हिंदी आदिवासी कविता में संवैधानिक-मूल्य
हिंदी आदिवासी
कविता में संवैधानिक-मूल्य
डॉ. संजय रणखांबे
प्रोफ़ेसर तथा विभागाध्यक्ष
हिंदी विभाग
डॉ. अण्णासाहेब जी. डी. बेंडाळे
महिला महाविद्यालय, जलगाँव
भूमिका
भारतीय संविधान में स्वतंत्रता, बंधुता, सामाजिक
न्याय, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, गणराज्यात्म लोकतांत्रिक व्यवस्था आदि प्रमुख संवैधानिक मूल्य अंकित हुए हैं। हिंदी की आदिवासी कविता में इन संवैधानिक मूल्यों को
स्पष्टता से देखा जा सकता है। इसके
अतिरिक्त इस कविता में प्राकृतिक संरक्षण और संवर्धन जैसे वैश्विक मूल्य का भी
समावेश हुआ है।
हिंदी की आदिवासी कविता मूलत: मुंडारी, कुडुख, संताली, खड़िया, हो, नगपुरिया
आदि आदिवासी बोलियों के कवियों द्वारा लिखित हैं।
हिंदी के प्रमुख आदिवासी कवि हैं -
रामदयाल मुंडा, अनुज लुगुन,
ग्रेस कुजूर,
महादेव टोप्पो, ओली
मिंच, ज्योति
लकडा, आलोका
कुजूर, जसिन्ता
केरकेट्टा, नितिशा खलखो,
निर्मला पुतुल, शिशिर
टुडू, शिवलाल
किस्कू, रोज
केरकेट्टा, सरोज केरकेट्टा, सावित्री
बड़ाईक आदि। इन कवियों ने अपनी कविता के माध्यम से अपने संवैधानिक कर्तव्य का पूरी
प्रामाणिकता से पालन किया है।
हिंदी आदिवासी
कविता में संवैधानिक-मूल्य
भारतीय संविधान में संविधान की उद्देशिका, मौलिक अधिकार, नीति निर्देशक तत्व और मूल कर्तव्य के अंतर्गत स्पष्ट रूप से हम संवैधानिक मूल्यों को देख सकते हैं। 1950 के बाद का भारतीय समाज इन मूल्यों से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित है। साहित्य, समाज, ज्ञान विज्ञान की सभी शाखाओं को इन मूल्यों ने प्रभावित किया है। 1950 से पूर्व का भारतीय समाज और 1950 के बाद का अर्थात् संविधान के लागू होने के बाद का भारतीय समाज इनमें बुनियादी अंतर दिखाई देता है। 1950 के बाद का समाज पूरी तरह से भारतीय संविधान में अंकित मूल्यों से प्रभावित है। यही कारण है कि संविधान लागू होने से पूर्व जिन समुदायों को वंचित, उपेक्षित रखा गया था, वह समाज अपने अधिकार के प्रति मुखर होते हुए दिखाई देते हैं। अगर हम साहित्य के क्षेत्र में देखें तो 1950 के पूर्व का साहित्य मूलतः मुख्य धारा का साहित्य है। इस साहित्य में भारतीय समाज के दलित, आदिवासी, स्त्री तथा समस्त उपेक्षित समुदायों को कहीं भी जगह नहीं मिली है। उनके जीवन का चित्र किसी भी साहित्यिक विधा में दिखाई नहीं देता। परंतु 1950 के बाद यह सभी समुदाय अपने जीवन तथा समस्याओं का चित्रण साहित्य के माध्यम से करने लगे। अतः साहित्य में दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, स्त्री विमर्श का साहित्य आदि विमर्शमूलक साहित्य का जन्म हुआ।
कोई स्वीकार करें अथवा नहीं मगर यह भारतीय समाज की सच्चाई है कि भारतीय संविधान में भारतीय नागरिकों को जो अधिकार प्रदान किया उन अधिकारों के परिणाम स्वरूप नया समाज निर्माण हुआ और इस नव निर्मित समाज ने अपना अलग अस्तित्व, पहचान बनाने का प्रयास किया है। संविधान लागू होने से पूर्व भारतीय साहित्य में कहीं पर भी स्वतंत्र रूप से आदिवासी जीवन चित्रित नहीं हुआ। परंतु 1950 के बाद संविधान ने अनुसूचित जनजाति के रूप में आदिवासी समाज को जो पहचान दी, जो आरक्षण दिया उसके परिणाम स्वरूप आदिवासी समाज अपने हक, अपने अधिकार और अपने उपेक्षित जीवन के प्रति सतर्क हुआ। सदियों से व्यवस्था द्वारा हो रहे अन्याय के प्रति मुखर होने लगा, उसका प्रतिकार करने लगा। संविधान में प्रतिपादित मूल्यों के कारण उसके जीवन में परिवर्तन हुआ, उसका जीवन स्तर ऊंचा उठने में मदद हुई। यही कारण है कि इन समुदायों से जो साहित्यकार सामने आए हैं, उनके साहित्य में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से इन संवैधानिक मूल्यों का चित्रण हुआ है।
कवि
खन्नाप्रसाद अमीन अपनी ‘धर्म और संविधान’ कविता में
आदिवासी कविता की संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता को व्यक्त करते हुए
लिखा है -
“संविधान ने
दी गुलामी से आजादी / तुम्हें धर्म
ने छूत-अछूत बना रखा
संविधान ने समानता के हक से इन्सान बनाया / तुम्हें धर्म ने शिक्षा से वंचित रखा
संविधान ने शिक्षा का अधिकार दिया / तुम्हें धर्म ने विकास से वंचित रखा
संविधान ने विकास के सारे द्वार खोले / तुम्हें धर्म ने शहर-गाँव से दूर रखा
संविधान ने शेष समाज से जोड़ा / तुम्हें धर्म ने ऊँच-नीच बनाया”1
इस तरह से यह कविता प्रातिनिधिक लगती है जिसमें
संविधान में प्रतिपादित स्वतन्त्रता, बंधुता, न्याय, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता आदि सभी मूल्य दिखायी देते हैं।
स्वतंत्रता
स्वतंत्रता भारतीय संविधान में
स्थापित एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण मूल्य है। भारतीय संविधान की उद्देशिका तथा संविधान
के भाग-3 के अनुच्छेद 19 से 22 तक स्वतंत्रता के अधिकार का प्रावधान है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1) में नागरिकों को स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्राप्त हुआ है।
भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रता एक महत्त्वपूर्ण मूल्य
है। भारतीय संविधान की उद्देशिका में देश के हर एक नागरिक को विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता
प्राप्त करने का अधिकार प्रतिपादित किया गया है। आदिवासी समाज भी अपने अधिकार का उपयोग करते हुए अब
बोलने लगा है, सोचने लगा है और अपने अधिकारों की माँग करने लगा है। परंपरागत
संस्कृति के नाम पर राष्ट्रीय त्योहार में उसकी संस्कृति का प्रदर्शन करते समय वह
सभ्य समाज के लोगों को अच्छा लगता है। परंतु जब वह अपने अधिकारों की माँग करता है
तब उसे उग्रवादी, आतंकवादी, दिग्भ्रमित, बुद्धिहीन आदि जाने क्या-क्या कहा जाता है।2 आदिवासी कवि संविधान द्वारा प्राप्त अपने स्वतंत्रता के अधिकार का
प्रयोग करते हुए अपनी कविता के जरिए अपने समाज की बात करता है। कवि महादेव
टोप्पो जी लिखते हैं –
“हाँ, उनमें आ गई है अब एक बुराई/ वे-/ कुछ-कुछ सोचने लगे हैं
कुछ-कुछ बोलने लगे हैं/ कुछ-कुछ माँगने लगे हैं...”3
इस तरह से भारतीय संविधान में
प्रतिपादित स्वतंत्रता मूल्य को हम आदिवासी कविता में देख सकते हैं। अपने इसी
अधिकार का प्रयोग करते हुए अपने अधिकारों की माँग के लिए अब आदिवासी मनुष्य, समाज संसद के द्वार से अपने हक और
अधिकारों की माँग करता नजर आ रहा है।
आदिवासियों
की स्वतंत्रता उनका प्राकृतिक होना है। प्रकृति की गोद में ही वे अपने आप को
स्वतंत्र मानते हैं। परंतु विकास के नाम पर उनसे उनके प्राकृतिक जीवन को छीना जा
रहा है। एक तरह से उनकी स्वतंत्रता पर यह हमला है। वर्तमान पूंजीवादी ताकतों
द्वारा सरकारों की मदद से उनकी स्वतंत्रता को तो खत्म किया ही जा रहा है साथ ही
साथ प्राकृतिक संसाधनों का भी विनाश किया जा रहा है। इसी सच्चाई को आदिवासी कविता व्यक्त करती है। कवयित्री
आलोक कुजूर जी अपनी 'बातें चिड़ियों की' कविता में
लिखती है -
“पहाड़ टूटे, गाँव टूटा / परिवार टूटे, टूटा मेरा दिल /
नदियाँ रेत, जंगल है
विरान / खो गई आवाज
बंशी की तान
उजड रहे गाँव, विखरा अपना
ठाँव / खड़ी हो रही
इमारतें”4
इस तरह से
आदिवासी कविता वर्तमान समय के परिप्रेक्ष्य में स्वतंत्रता इस संवैधानिक मूल्य का
चित्रण करती है।
समता
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 18 (1) के अनुसार सभी प्रकार के विशेष अधिकारों तथा उपाधियों को समाप्त किया गया है। देश के सभी नागरिक समान है। राज्य सेवा या विधि संबंधी सम्मान के सिवा और कोई उपाधि प्रदान नहीं करेगा। इस प्रावधान के कारण राजा, जमींदार आदि विशेष स्थान, पद समाप्त किए गए हैं। इसी कारण कभी राजा, ठाकुर होते थे, अब उनके विशेष स्थान समाप्त किए गए हैं। अब राजतंत्र समाप्त हो चुका है। उनके राजमहल भी तहस-नहस हो चुके हैं। यह संविधान द्वारा प्रस्थापित की गई समता है। देश के सभी नागरिक समान है। इस संदर्भ में रामदयाल मुंडा जी अपनी ‘राजा ठाकुर होते थे’ कविता में लिखते हैं-
“राजा ठाकुर होते थे/ सोचकर जी धुक-धुक करता है/
अब वे चुप है किसी कोने में/ धूल उड़ने लगी है घोड़साल में/ वे चुप हैं किसी कोने में”5
अब सभी लोग समान हैं, सभी को समान रूप से श्रम करना होगा, संविधान ने यह समता स्थापित की है।
संविधान के भाग 4 के अंतर्गत राज्य की नीति के निदेशक तत्व समाविष्ट किए गए हैं। इसके अंतर्गत अनुच्छेद 38(1) के अनुसार राज्य को यह
निदेश दिया है कि राज्य देश में आर्थिक न्याय स्थापित करने का प्रयास करें तथा लोक
कल्याण की वृद्धि का प्रयास करेगा। भारतीय संविधान में यह प्रावधान देश में आर्थिक दृष्टि से समता
स्थापित करने के उद्देश्य से किया गया है।
संविधान ने सैद्धांतिक रूप से देश में समता स्थापित करने का प्रयास किया है। भारतीय संविधान में अनुच्छेद 14 से 18 में समता संबंधी प्रावधान है और असमानता पूर्ण व्यवहार करना संवैधानिक रूप से दंडनीय अपराध माना गया है। धर्म, जाति, वंश, लिंग, जन्म स्थान, मूलवंश आदि के आधार पर कोई भी विभेद करना अपराध है। परंतु अगर हम व्यावहारिक रूप से देखें तो आज भी भारतीय नागरिकों के मन से धर्म, जाति, लिंग संबंधी विभेद करने वाली भावना का अंत नहीं हुआ है। परंपरागत सोच इतनी गहरी पैठ कर बैठी है कि अभी भी लोग किसी भी व्यक्ति की पहचान करते समय उसके उपनाम से जाति के आधार पर करते हैं। यही कारण है कि आदिवासी मनुष्य जो संवैधानिक अधिकारों को जान चुका है, संवैधानिक समता को समझ चुका है, वह सवाल पूछता है कि कब तक यह वर्णव्यवस्था में दिया गया चौथी श्रेणी होने का नागरिक होने का दर्द भोगते रहेंगे? आदिवासी मनुष्य को यह सवाल पूछने की ताकत भारतीय संविधान ने प्रदान की है। कवि महादेव
टोप्पो जी के शब्दों में-
“लेकिन एक सवाल तब भी बचा रहेगा-/
इस देश में कास्ट सर्टिफिकेटों के माध्यम से ही/ पहचाने जाते हम लोग/
चौथी श्रेणी के नागरिक होने का/ दर्द भोगते रहेंगे कब तक?”6
आरक्षण जो
समता के लिए उठाया गया संवैधानिक कदम है। इसका विरोध करने वाले समता के विरोधी हैं। वे जाति एवं वर्णवादी लोग हैं। इस बात को अब सभी शोषित-वंचित समुदाय के लोग समझ चुके हैं। उनकी मानसिकता का चित्रण करते हुए आदिवासी कवि ग्लैडसन डुंगडुंग लिखते हैं-
“प्रतियोगिता में प्रथम आने की/ कभी कोशिश भी मत करना/
अंतिम पायदान पर ही रखेंगे हम तुम्हें/ डॉक्टर, इंजीनियर और ऑफिसर बनोगे/
तो बता देंगे दुनिया को हम-/ “मेरिट तुम में है कहाँ/ आरक्षण ही तो है तुम्हारा सहारा...”7
इस तरह से समता की ओर उठाया गया कदम सवर्णवादी मानसिकता को रोकने का काम करता है। आदिवासी कविता समता स्थापित करने में बाधा उत्पन्न करने वाले इन विभिन्न तत्वों का भी चित्रण करती है।
अगर हम भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह सिद्ध होता है कि यहाँ की जाति एवं वर्णवादी व्यवस्था, यहाँ का दर्शनशास्त्र, यहाँ का धर्मशास्त्र सभी प्रकार के विभेदों का कारण है। इन शास्त्रों ने समाज में असमानता फैलाई है। इसे अब सभी उत्पीड़ित समुदाय के लोग भली भाँति जान चुके हैं। इसलिए आदिवासी कवि
डंके की चोट पर इस व्यवस्था को और शास्त्रों को नकारते हैं जिन्होंने यहाँ के मनुष्य को आदिवासी, दलित, महिला इन खेमों में बाँट कर समाज
में असमानता फैलाई। विषमतामूलक दर्शनशास्त्र की धज्जियाँ
उड़ाते हुए कवि ग्लैडसन डुंगडुंग अपनी ‘हमें नहीं चाहिए तुम्हारा रंगीन चश्मा’ इस कविता में लिखते हैं-
“हमें नहीं चाहिए तुम्हारा रंगीन चश्मा/ जो दूसरों से भेदभाव दिखता है
हमें नहीं चाहिए तुम्हारा दर्शनशास्त्र/ जो आदिवासी, दलित और महिला से
भेदभाव सिखाता है/ हमें नहीं चाहिए तुम्हारी मुख्यधारा
जहाँ भ्रूण-हत्या-दहेज-हत्या और/ महिलाओं को जिंदा जलाने का/ चलन है”8
इसी तरह से कभी परंपरागत दर्शनशास्त्र को भेदभाव, हिंसा, नफरत, हत्या, लूट, शोषण और बलात्कार से भरा हुआ कहता है।1
आदिवासी
सभ्यता किसी भी प्रकार के विभेदों को स्वीकार नहीं करती। दुनिया के अधिकांश
आदिवासी समुदायों में मातृसत्ताक-व्यवस्था रही है। लिंग के आधार पर स्त्री-पुरुष के बीच
भेदभाव का उनका इतिहास दिखायी नहीं देता। उनकी सभ्यता में स्त्री और पुरुष समान
है। भारतीय संविधान ने भी लिंग के आधार पर इस तरह के भेदभाव को अस्वीकृत किया है। इस दृष्टि से
भारतीय संविधान आदिवासी जन- जीवन से जुड़ा हुआ है। कवि अनुज लुगुन लिखते हैं-
" पितृसत्ता के
विषाणु फैल रहे हैं हमारे बीच / जो घातक हैं मुक्ति की राह में....?" 9
इस
प्रकार कवि ने आदिवासी सभ्यता का चित्रण
करते हुए भारतीय संविधान में मौजूद समता इस मूल्य को भी अप्रत्यक्ष रूप से दर्शाया
है। क्योंकि इस तरह के लेखन के पीछे भारतीय संविधान दवारा निर्मित स्वतंत्रता, बंधुता, समता, न्याय का
माहौल है जिसने दलित, पीडित, उपेक्षित समुदायों को अस्मिता एवं पहचान प्रदान की
है।
संविधान द्वारा प्राप्त स्त्री-पुरुष समानता से पूर्व देश में
धर्मग्रंथों ने असमानता फैलायी थी। संविधान दवारा प्राप्त अधिकारों से, ज्ञान, शिक्षा हासिल करने से तथा आंबेडकर के
विचारों से जाग्रत समुदाय या स्त्री वर्ग इस बात को अब भलीभाँति जान चुका है कि
धर्मग्रंथों के आधार पर ही समाज में सदियों तक स्त्री-पुरुष का भेद बना रहा। आज भी
धर्मग्रंथों के चंगुल में फँसे हुए लोग इससे निजात नहीं पा सके हैं। लेकिन शिक्षित, जागृत वर्ग इसे समझ चुका है। आदिवासी कवयित्री ज्योति
लकडा जी अपनी ‘तुम्हारा डर’ कविता में लिखती है-
"तुम डरते हो मुझसे/ इसलिए धर्म-ग्रंथों में
बराबरी और इन्सान का दर्जा नहीं दिया...”10
इस तरह भारत में धर्मग्रंथों ने
स्त्री-पुरुष के बीच का भेदभाव समाज में इस तरह से फैलाया था कि स्त्री को
मनुष्य के रूप में स्वीकार ही नहीं किया था।
उसे अपने सभी माननीय अधिकारों से वंचित रखा था। जसिंता केरकेट्टा के
शब्दों में -" पीढियों पर करने को अपना अधिकार, तुमने अनसुनी कर
दी स्त्री की चीत्कार"11 भारतीय संविधान ने इस गैरबराबरी को मिटाते हुए उसे
अपने मानवीय अधिकार प्रदान किए।
भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में जाति, धर्म के विभिन्न रंग के
आधार पर विभेद करना, देश को खंडित करना है।
किसी एक धर्म या जाति का पक्ष लेकर दूसरे धर्म का, जाति का द्वेष करना देश की
अखंडता को खंड-खंड करना है। ऐसे माहौल से
देश की बंधुता या भाईचारा समाप्त हो सकता है। इसी कारण बंधुत्व या भाईचारे
संवैधानिक मूल्य अक्षुण्ण रखने की दृष्टि से आदिवासी कवि अनुज लुगुन अपनी ‘बहुत कम बच रहा है ऑक्सीजन’ कविता में लिखते हैं-
“किसी एक आदमी/ या, किसी एक रंग की जातीयता
और राष्ट्रीयता की बात/ अचानक लाखों लोगों को मौत की नींद सुला सकती है।”12
इस प्रकार आदिवासी कविता संविधान में प्रतिपादित राष्ट्रीय एकता तथा बंधुता का
चित्रण करती है।
न्याय
भारतीय संविधान ने
सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक
न्याय प्राप्त करने का समान अधिकार प्रदान किया है। इसके लिए संविधान में विभिन्न
प्रावधान किए गए हैं। परंतु यह न्याय अभी
भी संपूर्ण भारतीय समाज में पूरी तरह से स्थापित नहीं हो पाया है। आदिवासी समुदाय इस न्याय प्राप्ति में सबसे पीछे है। इसी कारण आदिवासी कवि अपनी कविता के माध्यम से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की सच्चाई को रेखांकित
करता है।
राजनीतिक दृष्टि से अभी भी आदिवासी समुदाय को सही दृष्टि से न्याय प्राप्त नहीं
हुआ है। गाँव में वह राजनीतिक पद पर तो
आसीन होता है परंतु उसे प्रस्थापित समाज द्वारा किसी भी तरह की स्वतंत्रता नहीं दी
जाती। इसी को अभिव्यक्त करते हुए आदिवासी
कवि रामदयाल मुंडा जी लिखते हैं-
“अपने गाँव में अपना
राज/ सचमुच की आजादी के
लिए
कागज तो आ गए हैं/ (किंतु)
आर्डर नहीं है, हे राजा
कितने दिन ऐसे चलेगा/ तुम्हारा राज हे राजा?”13
इस तरह से अभी भी
देश के आदिवासी समाज को राजनीतिक स्वतंत्रता, राजनीतिक न्याय प्राप्त नहीं हुआ है, इसी को आदिवासी कविता व्यक्त करती
है।
रोज केरकेट्टा की ‘बरगद’ शीर्षक कविता संविधान में प्रतिपादित न्याय की अवधारणा का
प्रतीकात्मक चित्रण करती है। बरगद के पेड़ पर जिस तरह से सभी पक्षी, प्राणी मिलकर रहते हैं। सभी अपनी
जरूरत को समान रूप से पूरा करते हैं। इस तरह से हम मनुष्य ने भी अपने देश, अपने घर, अपने गाँव में शांति से, सम्मान के साथ रहना चाहिए। इस तरह का
सपना आदिवासी कविता देखती है। उस बरगद के पेड़ को लोकतांत्रिक पेड़ कहते हुए
कवयित्री लिखती है-
“लोकतांत्रिक पेड़ पर/ न कोई भूखा/ न कोई प्यासा
ना कोई अमीर/ ना... कोई गरीब/ सब आजाद, सब आजाद”14
इस प्रकार पक्षी और प्राणियों की तरह ही कवयित्री मनुष्य के संदर्भ
में आगे लिखती है-
“यदि हम भी रह लेते/ देश, घर-गाँव में अपने/ शांति से
इज्जत से/ अमीर और गरीब भी नहीं बनते नासूर/ जन-जन के।”15
यहाँ सामाजिक न्याय के संदर्भ में
आदिवासी कविता सबकी आजादी की सब की बुनियादी जरूरत की और सामाजिक समता आर्थिक समता
की बात करती है।
भारतीय संविधान में देश के सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार प्रदान किया है। इस दृष्टि से अनुच्छेद 39 अनुसार देश के सभी लोगों को अपनी जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार मिला है। जीविका के लिए मनुष्य की सबसे पहली जरूरत अन्न है। लेकिन फिर भी देश की अधिकांश आबादी आज भी अपनी इस बुनियादी
जरूरत को आसानी से पूरी नहीं कर पाती। आदिवासी समुदाय भी अपनी इस बुनियादी जरूरत के लिए काफी संघर्ष कर रहा है। देश के संविधान ने यह जागृति निर्माण की है कि अन्न प्राप्त करना सबका समान अधिकार है। लेकिन फिर भी आदिवासी क्षेत्रों
में भूख के कारण मरने वालों की संख्या काफी है। देश का असंतुलित विकास इसके लिए जिम्मेदार है। कवयित्री ने भूख की समस्या और वर्तमान स्वार्थी राजनीति को बेनकाब करते हुए लिखा है-
“उनकी लाशें दुनिया को बता सकेंगी/ उन चंद खास भूखे लोगों की दास्तान
जो लाखों वोट और करोड़ों नोट डकार कर/ अब भी जीते हैं चुनाव में नई जीत के लिए”16
इन्हीं अधिकारों के प्रति सचेत और जागृत आदिवासी कवयित्री निर्मला पुतुल व्यवस्था से सवाल पूछती है कि-
“भूख और गरीबी का दंश झेलते/ जीवन-मृत्यु के बीच लटकते बूढ़े/
यूँ ही करवट बदलते रहेंगे/ आखिर कब तक?”17
व्यवस्था से सवाल पूछने का यह अधिकार संविधान ने प्रदान किया है संविधान लागू होने के पूर्व देश में कभी ऐसे हालात नहीं रहे हैं कि वह अपने ऊपर हो रहे अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाएं, सवाल पूछे। संविधान ने जो लोकतांत्रिक व्यवस्था इस देश को दी है, उस लोकतांत्रिक व्यवस्था और मूल्यों का ही परिणाम है कि आज उपेक्षित समुदाय अपने हक और अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, आवाज उठा रहे हैं।
भारतीय संविधान में सबको
अपने जीवन यापन के लिए मेहनत करने का अधिकार प्रदान किया है और इसी अपने संवैधानिक
अधिकार को व्यक्त करते हुए कवि आगे लिखते हैं –
“तुम तो करोगे राज - पाट की बात/ मुझे काम - काज की बात कर लेने दो
कुदाल चला लेने दो/ लोहा गला लेने दो/ अपना पेट पाल लेने दो
मुझे मेरी श्रमशील
नागरिकता दे दो”18
इस तरह से आदिवासी कविता संविधान में प्रतिपादित अपने अधिकारों को जानकर
उसकी माँग कर संवैधानिक मूल्य का चित्रण करती है।
भारतीय संविधान ने देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम की है। प्रजा द्वारा संचालित व्यवस्था को प्रजातांत्रिक या जनतातांत्रिक व्यवस्था कहा जाता है। संविधान ने ग्राम से लेकर केंद्र तक लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम की है। परंतु वर्तमान राजनेता अपने स्वार्थसिद्धि के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था को सत्ता, अर्थ और धर्म
के आधार पर संचालित कर रहे हैं। इसके कारण देश में केवल नाम भर का लोकतंत्र दिखाई
दे रहा है। इस लोकतंत्र में जनता या लोक कहीं भी दिखाई नहीं
देता है।
कवि का कहना है कि जब तक प्रजा अपना तंत्र नहीं
बनाती है तब तक प्रजातंत्र या जनतंत्र देश में स्थापित नहीं हो सकता है। इस संदर्भ में संविधान सभा के
सदस्य जो एक आदिवासी समुदाय के थे – जयपाल सिंह मुंडा का संविधान सभा का यह वक्तव्य कि “आदिवासियों का देश की भावी
प्रजातंत्र व्यवस्था में प्रभावशाली प्रतिनिधित्व होना चाहिये,”19 उल्लेखनीय है।
आज के
लोकतंत्र में प्रजा अलग और तंत्र अलग हो चुका है। लोकतंत्र
में लोक सर्वोपरि होता है। लेकिन आज के लोकतंत्र में प्रभु मंत्र ही अधिक जपा
जा रहा है। जिससे कि सत्ता हासिल की जाए। इससे कवि
कहना चाहता है कि जब तक हम राज, धर्म और अर्थ पर बने प्रभु तंत्र पर हम कब्जा नहीं
करते तब तक लोग स्वतंत्र नहीं हो सकते। इस संबंध में कवि हरिराम मीणा लिखते हैं-
"प्रजा अलग है
तंत्र अलग है यह कैसा जनतंत्र
प्रजातंत्र तब प्रजा बनाये जब अपना सब तंत्र
लोकतंत्र है नाम तंत्र का क्यों जपता प्रभुमन्त्र
लोक सर्वदा रहा भद्र के ही अधीन परतंत्र
राज, अर्थ व धर्म
शक्ति से पनपा है प्रभुतंत्र
इन पर कब्ज़ा किये न हो सकता है लोक स्वतंत्र"20
भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में कई सारी खामियाँ, कमजोरियाँ दिखाई देती है। परंतु यह खामियाँ संविधान के कारण नहीं हैं। परंतु चालक राजनेताओं द्वारा संविधान संशोधन या परिवर्तन के नाम पर इसका दोष संविधान पर मढ़ा जाता है। आदिवासी कवि इस षड्यंत्र को भी भली-भाँति जान चुका है। इसलिए सीधे वह कहता है कि संविधान में कोई खोट नहीं है बल्कि जो राजनेता है, उनके मन में खोट है। इसी कारण आज प्रजा अलग और तंत्र अलग दिखाई देता है। इस सच्चाई को जानकर ही आदिवासी कवि हरिराम मीणा लोकतंत्र तथा संविधान के गुण गाते हुए लिखते हैं
“संविधान में
कमी नहीं है फिर भी खोजें खोट
वक्त बड़ा है भाई,
समझो, प्रजा लुहारी चोट
प्रजा अलग है तंत्र अलग है यह कैसा जनतंत्र
प्रजातंत्र तब प्रजा बनाये जब अपना सब तंत्र
लोकतंत्र के गुण मैं गाता / जय हो भारत माता !”21
भारत के प्रस्थापित समाज द्वारा आदिवासी जन समुदाय को स्वतंत्र भारत के
नागरिक के रूप में अभी भी पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया गया। उन्हें मनुष्य के
रूप में देखने का अभी भी सभ्य कहा जाने वाला समाज आदि नहीं हो चुका है। जंगली कहकर
अभी भी उनकी मनुष्यता को नकारा जाता है। हर समय एक संशय की नजर से उनकी ओर देखा
जाता है। अभाव, भूख, गरीबी, दरिद्रता जैसी समस्याएँ
इनका जीवन दुर्भर कर देती है। नागरिकता के प्रमाण भी उनके पास है। परंतु फिर भी
आत्मविश्वास और अपने आप को हीन समझने की भावना के कारण वह हमेशा डरे-सहमें में दिखाई देते हैं।
भारतीय सभ्य समाज ने भी उन्हें हमेशा हाशिए पर ही रखा। उनके पास आधार कार्ड है, राशन कार्ड है, नागरिकता के सारे प्रमाण
हैं। लेकिन भूख, बेबसी, गरीबी और दरिद्रता के कारण
ये लोग हमेशा डर के साये में जीते नजर आते हैं। भारतीय संविधान में समाजवाद को
स्वीकार किया गया है। गरीबी, दरिद्रता को दूर कर सबको आर्थिक दृष्टि से समान करना इसका मकसद है। इसी समाजवाद से परिचित आदिवासी कवि अपने समुदाय
की असलियत को बयान करते हुए देश में आदिवासियों की उन्नति के लिए समाजवाद की
आवश्यकता को व्यक्त करता है। कवि अनुज लुगुन अपनी ‘नागरिकता के सीमांतों पर
खड़े लोग’ शीर्षक कविता में लिखते
हैं-
“नागरिकता के सीमांत पर
खड़े लोग आपकी तरह/
मुस्कुराते हुए आधार कार्ड
दिखा नहीं सकते/
राशन कार्ड लिए हुए भी
उनका दिल धड़कता रहता है/
वे जानते हैं उन्हें कभी
भी अनाज की जगह/ जेल की सलाखें मिल सकती हैं/
वे आपको अपना भूगोल दिखा
सकते हैं, मानचित्र नहीं/
वे गोद में अपनी/ बिलखते बच्चों को दिखा सकते हैं, उनका भविष्य नहीं”22
कवि कहना चाहता है कि स्वतंत्र भारत का नागरिक होते हुए भी आदिवासी समुदाय
की ओर एक अपराधी, नक्सली की नजर से देखने के
कारण वे हमेशा डरे-डरे से रहते हैं। उन तक अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए आवश्यक
साधन भी नहीं पहुँच पाये हैं विकास तो काफी दूर है।
पर्यावरण संरक्षण तथा संवर्धन
भारतीय संविधान में स्वतंत्रता, बंधुता, सामाजिक
न्याय, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, गणराज्यत्म लोकतांत्रिक व्यवस्था आदि प्रमुख संवैधानिक मूल्य परिलक्षित होते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य कई मूल्यों का प्रतिपादन भी संविधान करता है। अगर हम आदिवासी कविता के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह दृष्टिगोचर होता है कि आदिवासी समाज अपने जल, जंगल और जमीन के प्रति अत्यंत संवेदनशील है। हिंदी की आदिवासी कविता में प्राकृतिक संसाधनों-स्त्रोतों
के संरक्षण और संवर्धन इस मूल्य के कई पहलू उजागर हुए हैं। अभी भी यह समाज प्रकृति की गोद में रहना पसंद करता है। जल, जंगल, जमीन को अपनी संपत्ति मानता है।
संविधान सभा में सदस्य जयपाल सिंह ने कहा है – “जल, जंगल, जमीन
आदिवासी जीवन का आधार है।”23
भारतीय संविधान ने भी इसे स्वीकार किया है।
भारतीय संविधान के भाग 4 के अंतर्गत राज्य के नीति निदेशक तत्व प्रतिपादित किए हैं। उनके अंतर्गत अनुच्छेद 48 (क) के अनुसार “राज्य, देश के पर्यावरण के संरक्षण तथा संवर्धन का और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा।”24
आदिवासी क्षेत्रों में पहाड़ों, नदियों तथा नहरों पर बड़े-बड़े प्लांट लगाए जा रहे हैं। यह क्षेत्र सत्ताधारियों द्वारा पूंजीपतियों को लीज पर दिए जा रहे हैं। इस प्राकृतिक दोहन का विरोध करते हुए आदिवासी कवि रामदयाल मुंडा लिखते हैं –
“उसे बाँधकर ले जा रहे थे/ राजा के सेनानी/ और नदी
छाती पीटकर रो रही थी/ लौटा दो, लौटा दो/ मुझे मेरा पानी।”25
इसी षड्यंत्र को व्यक्त करने वाली उनकी दूसरी कविता है - असहायता। इस कविता में कवि रामदयाल मुंडा लिखते हैं – “नदी/ ना, ना करती रह गयी-/ उस मनचले ने उसका/ लूट लिया पानी।”26
प्राकृतिक संपदा या स्त्रोत चाह कर भी मनुष्य निर्माण नहीं कर सकता। इसलिए इसका उपयोग सभी मनुष्यों ने संयमित रूप में करना चाहिए। सभी लोगों ने अपना परम कर्तव्य समझकर इसकी रक्षा करनी चाहिए। इसी उद्देश्य से भारतीय संविधान के निर्माता ने इसे मूल कर्तव्य के अंतर्गत संविधान के भाग चार में समाविष्ट किया है। अनुच्छेद 51क (छ) के अनुसार- “प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्यजीव हैं, रक्षा करे और उसका संवर्धन करे तथा प्राणी मात्र के प्रति दयाभाव रखे;”27
आदिवासी समाज भारतीय संविधान के निर्माण के पहले से ही अपने इस मूल कर्तव्य का पूरी प्रामाणिकता से पालन करता आ रहा है। संविधान से उसके इस जीवन संस्कार को संवैधानिक आधार दिया तथा एक मूल्य के रूप में स्थापित कर सभी भारतीयों को इस कर्तव्य के प्रति सजग किया है। आदिवासी समाज अपने इस संवैधानिक मूल्य को संस्कार के रूप में अपना कर पूरी प्रामाणिकता के साथ निभा रहा है। इसे उसने जीवन मूल्य के रूप में अपनाया है। आदिवासी समाज के इस प्रकृति के प्रति व्यवहार को आदिवासी कवयित्री ग्रेस कुजूर जी ने अपनी कविता में दर्ज करते हुए लिखता है-
“न छेड़ो प्रकृति को/ अन्यथा यही प्रकृति/ एक दिन माँगेगी हमसे
तुमसे अपनी तरुणाई का/ एक-एक क्षण और करेगी
भयंकर बगावत और तब/ न तुम होगे/ न हम होंगे!”28
निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि संविधान के अनुच्छेद 48 क. और 51 क (छ) में दिए गए प्रावधानों के आधार पर प्राकृतिक स्रोतों की रक्षा करना समस्त नागरिकों का और राज्य का कर्तव्य है। आदिवासी समाज संविधान के अस्तित्व में आने से पूर्व से अपने इस कर्तव्य को पूरी प्रामाणिकता के साथ निभा रहा है। संविधान में इस मूल्य को स्थापित कर एक दृष्टि से संविधान में आदिवासी जीवन और संस्कृति को आदर्श के रूप में स्थापित किया है।
संवैधानिक अधिकारों के प्रति सचेत अर्थात् संघर्षशीलता
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 में भारतीय नागरिकों को शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन का मौलिक अधिकार प्राप्त हुआ है। इस अधिकार के कारण भारतीय जनता को संगठित होकर किसी भी अन्याय का विरोध करने का अधिकार प्राप्त हुआ है। यह अधिकार संविधान लागू होने के पहले देश के नागरिकों को नहीं था । भारतीय संविधानकर्ताओं ने अपने मूल अधिकारों की रक्षा के लिए तथा नागरिकों की स्वतंत्रता के लिए यह अधिकार प्रदान किया है। इन्हीं अधिकारों का प्रयोग करते हुए दलित, आदिवासी, स्त्री, किसान, मजदूर आदि अपेक्षित, वंचित समुदाय अपने अधिकारों के लिए आंदोलन करते हुए दिखाई दे रहे हैं।
हिंदी आदिवासी कविता ने भी यही कार्य किया है। कवि रामदयाल मुंडा अपनी ‘चेतावनी’ शीर्षक कविता में लिखते हैं –
“नदी और आग से/ न कीजिए नादानी/ एक मारती है पानी से/ दूसरे बिन पानी।”29
कवयित्री ग्रेस कुजूर जी की कविता है ‘कलम को तीर होने दो’। इस कविता के माध्यम से कवयित्री ने आदिवासी समुदाय की संघर्षशीलता को चित्रित किया है। अपने शोषण को मिटाने के लिए, अन्याय को दूर करने के लिए वह निरंतर संघर्ष की आवश्यकता
व्यक्त करता है। आदिवासी समाज की संघर्षशीलता को अभिव्यक्त करते हुए कवयित्री लिखती है –
“शाखें हो गई कमान, सब कोंपल तीर/ देखना बाकी है कलम को तीर होने दो
उगल रही धरती आग है/ धुआं हमने पिया है/ बूँद-बूँद को तरसे लोग
बूँद बहाकर जिया है/ नदियाँ हो गयीं कमान, सब पर्वत तीर
देखना बाकी है कलम को तीर होने दो” 30
इस तरह से कवयित्री ने आदिवासी जनजीवन से अपने प्रतीकों का चयन करते हुए आदिवासी समुदाय की संघर्षशील मानसिकता का और संगठित भावना का चित्रण करते हुए संवैधानिक मूल्यों को ही दर्शाया है कि जो आदिवासी जन-जन तक किस तरह से पहुंच चुके हैं।
निष्कर्ष रूप से कह सकते हैं कि हिंदी की आदिवासी
कविता में संवैधानिक मूल्यों का सूक्ष्म चित्रण हुआ है। स्वतंत्रता, समता, बंधुता, न्याय, समाजवाद, लोकतांत्रिक व्यवस्था, व्यक्ति की गरिमा, पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा संवैधानिक
नियमों पर आधारित अपने अधिकारों के लिए आवश्यक संघर्षशीलता आदि का चित्रण आदिवासी
कविता करती है। आदिवासी कविता में इन मूल्यों का चित्रण आदिवासी जनजीवन के
परिप्रेक्ष्य में हुआ है। अर्थात् आदिवासी कवियों ने आदिवासी समुदाय के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में अपनी
कविताओं में संवैधानिक मूल्यों का चित्रण किया है।
संदर्भ :
1. डॉ. खन्नाप्रसाद अमीन, आदिवासी की मौत, पृ. 34
2.
महादेव
टोप्पो, जंगल
पहाड़ के पाठ, पृ.
21
3.
वही,
पृ.21
4. आलोका कुजूर, नये हस्ताक्षर, पृ. 72
5. संपा. रमणिका
गुप्ता, कलम को
तीर होने दो, पृ. 51
6. महादेव टोप्पो,
जंगल पहाड़ के पाठ, पृ. 11
7. संपा. रमणिका
गुप्ता, कलम को
तीर होने दो, पृ. 275
8. वही, पृ. 261
9.
अनुज लुगुन, बाघ और सुगना मुण्डा की बेटी, पृ.52
10.
संपा.
रमणिका गुप्ता,
कलम को तीर होने दो,
पृ. 170
11. वही, पृ. 192
12.
अनुज लुगुन, पत्थलगड़ी, पृ. 28
13. संपा. रमणिका
गुप्ता, कलम को
तीर होने दो, पृ. 52
14. वही, पृ. 246
15. वही, पृ. 246
16. जसिन्ता केरकेट्टा, अंगोर, पृ. 50
17. संपा. रमणिका
गुप्ता, कलम को
तीर होने दो, पृ. 213
18. अनुज लुगुन, पत्थलगड़ी, पृ.31
19. संपा. अश्विनी
कुमार पंकज, संविधान
सभा में जयपाल, पृ.66
20. हरिराम मीणा, आदिवासी जालियाँवाला एवं अन्य कविताएँ, (आज की कविता), पृ.35
21. वही, पृ.35
22. अनुज लुगुन, पत्थलगड़ी, पृ. 25
23.
संपा. अश्विनी
कुमार पंकज, संविधान सभा में जयपाल, पृ.66
24. भारत का संविधान, पृ. 28
25. संपा. रमणिका गुप्ता, कलम को तीर होने दो, पृ. 32
26. वही, पृ. 36
27. भारत का संविधान, पृ. 29
28. संपा. रमणिका गुप्ता, कलम को तीर होने दो, पृ.107
29. वही, पृ. 37
30. वही, पृ. 102
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