आंबेडकरवादी कवि अभिव्यक्त करता है और दलित समुदाय को भारतीय संविधान द्वारा जो गरिमा पूर्ण जीवन जीने का अधिकार प्राप्त हुआ है, उसका प्रचार प्रसार करता है-
“कौन नहीं चाहता / पढ़ना-लिखना, शांति से रहना
कौन चाहता है / सूअरों के बीच रहना / मर-मर के जीना
गाली सुनना, दुत्कारा जाना / कोई नहीं, कोई नहीं
समाज में रहकर भी / समाज से बहिष्कृत होना
अर्थ और ज्ञान पर रोक लगाकर / तरह-तरह के कानून बनाकर
सभी तरह से कर दिया / दलितों को महरुम / महरुम ! महरुम !”9
वर्णव्यवथा तथा जाति व्यवस्था ने शूद्र तथा दलित को अपनी सेवा के
लिए धर्म तथा ईश्वर के नाम पर अपना बंधुआ मजदूर बनाकर रख दिया था। उससे सवर्ण समाज
अपनी सेवा तो करवाता था पर उसका स्पर्श भी अपवित्र माना गया था। आज भी दलित समाज
साफ सफाई तथा गंदगी दूर करने का काम ही करता हुआ दिखाई देता है। इतनी मेहनत के
बावजूद उसे अपनी जीविका निर्वाह के लिए उचित मेहनताना भी नहीं मिलता। उसके श्रमरत
जिंदगी तथा उसके श्रम-शोषण का चित्र अंकित करते हुए सूरजपाल चौहान लिखते हैं-
"सारा शहर बुहारा
करते / अपना ही घर गन्दा रखते / शिक्षा से रहें कोसों दूर
दारु पीते रहते चूर / बोतल महँगी तो क्या है / देसी थैली सस्ती है।
यह दलितों की बस्ती है।"10
भारतीय संविधान ने व्यक्ति की गरिमा को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया है। इससे पूर्व डॉ. बाबासाहब अंबेडकर का आंदोलन और संघर्ष भी दलित, पीड़ित, शोषित मनुष्य की गरिमा के लिए सम्मान के लिए किया गया आंदोलन था। इसी कारण अंबेडकरवादी कवि अपनी कविता के माध्यम से व्यक्ति की गरिमा, सम्मान को अत्यंत महत्वपूर्ण मानता है। आज अंबेडकरवादी समाज सम्मान के लिए किसी भी तरह के संघर्ष का सामना करने के लिए तैयार है। उसके लिए यह सम्मान और स्वाभिमान की लड़ाई है। किसी भी स्थिति में वह अपने स्वाभिमान और गरिमा के साथ खिलवाड़ नहीं होने देना चाहता। मनुष्य की गरिमा के लिए दलित समूह आज संघर्ष करता नजर आ रहा है।
अपने
संवैधानिक अधिकारों
का उपयोग
करते हुए
उपेक्षित, वंचित
समुदाय के
सभी लोग
आज शिक्षा
के बल
पर, संगठित
होकर अपने
सम्मान और
अस्मिता के
लिए मानव
मुक्ति की
लड़ाई लड़
रहे हैं।
इसी को
आंबेडकरवादी कवि डॉ.सत्यप्रेमी जी
अपनी ‘नव
चेतना की
दस्तक’ कविता
में लिखते
हैं-
“आज जब
शिक्षित होकर / नाई-धोबी
और कुम्हार / दर्जी-तेली, जाट-जाटव, अहीर और
लुहार
खाती-धीमर और
महार-चमार / बलाई-बेरवा, पासी-भांभी, कोली-मेहतर
और सुनार
भील-भिलाले, गोंड-मीणा आदि-आदि और
ताम्रकार ये
सब मेरे
परिवार के
लोग
संगठित
होकर
अपनी
अस्मिता और
सम्मान के
लिए मानव
मुक्ति की
लड़ाई लड़
रहे हैं”11
आंबेडकरवादी कवि तथा समाज अपनी पेट की भूख से ज्यादा अहमियत अपने सम्मान को
देता है। इसे हासिल करने के लिए वह किसी भी तरह के संघर्ष के लिए तत्पर है। इस
मानसिकता को व्यक्त करते हुए कवि लिखता है-
“मैं भूखा
हूँ / मुझे
रोटी नहीं
मिली। मैं
भूखा हूँ
सम्मान का
/ क्योंकि सम्मान
के लिए
छटपटाता रहा
था मैं
/ सदियों-सदियों”12
इस प्रकार धर्मग्रंथों, संस्कृति, परंपराओं द्वारा देश के दलितों को
गाँव के बाहर गंदगी से युक्त, बहिष्कृत जीवन जीने के लिए विवश किया गया है। आंबेडकरवादी कवि ने
दलितों के सदियों से शोषित पीडित, दुःख दर्दभरी तथा अपमानित जिंदगी का यथार्थ चित्र अंकित कर उन्हें
गरिमा प्रदान हो इसके लिए परिवर्तन की आवश्यकता व्यक्त की है। कवि का मानना है कि
संविधान में प्रतिपादित व्यक्ति की गरिमा दलित वर्ग के संबंध में तभी प्रत्यक्ष
रूप से आ सकती है जब समाज का जातिवादी और वर्णवादी रवैया समाप्त होगा। वरन तब तक वह केवल संविधान का एक प्रावधान बनकर
रह जायेगा।
संदर्भ :
1.
डॉ. नवीन कुमार अग्रवाल, भारत की राजनीतिक व्यवस्था, पृ.183-184
2. डॉ.
एन.
सिंह,
अँधेरों के विरुद्ध, पृ. 23
3.
सूरजपाल चौहान, वह दिन जरुर आएगा, पृ.61
4. असंगघोष, अब मैं साँस ले रहा हूँ, पृ. 79
- डॉ. शरतेंदु, पीड़ा
दलित समाज की, पृ. 43
6. डॉ. पुरुषोत्तम सत्यप्रेमी, मूक माटी की मुखरता, पृ.47
7. सूरजपाल चौहान, क्यों विश्वास करूँ, पृ.23
8. डॉ. जयप्रकाश कर्दम, बस्तियों से बाहर, पृ.65
9. विक्रम कुमार, अछूत अछूत अछूत, पृ. 39
10.
सूरजपाल चौहान, क्यों विश्वास करूँ, पृ.45
11.
डॉ. पुरुषोत्तम सत्यप्रेमी, मूक माटी की मुखरता, पृ. 17-18
12.
सूरजपाल चौहान, संभल भी न पाओगे, पृ. 34
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